संपादकीय
23 फरवरी 2012
केंद्र सरकार अब चुनाव आयोग के पर कतरने की ताक में है। भ्रष्टाचार पर गठित मंत्री समूह की बैठक में यह मसला उठा, हालांकि सरकार ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता का नाम लेकर विकास को रोकने के मसले पर उड़ती उड़ती बातचीत हुई, लेकिन अब सामने आ गया है कि यह बातचीत उड़ती उड़ती नहीं हुई, जैसा कि प्रणब मुखर्जी बता रहे हैं। इस बैठक की कार्यसूची में ही अचार संहिता के मुद्दे को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकालने पर चर्चा शामिल थी। खबरें हैं कि सरकार में इस पर बाकायदा प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। विपक्षी दलों को इसका जो विरोध करना था, वह कर रहे हंै। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में देश ने यह भी देखा कि किस तरह वोट जुटाने के लिए देश का कानून मंत्री ही चुनाव आयोग को ललकारने लगा, और कैसे जब तक चुनाव आयुक्त ने इस बात की शिकायत राष्ट्रपति से नहीं की, देश के प्रधानमंत्री हरकत में नहीं आए। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक बैठक की कार्यसूची में यह मुद्दा चुनाव आयोग से हाल ही में आचार संहिता भंग करने के लिए डांट खा चुके कानून मंत्री के अनुरोध पर रखा गया था। कंेद्र सरकार के दो मंत्रियों के डांट खाने तक, अपने नेताओं को चुनाव आयोग का सम्मान करने की सीख ऊपरी मन से ही सही, कांग्रेस देती रही, लेकिन जब बात राहुल गांधी के आचार संहिता भंग करने की बात आ गई, तो कांग्रेस को विकास की राह में आचार संहिता का मुद्दा सबसे बड़ा रोड़ा लगने लगा। इसके पहले उनके जीजा रॉबर्ट वाढेरा की रैली पर कार्रवाई करने वाले अफसर के तबादले के भी चर्चे हो चुके थे। इतने बरसों से देश में चुनाव करवाते आ रहा चुनाव आयोग, चुनावी आचार संहिता लागू करने के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते आ रहा था, तब तक कांग्रेसियों को इसमें कुछ गलत नजर नहीं आया। अब उसकी अगुवाई वाली सरकार के सबसे बड़े मंत्री यह कहते हंै कि आचार संहिता विकास कार्यों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। एक सरकार के पांच साल का कार्यकाल खत्म होने पर चुनावों के पहले बमुश्किल दो महीनों के लिए लागू होती आचार संहिता के समय में ही क्या सरकार विकास का सारा काम कर लेती है? प्रणब मुखर्जी की बन्द दरवाजे में की गई यह टिप्पणी आज जब सामने आ गई है, तो इससे यह सबित होता है कि यह सरकार विकास के नाम पर ऐन चुनावों के समय मतदाता को ठगने की छूट चाहती है।
यह सच है कि चुनाव आयोग के अफसर अतिउत्साही होकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हंै, और कुछेक बार प्रशासनिक दिक्कतें पेश आती हैं। चुनाव आयोग पर सीबीआई की तरह सत्ता पक्ष की शाखा के रूप मे काम करने का आरोप भी कभी-कभार राजनीतिक दल लगा लेते हैं। जैसे गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह पर इस तरह के आरोप लगाए थे। लिंगदोह के ईसाई होने के नाते सोनिया से सहानुभूति रखने की बातें भी की गई थीं, लेकिन आज हालात उल्टे हंै। आज यूपीए की सरकार के रहते एक मुसलमान कानून मंत्री के खिलाफ, एक मुसलमान मुख्यचुनाव आयुक्त ने शिकायत की है। इस स्थिति से साफ है कि एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग पर कभी-कभार भी लगाए गए इस तरह के आरोप बेबुनियाद रहे हैं। सच तो यह है कि चुनाव आयोग आज देश में एक निष्पक्ष और प्रभावशाली संस्था के रूप में स्थापित हो चुका है। समय-समय पर इसके बड़े पदों पर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं, धर्मों के लोग आए, लेकिन कभी इस संस्था के खिलाफ किसी भी मुद्दे पर कोई गंभीर, या सतही आरोप सबित नहीं हो सका। आरोप, अगर लगाए भी गए, जैसा कि गुजरात में हुआ, तो जनता ने उन पर यकीन नहीं किया। न तो कभी चुनाव आयोग के खिलाफ कोई बड़ा स्टिंग ऑपरेशन हुआ, न ही इसके किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप लगा। इस संस्था के बारे में देश में आम राय यही है, कि यह भ्रष्ट और अवसरवादी नेताओं की आंख में खटकने वाली, ताकतवर, निष्पक्ष संस्था है, जिस पर इस देश की आम जनता अपनी उम्मीदें टिका सकती है। हम भी इस राय से सहमत हैं। हमें भी चुनाव आयोग और उसके कामकाज से कोई शिकायत नहीं, सिवाय इसके कि यह चुनावों में कालेधन और फिजूलखर्ची रोकने में नाकाम रहा है। हम इससे इस मामले में भी प्रभावी होने की उम्मीद करते हंै, वर्ना चुनाव आयोग की आमतौर पर स्वच्छ, निष्पक्ष छवि से हम भी सहमत हैं। दूसरी तरफ इसके पर कतरने की कोशिश में दिखती यूपीए सरकार, और उसका नेतृत्व कर रहे दल कांग्रेस को देखें, तो उसकी विश्वसनीयता आज तार तार है। इसके नेताओं को आयोग की लताड़ खानी पड़ी है। जब तक देश में हो-हल्ला नहीं मचता, इसके बड़े नेता गलत बर्ताव कर रहे अपने नेताओं को आंख दिखाने का नाटक भी नहीं करते। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब यूपीए में शामिल दलों के नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार की कोई बात नहीं होती। प्रफुल्ल पटेल के सरकारी विमानसेवा के घरेलू कार जैसे इस्तेमाल की खबर अभी ताजा ही थी कि, मुंबई में कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष की सम्पत्ति जब्त करने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया। राहुल गांधी जनसभा में वाहवाही लूटने और अपने तेज तेवर दिखाने के नाम पर सपा का चुनावी घोषणापत्र कहकर जिस कागज़ को फाड़ते है, वह कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम की फेहरिस्त निकलती है। कहने की बात यह है कि छोटी से ले कर बड़ी बातों तक, यूपीए की हालत आज ऐसी है कि उसकी कोई विश्वसनीयता जनता के बीच बची नहीं है, इसलिए अगर वह कोई ठीक बात भी करती है तो उस पर कोई यकीन नहीं करता। चुनावी आचार संहिता के मामले में भी उसके नेताओं का झूठ उसकी पहले से ही तार-तार हो चुकी विश्वसनीयता को और भी जर्जर कर रहा है।
चुनावी आचार संहिता मतदाता के हित में है कि उसे चुनाव के समय अपने प्रतिनिधि की काबीलियत तय करते समय लालचों से बचाया जा सके, न तो कोई उसे खरीदने की कोशिश करे, न ही झूठी खबरें फैलाकर, ऐन चुनाव के समय लुभावनी योजनाओं की घोषणाएं करके उसके फैसले को प्रभावित करने की कोशिश करे। यह व्यावस्था यह तय करती है कि सत्ताधारी दल सरकरी तंत्र का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए न कर सके। चुनावी आचार संहिता को चुनाव आयोग के अधिकार के दायरे से निकालकर उसे कानूनी रूप देने की यूपीए सरकार की कोशिश देखने में जितनी मासूम लगती है, उतनी है नहीं, इससे चुनाव आयोग की ताकत बहुत कम हो जाएगी। फिर इसकी जरूरत भी क्या है, जब आयोग आचार संहिता लागू तो प्रशासन और पुलिस के जरिये ही करता है?
कांग्रेस पर देश में संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करते चलने का आरोप अक्सर लगाया जाता है। मंत्री समूह की बैठक में चुनावी आचार संहिता पर ताजा चर्चा भी ऐसा ही एक कदम है। कैग को आंखें दिखा चुकी सरकार अब चुनाव आयोग को आंखें दिखाने की कोशिश करती दिखती है। मौजूदा आम चुनावों में मतदाताओं का बड़ी तादाद में मतदान करना चुनाव आयोग की बड़ी सफलता मानी जाएगी। आज जब देश भर में प्रशासनिक तंत्र का निक्म्मापन बात बात पर जाहिर होता है, बड़े-बड़े घोटाले, और सरकारी कर्मियों की करोड़ों रुपयों की काली कमाई सामने आ रही है, देश में संवैधानिक संस्थाओं का कामकाज सराहनीय है। कैग हो या चुनाव आयोग, या ओडिशा का मानवाधिकार आयोग, जिसने सरकार को एक दलित लड़की के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूर कर दिया, या कर्नाटक का लोकायुक्त, जिसने दबंग खान माफिया को जेल जाने का रास्त खोला, और उसे बचाने वाले मुख्यमंत्री को घर जाने पर मजबूर कर दिया। हम देखते हैं कि कार्यपालिका बनकर देश चलाने का दम भरने वालों को संवैधानिक संस्थाओं का डंडा ही सही रास्ते पर रख पा रहा है। जाहिर है यह संस्थाएं कार्यपालिका पक्ष के लोगों को अपने " विकास" में "सबसे बड़ी रुकावटें" लगती हो, लेकिन हम मानते हंै यह संस्थाएं देश के लोकतंत्र और संघीय ढांचे की मजबूती के लिए बहुत काम की हैं। यूपीए सरकार, और खासकर कांग्रेस की, व्यक्ति पूजा और चुनाव जीतने के लिए इन संस्थाओं से छेड़छाड़ और यूपीए सरकार की चुनाव आचार संहिता के बारे में ताजा कोशिश निहायत ही गैर जरूरी है।

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