बारी हमारे बच्चों की भी आ सकती है


5 फरवरी 2012
संपादकीय 
अफगानिस्तान से खबर है कि वहां राजधानी काबुल में बनाए गए राहत शिविरों में ठंड से 22 बच्चे मर गए। यह वह अफगानिस्तान है जहां जमाने पहले अमरीका ने साम्यवाद खत्म करने के लिए एक युद्ध शुरू किया था और वहां से रूस के असर को खत्म करने के लिए तालिबानों को खड़ा किया था। इसी अफगानिस्तान में बरसों से चली आ रही अपनी मौजूदगी को अब खत्म करने की बात कहते हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने करीब 6 महीने पहले यह घोषणा की कि वहां पर अमरीका का अभियान कामयाब और पूरा हो गया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगले 15 महीनों में अमरीकी फौजें वहां से हटा ली जाएंगी। 
एक विचारधारा को खत्म करने के लिए अमरीका ने कई देशों में अपनी फौजें भेजीं, और कई देशों में हत्याएं करवाईं, सत्ता पलटवाई। मध्यपूर्व के देश अमरीका को तरह-तरह से भुगत रहते हैं और चाहे अमरीका का यह हमला इस्लाम वाले देशों पर किसी मजहब की वजह से न भी है, दुनिया के मुसलमानों को एक बड़े तबके के भीतर अमरीका के बारे में इस्लाम विरोधी होने की तस्वीर बनी हुई है। अमरीका के प्रति मुसलमानों के अविश्वास का हाल यह है कि कुछ बरस पहले भारत के उत्तरप्रदेश में मुस्लिम समुदाय के भीतर पोलियो ड्रॉप्स का विरोध किया गया क्योंकि लोगों के बीच यह अफवाह फैल गई थी कि मुस्लिम बच्चों को अमरीका से आए हुए इन टीकों का ऐसा असर होने वाला है कि आगे वे मां-बाप न बन सकें। ऐसे माहौल के बीच अमरीका उन देशों को मंझधार में छोड़कर निकल जा रहा है जहां उसके हमले के बाद, उसकी फौजी दखल के बाद स्थानीय सरकारें खत्म हो गईं और वहां पर स्थानीय लोगों में अपनी सरकार बनाने की ताकत भी खत्म हो गई। अमरीका ने लोगों को चाहें दवाओं से नाकाबिल न बनाया हो, उसने अपनी फौजी डिजाइनों से लोगों को नाकाबिल बनाने में कोई कसर नहीं रखी है।
किसी देश की भीतरी दिक्कतों को खत्म करने के नाम पर और वहां पर लोकतंत्र लाने के नाम पर दुनिया के इस सबसे बड़े हमलावर गुंडे देश ने हजारों अरब रूपयों जैसे खर्च किए और खुद अमरीका की जांच रिपोर्ट कहती है कि इसमें बहुत बड़ा हिस्सा अमरीकी भ्रष्टाचार में ही चले गया। यहां यह बात भी समझने की जरूरत है कि दुनिया भर में हमले और युद्ध को बढ़ावा देने में हथियारों के कारखानेदारों और सौदागरों की सीधी-सीधी दिलचस्पी होती है और आतंक खड़ा करने से लेकर, झगड़े खड़े करने तक का काम इन कारखानेदारों के एजेंट जमीन से लेकर संसदों तक करते चलते हैं। अफगानिस्तान में अभी जिन करीब दो दर्जन बच्चों के ठंड से मर जाने की खबर आई है, उस तरह के बच्चे फिलीस्तीन में आए दिन इजरायली हमलों से मरते हैं, इराक में मरते ही आए हैं और अब अमरीकी विमान ईरानी बच्चों को इसी तरह मारने के लिए नक्शे लेकर बैठे हैं। आज अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत जिस कदर बेजुबान हो गया है, उसके चलते कोई इस बात को भी उठाने वाला नहीं बचा है कि लाखों परमाणु हथियारों के जखीरे पर बैठे हुए अमरीका को यह हक किसने दिया कि वह ईरान को परमाणु हथियार बनाने से भी रोके? ताकतवर चाहे जिसकी गाय खोलकर ले जाए, चाहे जिसकी लुगाई को उठाकर ले जाए, चाहे जिसकी जमीन पर कब्जा कर ले, पत्थर युग से चली आ रही इस व्यवस्था को 21वीं सदी के लोकतंत्र के ढकोसले के भीतर देखना हो तो अमरीका द्वारा अपने फौजी विमानों से जगह-जगह लोकतंत्र बरसाने का नाटक देखना चाहिए।
दुनिया भर में अमरीकी दखल के बाद मारे जाते हर बच्चे की जिम्मेदारी अमरीका पर है। और इनमें से बहुत से परिवार ऐसे होंगे जो अपने इन बेकसूर लोगों की मौतों को कभी भूल नहीं पाएंगे और उनकी नफरत, उनके जख्म अमरीका को पूरी जिंदगी के लिए खतरे से घेरकर रखेंगे। यह खतरा अमरीका की फौजी सरकार ने इतने महंगे खर्च के साथ खरीदा है कि अमरीका के भीतर समझदार और अमनपसंद लोगों का तबका अपनी सरकार से इस बात के लिए नफरत करता है। लेकिन जर्मनी में हिटलर, गुजरात में मोदी जिस तरह जीतकर आते हैं, मतदाताओं के वैसे ही तबके की वजह से अमरीका में हमलावर राष्ट्रपति बुश दुबारा जीतकर आ गया था। हम इस बात पर हर कुछ हफ्तों बाद इसलिए चर्चा छेड़ते हैं क्योंकि आज जिस अमरीकी साजिश की वजह से, हमले की वजह से बेकसूर अफगान बच्चे ठंड में मर रहे हैं, किसी अमरीकी हमले के बाद हिंदुस्तान के बच्चे भी उसी तरह मारे जा सकते हैं।

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