4 फरवरी 2012
संपादकीय
लता मंगेशकर ने इंटरनेट पर लोगों से कहा है कि वे जिंदा हैं और उनकी सेहत या जिंदगी के बारे में फैलाई जा रही अफवाहों पर लोग भरोसा न करें। इस खबर से कल दिल्ली की एक घटना याद पड़ती है जिसमें फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के घर खाना पकाने वाले रसोइए ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर इस तख्ती के साथ अनशन शुरू किया है कि वे अभी जिंदा हैं। उसके रिश्तेदारों ने उसे मरा बताकर जमीन-जायदाद को हड़प लिया है। लता मंगेशकर के बारे में अफवाह से कुछ हड़पने की तो गुंजाइश नहीं थी, लेकिन ट्विटर, फेसबुक, ब्लैकबेरी मैसेंजर और मुफ्त में एसएमएस पहुंचाने वाली कुछ और सेवाओं पर बात की बात में लता के न रहने की बात फैलती चली गई।
हमें भी अलग-अलग विचारधाराओं के सक्रिय लोग आए दिन कई तरह की सूचनाएं इंटरनेट पर कहीं न कहीं से भेजते हैं। इनमें से बहुत सी सिरे से झूठी होती हैं और वे किसी को बदनाम करने के लिए पूरी बदनीयत से भेजी जाती हैं। जब ऐसे लोगों को कहा जाता है कि उनकी भेजी जानकारी गलत है तो फिर वे एकदम से यह गिनाने लगते हैं कि उन्हें वह खबर या तस्वीर कहां से मिली थी। कम्प्यूटर, फोन और संचार तकनीक ने टेक्नॉलॉजी को जितना आसान कर दिया है उतना ही मुश्किल इस लालच को कर दिया है कि लोगों तक किसी ईमेल, एसएमएस, या तस्वीर को कैसे बांटा जाए। जिनकी समझ जितनी कम होती है, वे उतनी ही अधिक रफ्तार से बिना जांचे-परखे चीजों को बांटने में जुट जाते हैं। जैसे-जैसे समझ बढ़ती है, लोग सत्य और तथ्य की कसौटी पर उन बातों को कसते हैं जो उन्हें मिली हैं और जिन्हें वे आगे बढ़ाना चाहते हैं।
पिछले कई बरसों से हम लगातार देख रहे हैं कि साम्प्रदायिक और धर्मांध ताकतें झूठ को फै लाने में सबसे आगे रहती हैं।भारत में आज तक का ऐसा सबसे बड़ा प्रयोग या हादसा उस वक्त हुआ था जब तकरीबन पूरे देश में करोड़ों लोगों ने कुछ घंटों के भीतर फैलाई गई इस अफवाह पर आंखें बंद करके भरोसा कर लिया था कि गणेश प्रतिमाएं दूध पी रही हैं। वह शायद कुछ लोगों का सोच-समझकर किया गया एक प्रयोग था कि धार्मिक अफवाह किस रफ्तार से फैलाई जा सकती है। जिस तरह से भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने से निकली जहरीली मिक गैस फैली थी उसी तरह आज कोई अफवाह फैलती है। अफवाहों से लोगों का एक-दूसरे पर भरोसा घटता है और गलत जानकारी से बहुत से मौकों पर एक तबके में दूसरे तबके के खिलाफ नफरत फैलती है। इसी को रोकने के लिए हमें जब कभी, जब कहीं कोई गलत जानकारी दिखती है तो वह किसी चूक की वजह से गलत रह गई हो, या किसी साजिश की तरह झूठ से ही बनाई गई हो, उन सबके बारे में हम लोगों को सावधान करते भी चलते हैं।
टेक्नॉलॉजी ने एक पल में किसी लिखे हुए को या किसी अनजान के हाथों छेडख़ानी से बदली गई तस्वीरों, गढ़ी गई खबरों को सैकड़ों-हजारों लोगों तक आगे बढ़ाने के काम को इतना आसान कर दिया है कि लोग गंदगी को अपने दोस्तों की पूरी लिस्ट में परोसते चलते हैं। हमारा ख्याल है कि स्कूलों की बड़ी कक्षाओं में और कॉलेज में अब इंटरनेट-संस्कृति को कुछ हद तक पढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ वयस्क होते जाने वाले नौजवानों को भी इंटरनेट पर सच-झूठ सही-गलत के फर्क और खतरों को समझाने की जरूरत है। दुनिया के कई दूसरे देशों की तरह भारत में भी सूचना तकनीक से जुड़े कानून इतने कड़े हैं कि वे किसी भी कमसमझ या लापरवाह को जेल में डाल सकते हैं। जिन लोगों का दूसरे देशों के साथ वास्ता पड़ता है, वे लोग भी यह याद रख सकते हैं कि किस तरह इंडोनेशिया से एक नास्तिक ने जब फेसबुक के अपने पन्ने पर जब यह लिखा कि ईश्वर नहीं है तो उसे गिरफ्तार करके उसके खिलाफ ईशनिंदा विरोधी कानून के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है जिसमें शायद मौत की सजा का भी प्रावधान है।
हम इसी अखबार में छोटी सी बात में बहुत बार पाठकों को सचेत करते हैं कि इंटरनेट पर या अपने फोन पर उन्हें मिले किसी झूठे, या दुर्भावना भरे संदेश, छेडख़ानी से बनाई गई तस्वीर को वे बिना जांच-परखे आगे बढ़ाते हैं तो वे अदालती कार्रवाई का खतरा उठाने के साथ-साथ अपनी साख को भी दांव पर लगा देते हैं। किसी झूठ को फैलाने के लिए अपनी साख को दांव पर लगाने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि झूठ तो आगे-पीछे उजागर हो ही जाता है, उनकी बर्बाद हुई साख नहीं लौटती। इसलिए आसान टेक्नॉलॉजी के साथ अधिक जिम्मेदार होना जरूरी है, और आज संचार तकनीक से गहरे तक जुड़ी हुई जिंदगी को देखते हुए लगता है कि इससे जुड़े हुए तमाम पहलुओं को कहीं न कहीं पढ़ाने-सिखाने की जरूरत है।

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