छोटी सी बात
20 फरवरी 2011
शहर की एक व्यस्त सड़क से निकलते हुए एक बारात इस तरह पूरी चौड़ाई को घेरे हुए थी कि मानो किसी बड़ी गौशाला के जानवर एक साथ तालाब जा रहे हों। बहुत रौशनी, बहुत बाजा, मतलब यह कि खासी पैसे वाली बारात थी। यह सड़क शहर के एक बड़े हिस्से को रेलवे स्टेशन से जोड़ती है, इस सड़क पर बहुत से नर्सिंग होम हैं, जिनमें सैकड़ों मरीज हर वक्त रहते ही हैं। यहां दर्जन भर दवा दूकानें हैं जहां तक लोगों को आना-जाना पड़ता है। इन सबके साथ-साथ इस सड़क के दोनों ओर हजारों मकान भी हैं जिनमें रहने वाले लोगों को इसी सड़क से गुजरना होता है। लेकिन एक बारात ने इन सबका जीना घंटों के लिए मुश्किल कर दिया।
दसियों हजार लोगों की बददुआ के साथ जो जिंदगी शुरू हो रही हो वह कितना सुख पाएगी इसका अंदाज लगाना हो तो भारतीय संस्कृति में अच्छा काम करने से अच्छा होने की जो नसीहत दी जाती है उसे सोचना चाहिए।
दरअसल इंसान एक सीमा तक इंसान रहता है। जैसे-जैसे वह धनवान बनते जाता है उसके भीतर का इंसान छोटा होते जाता है। अधिक पैसों के साथ अहिंसक बने रहने खासा मुश्किल होता है। लोग अपनी खुशी को दूसरों का जीना मुश्किल करते हुए सड़कों पर इस तरह बिखेर देते हैं कि मानो पूरी दुनिया की यह मजबूरी हो कि वे इनकी खुशी के लिए अपनी सहूलियत का हक छोड़ दें। सड़क पर, रेलवे स्टेशन या किसी और सार्वजनिक जगह पर दूसरों के हक पर अपने एक गैरकानूनी हक को लादकर लोग जितनी बेशर्मी और हिंसा से अपने सुख और दुख से जगहों को पाट देते हैं, वह भयानक है। एक तो पैसा अपने-आपमें हिंसक होता है और फिर भीड़ तो पूरी तरह से बेदिमाग होती है। किसी समझदार ने बहुत पहले यह लिखा था कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं दिमाग एक भी नहीं होता। इन दोनों का मेल पेट्रोल और आग की तरह का होता है और लोगों की बदतमीजी विस्फोट की चिंगारियों की तरह चारों तरफ फैलने लगती है।
एक दिक्कत यह भी रहती है कि जिन अफसरों पर ऐसी अराजकता को काबू करने की जिम्मेदारी रहती है वे पैसों और बेदिमाग सिरों की भीड़ से उलझने के बजाय घर बैठे रहना बेहतर समझते हैं।
यह संपन्नता लगातार हिंसक होकर, बदतमीज होकर यही बताती है कि परिवार या व्यापार ने इन्हें पैसों की संपन्नता तो दी है लेकिन इंसानियत से इन्हें विपन्न कर दिया है।--- सुनील कुमार

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