2 जी फैसला: जनता के हित की जीत



3 फरवरी 2012
संपादकीय 
2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए यूपीए सरकार के जारी किए हुए सभी स्पेक्ट्रम लाईसेंस रद्द कर दिए, और स्पेक्ट्रम बांटने के लिए नीलामी करने का तरीका अपनाने की सलाह दी। एक बेहद हाईप्रोफाईल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले पर, देश के अलग-अलग तबकों में जैसी प्रतिक्रिया होनी थी, हो रही हैं। यूपीए सरकार अपने बचाव में कह रही है कि अदालत ने तो एनडीए सरकार की नीति को गलत ठहराया है, हमारे खिलाफ कुछ नहीं कहा।  विपक्ष सरकार से इस्तीफा मांग रहा है, ट्राई अदालत की लताड़ खाकर अपना खोखला बचाव कर रहा है, सरकार के आला वकील कह रहे हैं  कि 70 लाईसेन्स अवैध होने की बात तो हमने पहले ही कही थी। लेकिन इस फैसले पर जनता के दिल की बात जस्टिस ए के गांगुली ने देश की सबसे बड़ी अदालत में अपनी नौकरी के आखिरी दिन कही- कि अदालतें  जनता की खातिर हर काम करने को मजबूर की जा रही है,  नागरिकों के मां के पेट में आते साथ ही उनकी हिफाजत करने से लेकर उसके अंतिम क्रियाकर्म तक, हर काम का बोझ अदालतें उठा रही हैं। जस्टिस गांगुली ने अपने विदाई समारोह में कहा-हम  वह तमाम समस्याए  सुलझा रहे हैं जिन्हें सरकार या तो सुलझा नहीं पाती, या सुलझाना नहीं चाहती। उनकी यही बात 2- जी घोटाले पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले की खुश्बू है कि सर्वोच्च  न्यायालय ने, दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र में जनता की आवाज़ सुनी, जिसे सुनने से केन्द्र सरकार आखिरी दम तक इंकार कर रही थी। अदालत ने अपने फैसले में ही कहा है कि अगर संवैधानिक  पदों पर रह चुके ,और व्यापक जनहित के प्रति अपना फर्ज अदा करने वाले कुछ जागरुक नागरिकों, और स्वच्छ प्रशासन के लिए संघर्ष कर रहे एनजीओ ना होते, तो देश कभी नहीं जान पाता कि सत्ता और पैसे की ताकत वाले, और व्यवस्था से छेड़छाड़ कर सकने वाले किस तरह दुर्लभ प्राकृतिक संसाधन लूट लेते हैं।
    पिछले कुछ महीनों से जनहित याचिकाओं के प्रति अदालतों ने कई कारणों से सख्त रवैया अख्तियार किया हुआ था, ऐसे में सुब्रमण्यम स्वामी, और प्रशांत
भूषण की इस जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ताकत और पैसे के राज के बीच खुद को बेसहारा और लाचार पा रही जनता के बहुत से ज़ख्मों पर मरहम की तरह है, जब प्रजातंत्र के बाकी खंबे अपने काम में चूक करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं मंत्री जेल में है तो कहीं मुख्यमंत्रियों के जेल में जाने
लायक काम है, तो कही राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पद पर बैठे लोगों के सेक्स स्केंडल सामने आते हंै ऐसे में न्यायपालिका ने जनहित याचिका पर यह फैसला देकर लोकतंत्र में जनता की ताकत को दोबारा उस ऊंचाई पर बैठाया है, जहां से मनमाने तरीके से स्पेक्ट्रम आबंटित कर के राजा टोली, और उसे आखिरी दम तक बचाती रही सरकार ने उसे लात मार कर गिरा दिया था।  इस मुद्दे पर सरकार ने जगह-जगह , बार- बार अधिकार क्षेत्र की बात उठाई चाहे, स्पेक्ट्रम आबंटन नीति पर कानून और वित्त मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र की बात हो या नीतिगत मामलों में कार्यपालिका के क्षेत्र में न्यायपालिका के दखल का मुद्दा। लेकिन अदालत ने 2- जी मामले में फैसला देते वक्त यह साफ कर दिया कि अगर कार्यपालिका अपना काम ढंग से नहीं करेगी, तो जनता के आगे उसका
ऐसा कोई अधिकार क्षेत्र नहीं बचेगा जिसमें दखल नहीं किया जा सकेगा।  हालांकि यह  फैसला जनता को न्यायपालिका की जवाबदेही के मामले में भी ऐसा ही रवैया अख्तियार करने के उसके अधिकार के लिए भी उसे जागरुक करेगा लेकिन दोनों ही हालात यह  लोकतंत्र के लिए बहुत खुश होने की बात है  दिलचस्प बात यह है कि इसी दिन अहमदाबाद में गुजरात उच्च न्यायालय ने मोदी के सद्भावना मिशन पर सरकारी तिजोरी से खर्च  करने के बारे में दायर एक जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा है कि सरकारी तिजोरी का पैसा कैसे खर्च करना है यह उच्च न्यायालाय तय नहीं कर सकता, चुनी हुई सरकार को अपनी बुद्धि के हिसाब से यह तय करने का अधिकार मिला हुआ है। एक ही दिन में दो जनहित याचिकाओं पर
इस तरह के दो फैसले यह भी साबित करते हंै कि अगर  सही तथ्यों के साथ, सभी पहलुओं पर सोच-समझकर जनहित याचिका दायर की जाए, तो जनता का पक्ष जीत सकता है, लेकिन जनहित के नाम पर अदालतें अपना वक्त खराब नहीं करने वाली। कल के दिन अदालतों में  "पीआईएल एक्टिविज़म" के साथ ही ज्युडीसियरी एक्टिविज़म" की भी एक नई मिसाल सामने आई है जो आखिरकार जनता के फायदे में ही है। यह फैसला केवल कार्यपालिका के लिए ही एक  सीख नहीं है कि ताकत के
बूते वह देश की सम्पत्ति के साथ जैसे चाहे नहीं बरत सकती, बल्कि जनता के लिए भी एक सीख है कि अगर उसे सत्ता की ताकत से टकराना है तो अपनी बात कैसे , कितनी मजबूती से सामने रखनी चाहिए। भूषण पिता-पुत्र इस देश में जनहित याचिकाओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते हंै, और अर्से से न्यायपालिका में पारदर्शिता के लिए लड़ रहे हंै। न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के लिए अवमानना का मुकदमा भी झेल रहे हैं। इस सबके बीच उनकी और उनके समर्थकों की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा फैसला इस बात का भरोसा दिलाता है कि जनता की उम्मीद देश में पूरी तरह टूटी नहीं है।
यह मामला ऊंचे पदों पर काम कर रहे, या काम कर चुके ऐसे लोगों के लिए भी एक सीख है जो सच के साथ खड़े होना चाहते हंै, देश के लिए अपना फर्ज अदा करना चाहते हैं। ऐसे मौकों पर जब कुछ मु_ीभर दौलतमंदों, ताकतवर लोगों के लिए जनता के हित कुचले जा रहे हों, उसकी आवाज़ बेशर्मी से दबाई जा रही हो ,तो उन्हें ऐसी जनहित याचिकाओं के साथ खड़ा होना चाहिए, इससे ऐसी कोशिशों को मजबूती मिलती है। यह सच है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में बार-बार कहा कि कि उसे याचिका की मंशा से मतलब नहीं, वह सिर्फ तथ्यों से प्रभावित होता है, लेकिन यह भी सच है कि सुब्रमण्यम स्वामी और भूषण पिता-पुत्र को इस मामले में  कई पूर्व सूचना आयुक्तों, सतर्कता आयुक्तों, आला पुलिस अफसरों का जैसा सहयोग मिला, उसने उनके पक्ष को मजबूती और विश्वसनीयता दोनों देने में अहम भूमिका निभाई और ऐसी लड़ाई लडऩे के लिए खड़े लोगों के लिए जो हौसला बहुत ज़रूरी है उसे मज़बूत किया। इन तमाम लोगों का इस लड़ाई में अपनी तरह से यह योगदान अहम था जिसकी लाज इस फैसले ने रखी है।
ऐसे समय में जब चुनी हुई सरकार , संविधान के जरिये मिले अपने अधिकारों का गलत फायदा उठाने में लगी हो, उसे चुनकर कुर्सी पर बैठाने वाली जनता को हर तरह से अपमानित करने में जुटी हो, जनता के हक में ऐसे लोगों का सामने आना उसका हौसला बढ़ाता है। इस देश में यह सिर्फ प्रशांत भूषण, उनके पिता या सुब्रमण्यम स्वामी की ही जिम्मेदारी नहीं है कि वह अदालत के जरिये सरकार को जनता के हक में सही रास्ते पर रखे, ऐसे हर उस इंसान को इसमें अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए जो अपनी सामाजिक, प्रशासनिक हैसियत, अनुभव और परिस्थिति के कारण ऐसा कर पाने लायक हैं। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते वक्त कपिल सिब्बल ने कहा कि इसमें सरकार की बुराई नहीं की गई, लेकिन यह फैसला कदम-कदम पर सरकार द्वारा इस मामले में दिखाए गए अहंकार पर चोट करता है। इसकी एक मिसाल सर्वोच्च अदालत का सरकार की यह दलील खारिज करना है कि एक आम नागरिक किसी  भ्रष्ट  जनसेवक के खिलाफ अभियोग लगाने के लिए प्रधानमंत्री से सीधे सम्पर्क नहीं कर सकता। यह फैसला जनता और सरकार दोनों को बताता है कि इस देश में एक आम नागरिक के अधिकार सरकार के आगे क्या मायने रखते हैं, और एक जनहित याचिका कैसे उसे उसका यह अधिकार दिला पाने की ताकत रखती है।
यही नहीं, सर्वोच्च  न्यायालय के इस फैसले ने 2- जी और उसके बाद एक के बाद दूसरे घोटाले उजागर कर रहे कैग को भी राहत दी, जो  भ्रष्टाचार  के खिलाफ इस लड़ाई में अपनी संवैधानिक भूमिका के कारण शामिल है। सरकार और उसके नुमाइंदों से अलग-अलग मंचों पर तरह-तरह के हमले झेल रही कैग, और सरकार ने जिसे अपनी कठपुतली बनाकर रखने की कोशिश करती दिखी है उस सीवीसी को भी इस फैसले से जीने लायक ऑक्सीजन मिलेगी। अब चूंकि अदालत ने नीलामी के जरिये 2- जी स्पेक्ट्रम बांटने का आदेश दिया है, देश को यह भी पता लग जाएगा कि एक लाख 76 हजार करोड़ के नुकसान का कैग का आंकड़ा कितना गलत था, और 2- जी आबंटन से देश को हुए शून्य नुकसान का कपिल सिब्बल का दावा कितना सही। 122 लाईसेंसों का रद्द होना केवल दूर संचार विभाग की नाकामी ही नहीं जताता, सर्वोच्च न्यायालय ने एक-एक मंत्रालय और विभाग की भूमिकाओं का जिक्र करते हुए इस फैसले के जरिये सरकार के हर तबके से हर स्तर पर सवाल करने का देश के आम नागरिक का अधिकार उसके हाथों में थमा दिया है। एक राजनीतिज्ञ होने के नाते सुब्रमण्यम स्वामी की यूपीए गठबंधन से अपनी शिकायतें हो सकती हंै, लेकिन वकील न होते हुए भी उन्होंने  सामजिक संगठनों, भूषण पिता-पुत्र और जागरुक नागरिकों का साथ ले कर जिस हौसले से 2- जी मामला अदालत में लड़ा, सर्वोच्च न्यायालय ने उसे शर्मिन्दा नहीं किया। हंस की तरह नीर क्षीर अलग-अलग करते हुए राजनीतिक मकसदों को अलग करके, इस देश की जनता की,  और इंसाफ पाने के एक बहुत ताकतवार औजार जनहित याचिका की अहमियत पूरी तरह साबित कर दी है।

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