राहुल के झंडा-बैनर लिए भाजपा सड़क पर...


1 फरवरी 2012
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी ने अभी जोर-शोर से एक मुद्दा उठाया, कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए। अलग-अलग कई शब्दों में भाजपा के प्रवक्ताओं और नेताओं ने इस बात को कहा और टेलीविजन समाचार चैनलों पर इस पर बहस छिड़ी। कुछ लोगों को यह हैरानी हो सकती है कि अचानक यह बात कहां से उठी। लेकिन राजनीति के हथियारों के जानकार लोग अगर तारीखों को देखें तो आसानी से इसके पीछे की नीयत पता लग सकती है। पंजाब में मतदान के एक-दो दिन पहले ही भाजपा ने हवा से पकड़कर इस मुद्दे को चबूतरे पर खड़ा करने की कोशिश की जिसका सीधा-सीधा मतलब यह होता कि चले आ रहे एक सिख प्रधानमंत्री को हटाकर दो बरसों के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए। ऐसी बात को हवा में फैलाकर भाजपा की नीयत पंजाब में कांगे्रस को नुकसान पहुंचाने के अलावा और कोई रही हो, ऐसा हमें नहीं लगता। न तो यह लोकसभा के आम चुनाव होने जा रहे हैं और न ही यूपीए सरकार के भीतर ऐसी कोई अस्थिरता है कि जिसके चलते प्रधानमंत्री को बदलने की बात सोची भी जाए। 
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी की हजार किस्म की दूसरी खामियां हो सकती हैं, लेकिन इस बात के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तारीफ करनी होगी कि सत्ता को अपने नौसिखिए या अनुभवहीन हाथों में रखकर, खुद कुर्सी पर काबिज होकर एक खोखला मजा लेने के बजाय उन्होंने एक अच्छी छवि वाले, अनुभवी डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, इसके बाद यह फैसला सही था या नहीं, इसे तो मौजूदा इतिहास लगातार लिख ही रहा है, लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के फैसले में कोई खामी रही हो ऐसा उस फैसले के दिन तो किसी कोने से भी किसी को लगा नहीं था। यह भी ताजा इतिहास है कि किस तरह कांगे्रस सांसदों ने सोनिया गांधी को संसद भवन में पार्टी की संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री चुना था और सोनिया गांधी ने एक समझदारी और विनम्रता से अपने सिर पर रखे गए दुनिया के लोकतंत्र के इस सबसे बड़े ताज को मनमोहन सिंह के सिर पर रखा, और एक कार्यकाल पूरा होने के बाद भी उसे दूसरे कार्यकाल में कायम रखा। नेहरू-गांधी-सोनिया परिवार के अगले चिराग, राहुल गांधी यूपीए सरकार में स्वाभाविक रूप से मंत्री बन सकते थे और एक अनुभव हासिल कर सकते थे। लेकिन उन्होंने पार्टी के मोर्चे पर काम करना तय किया और सरकार में ऐसे अनुभव का मौका खोया जो कि आगे उन्हें सत्ता में आने पर अनुभवहीन करार देने के काम आएगा। ऐसे में भाजपा का यह मांग करना कि दो बरस के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए, एक कुतर्क तो है ही, यह सलाह देना भाजपा के अधिकार क्षेत्र के बाहर की बात भी है। 
यहां पर कांगे्रस को सार्वजनिक बहस में यह याद दिलाने का मौका मिल गया कि कांगे्रस के पास तो आज यूपीए के लिए एक प्रधानमंत्री काम कर ही रहा है, भाजपा के पास तो प्रधानमंत्री के पद के लिए अगले चुनाव का कोई प्रत्याशी भी साफ नहीं है। नरेन्द्र मोदी अगले प्रत्याशी हो सकते हैं या नहीं, या फिर लालकृष्ण आडवानी 2014 के लिए कसरत करके तैयार हो रहे हैं या नहीं, इसमें तो कोई बात भाजपा के भीतर ही साफ नहीं है, इसलिए एनडीए में वह साफ होगी या नहीं यह तो दूर की बात है। भाजपा के आज के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी यह साफ कर चुके हैं कि वे अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं रहेंगे। नरेन्द्र मोदी जिनको कि भाजपा के भीतर का मंदिरमार्गी, गरमपंथी तबका सबसे काबिल और संभावनाओं वाला उम्मीदवार मानता है, आज जाने किन वजहों से पार्टी के चुनाव अभियान से भी बाहर हैं। ऐसे में जरूरत तो भाजपा को अपना अगला उम्मीदवार तय करने की है, न कि चलते हुए एक सत्तारूढ़ गठबंधन में फेरबदल सुझाने की। 
पंजाब में मतदान के ठीक पहले सरदार मनमोहन सिंह को हटाकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का यह नसीहतनुमा शिगूफा, बहुत हल्का रहा। ऐसी खोखली तिकड़मों से किसी पार्टी की इज्जत नहीं बढ़ती, और हमारा अंदाज यह है कि पंजाब के मतदान पर भी ऐसी साजिश का कोई असर नहीं होगा, और वहां के नतीजे इस शिगूफे के पहले जो होने जा रहे थे, शायद वही होंगे, और फिर वे चाहे जो भी हों। कांगे्रस पर कुनबापरस्ती की तोहमत उछालने की भी यह एक कोशिश थी, लेकिन जिस दिन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की यह कोशिश भाजपा ने की, उसी दिन वह उत्तरप्रदेश में अपने पिछले राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे को महासचिव बनाने से पार्टी के भीतर खड़ी हुई बगावत को झेल रही थी। यूपीए सरकार और कांगे्रस के खिलाफ मुद्दों की ऐसी कंगाली आज भाजपा के सामने आने की कोई वजह नहीं दिखती कि वह राहुल के पक्ष में झंडा-बैनर लेकर सड़क पर आ जाए।

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