कुनबापरस्ती के दो और खतरे


21 फरवरी 12
संपादकीय
कल की दो खबरें कांगे्रस पार्टी और यूपीए सरकार के लिए देश के कसैले हो चुके मुंह में कुछ और कुनैन घोलने वाली हैं। हम लगातार कुनबापरस्ती के खिलाफ लिखते हैं और एक ही घर के एक से अधिक लोगों को चुनाव में खारिज कर देने के लिए इंटरनेट पर जगह-जगह चर्चा भी छेड़ते हैं। लेकिन सत्ता है कि उसकी बददिमागी लोगों को अपने कुनबे के लिए देश को पांवपोंछने की तरह इस्तेमाल करती है। यह ठीक है कि आज केंद्र में यूपीए सरकार के चलते सात बरस हो रहे हैं इसलिए अधिक मामले वहीं के सामने आ रहे हैं, लेकिन इक्का-दुक्का सरकारों को छोड़कर बाकी सभी का हाल अपने कुनबों के लिए ऐसा ही है। तमिलनाडु, पंजाब, कश्मीर, बिहार, आंध्र, उत्तरप्रदेश जैसे बहुत से राज्य हैं जहां पिछले दशकों में हम राजवंशों की तरह गिने-चुने कुनबों को न सिर्फ कांगे्रस पार्टी में बल्कि दूसरी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों में भी वंशवाद को पनपाते देख रहे हैं। 
यूपीए सरकार में कुछ महीने पहले तक प्रफुल्ल पटेल एनसीपी की तरफ से ताकतवर विमान मंत्री थे, और इन दिनों वे कनाडा के किसी से रिश्वत लेने के आरोप झेल भी रहे हैं। लेकिन इन आरोपों की असलियत तो सामने आने में बहुत वक्त लग सकता है, अभी जो हकीकत सामने है वह है-'सन् 2010 में तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के रिश्तेदारों को बिजनेस क्लास में जगह नहीं मिलने पर उनकी सेवा में बड़ा विमान लगा दिया था। 25 अप्रैल को बेंगलुरु से मालदीव जाने और 28 अप्रैल को वहां से लौटने के लिए की गई इस विशेष व्यवस्था की जानकारी सूचना के अधिकार (आरटीआई) याचिका के जरिए मिली है।Ó अब अगर घाटे में डूब रही और अब बिक जाने या बंद हो जाने की कगार पर खड़ी हुई राष्ट्रीय एयरलाइंस अपने इसी मंत्री के बरसों वहां काबिज रहने के बाद भी आज इस नौबत को अगर झेल रही है तो जाहिर है कि उसके पीछे मंत्री की ऐसी मनमानी भी रही है। अपने कुनबे के लिए कोई देश के मुसाफिर हवाई जहाज का ऐसा शर्मनाक बेजा इस्तेमाल करे, तो उसे सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए। एक तरफ देश गरीबी की रेखा के नीचे घिसट रहा है, और करोड़ों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मरने की कगार पर खड़े हैं और पहले कौन मरेगा इसके लिए एयर इंडिया से उनका मुकाबला चल रहा है और मंत्री का कुनबा इस मौत में अपना भी हाथ लगा रहा है। मनमोहन सिंह की थाली में दो रोटी एक सब्जी दाल और दही की बहुत चर्चा होती है। लेकिन उनकी सरकार का अगर देश को लूटने में यही हाल हर सुबह सामने आ रहा है तो उनकी यह ईमानदारी सरकारी नल पर कहीं-कहीं आते गंदे पानी से भी कम इस्तेमाल की है। 
दूसरी खबर है कि यूपीए और कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को देश के विमानतलों पर सुरक्षा जांच से मिलने वाली छूट की। हमने अभी पिछले हफ्ते ही यह लिखा है कि राष्ट्रपति के बेटे से एक करोड़ रूपए की चुनावी नगदी के बारे में पूछताछ को देखते हुए ऐसे किसी भी व्यक्ति को किसी सुरक्षा जांच से कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। सुरक्षा एजेंसियों की अगर कोई मजबूरी है तो विशेष छूट मिले हुए राहुल-प्रियंका जैसे लोग अलग से जाएं और उनके परिवार के बाकी लोग सुरक्षा जांच से होकर जाएं। सुरक्षा जांच का रिश्ता सिर्फ इन लोगों से नहीं है, हमारे जैसे बाकी साधारणा मुसाफिरों की जिंदगी से भी है, जिसे खतरे में डालने का कोई हक छूट देने वाले लोगों को नहीं है। किसी ईश्वर ने क्या ऐसा कोई सर्टिफिकेट दिया हुआ है कि भारत के ये ढाई-तीन दर्जन लोग कोई अपराध नहीं कर सकते, या आत्महत्या की नीयत से अपने साथ-साथ और लोगों को भी नहीं उड़ा सकते? ऐसी कोई भी रियायत पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और हमारा पक्का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट तक ऐसा मामला जाने पर अगर वहां के जज अपनी खुद की सुविधाओं को खोने के लिए तैयार होंगे, तो ऐसे विशेषाधिकार तुरंत खारिज करेंगे। 
अभी दो-तीन दिन पहले ही सोनिया गांधी के इसी दामाद की बातचीत हमने दिल्ली के अखबार इंडियन एक्सपे्रस से लेकर छापी थी जिसमें रॉबर्ट ने कहा था कि उनका काम सोनिया के परिवार को दलालों से दूर रखने का है। उन्होंने कहा था कि उनकी भूमिका ऐसे व्यक्ति की है, जो परिवार से दलाल टाइप के लोगों को दूर रखता है और गांधी परिवार तक उन बातों को सीधे पहुंचाता है, जो लोग चाह रहे हैं। अब सवाल यह है कि देश की सबसे कड़ी और बड़ी सुरक्षा व्यवस्था से घिरी हुई सोनिया गांधी तक किस तरह के दलालों की पहुंच है जिन्हें रोकने का जिम्मा रॉबर्ट का है? उनके इर्दगिर्द तो सुरक्षा अधिकारियों का तगड़ा घेरा हर पल रहता है, सरकार के कई और बड़े अफसर उनके इर्दगिर्द रहते हैं, कांगे्रस पार्टी के बड़े दिग्गज पदाधिकारी और नेता सोनिया के इर्दगिर्द रहते हैं, ऐसे में कौन से दलाल वहां तक पहुंचते हैं जिनको रोकने का इतना बड़ा काम उनका दामाद कर रहा है? सच तो यह है कि रॉबर्ट वाड्रा की पूरी बातचीत पूरी तरह से सोनिया और कांगे्रस के खिलाफ जा रही है। और जिन लोगों की सरकार में कोई जवाबदेही नहीं बनती, कांगे्रस पार्टी में कोई जवाबदेही नहीं बनती, वे लोग अगर इस तरह निहायत गैरजरूरी और नाजायज बड़े बोल बोलते हैं तो लोगों को देश का यह सबसे पुराना वंशवाद एक बार फिर खटकने लगता है। हम नहीं जानते कि कांगे्रस पार्टी में ऐसे नुकसान के बारे में सोचने की कोई जगह बच गई है या फिर मुसाहिबों की भीड़ को हम जैसों की ऐसी बातें खटकेंगी, जो भी हो इस देश को वंशवाद के खिलाफ एक आंदोलन की बहुत जरूरत है।







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