अवैध और नैतिक के बीच की दुविधा


20 फरवरी 2012
आजकल
सुनील कुमार
इन दिनों नकल के खिलाफ दुनिया भर में संगीत कंपनियों, फिल्म इंडस्ट्री और किताबों के प्रकाशकों ने अभियान चला रखा है। जो इंटरनेट वेबसाइटें बिना किसी हक के संगीत को अपलोड करके लोगों के लिए मुफ्त में डाऊनलोड करने की सुविधा देती हैं उनमें से कुछ आज कटघरे में हैं। चीन जैसे देश में कॉपीराइट और पेटेंट अधिकारों के खुले बेजा इस्तेमाल के खिलाफ पश्चिमी देश लंबे समय से लगे हुए हैं। इसके बाद भी दुनिया भर के फुटपाथ लोगों को फिल्म, संगीत, किताब के साथ-साथ हर किस्म के फैशन-सामान की नकल देते हैं। और उन लोगों के सपने पूरे करते हैं जो कि उन्हें खरीद नहीं सकते। 
दुनिया के देशों का अपना कानून और उनके बीच के कानून ऐसी किसी भी चोरी या नकल के खिलाफ हैं। लेकिन जब बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी लागत से दर्जनों गुना अधिक दाम कमाने के लिए बाजार में बड़े-बड़े एकाधिकार कायम कर लेती हैं और दवाओं से लेकर जिंदगी बचाने के दूसरे कई किस्म के सामानों तक के दाम भारी मुनाफाखोरी के साथ तय करती हैं तो उसके खिलाफ दुनिया के कोई कानून नहीं है। और जैसा कि हम भारत की विधानसभाओं और भारत की संसद में देखते हैं, दुनिया के अधिकांश देशों में संसद से सरकार तक कारोबार का ऐसा बोलबाला रहता है कि कानून उन्हीं के हक के बनते हैं। 
भारत में सिगरेट और तंबाकू के पैकेटों पर खतरे की तस्वीर छापने का संघर्ष बरसों से चलते आ रहा था, और आज भी उसे कम भयानक दिखाने की मुहिम कंपनियां चला ही रही हैं। भारत में कहने को तो तंबाकू और शराब के इश्तहारों पर रोक है, लेकिन उसी ब्रांड से संगीत की सीडी या सोडा या पानी या कपड़े बनाकर कंपनियां अपने तंबाकू और शराब का प्रचार भी कर ही लेती हैं। यानी बाजार का कारोबार कानून की आंखों में मिर्च झोंक कर अपना काम निकाल लेता है और बाजार के हाथों बिकी सरकारें इसे सरोगेट पब्लिसिटी कहकर चुप बैठी रहती हैं। रोक के खिलाफ ऐसी राह निकालना और लोगों को नुकसान की तरफ बढ़ाना कुछ वैसा ही है जैसा अमरीका दुनिया भर में हवाई हमले करते हुए बेकसूर मौतों को कोलेटरल डैमेज कहकर इंसाफ ठहरा देता है। 
ऐसी बाजार व्यवस्था के खिलाफ, उसके एकाधिकार के खिलाफ लड़ाई का एक मोर्चा पायरेसी या नकल है। जब दुनिया के कानून और बाजार की रणनीति एक गिरोहबंदी करके लोगों के खिलाफ साजिशों को आए दिन पेश करती हैं, तो इसके खिलाफ आत्मरक्षा की लड़ाई में आम जनता को ही क्या पीछे बंधे हुए अपने हाथों के साथ लडऩे की मजबूरी होनी चाहिए? यह सिलसिला बेइंसाफी का है। 
इसलिए जो कंपनी बहुत बड़ी हो चुकी है, जो लेखक बहुत अधिक सफल हो चुका है, जिस फिल्म की खासी कमाई हो चुकी है, फैशन के जो सामान लागत से दर्जनों गुना दाम लेने की हालत में हैं ऐसे सबकी नकल फुटपाथों से लेने में क्या हर्ज है यह बात मेरे मन में ऐसे तमाम मौकों पर आती ही है। किसी भी चीज की नकल की नौबत तभी आती है जब वह एक सीमा से अधिक कामयाब हो चुकी रहती है। किसी मामूली सामान की नकल बनाने की जहमत कौन मोल लेगा क्योंकि मामूली होने से उसके खरीददार भी तो बहुत कम ही होंगे। इसलिए पाइरेटेड किताब उसी लेखक की बाजार में आती है जो बहुत अधिक बिक चुकी है। ऐसे में दुनिया के कानून से परे लोग अगर खुद होकर यह तय करते हैं कि उसकी नकल खरीदने से लेखक और प्रकाशक भूखे नहीं मरेंगे, तो मामूली कमाई वाले लोगों को बाजार के बहुत कामयाब लोगों के बारे में ऐसा सोचने का हक तो है। 
नकल से बने सामान को खरीदना वैसे तो कानून को तोडऩे जैसा है, लेकिन जब बाजार लोकतंत्र से लेकर इंसानियत तक तक सारे कानून को तोडऩे पर आमादा हो, रात-दिन का अपना धंधा ही उसने यह बना रखा हो, तो फिर कानून के टोकरे को अपने सिर पर लादकर चलने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ गरीबों की है? भारत जैसे महान कहे जाने वाले लोकतंत्र में भी हर कानून कमजोर पर तो पूरी ताकत के साथ लादा जाता है और वही कानून ताकतवर के कदमों तक पहुंचते हुए दम तोड़कर बिछ जाता है। 
जिस तरह अंगे्रज-राज में गांधी ने बहुत से कानून तोड़े क्योंकि वे कानून भारत के हक के खिलाफ बने हुए थे। गांधी से लेकर भगत सिंह तक के आजादी के आंदोलन को देखने के दो नजरिए थे, एक से इन्हें बगावत कहा जाता था और दूसरे से इन्हें क्रांति। ठीक इसी तरह आज के बाजार की एकाधिकार की गुंडागर्दी, मनमानी, मुनाफाखोरी और सरकारी नीतियों की बाजारू खरीद-फरोख्त के खिलाफ नकल को कोई अपराध मान सकता है और कोई उसे एक ऐसा विरोध मान सकता है जो कि बाजार की साजिशों का विरोध करने के लिए शायद अकेला बच गया कारगर तरीका है। 
मैं कानून के दायरे में चलने को हमेशा ही सही और बेहतर मानता हूं। लेकिन जब कानून को बनाने और लागू करने वाली पूरी व्यवस्था गरीब के हकों के खिलाफ हो जाए तो ऐसे गरीब या छोटे ग्राहक इस कानून की आंखों में मिर्च झोंककर बाजार की मुनाफाखोरी के खिलाफ नकल खरीदने का एक नैतिक हक तो रखते ही हैं। अब मेरे मन में यह सवाल भी उठता है कि जो नैतिक रूप से सही लग रहा है, वह वैधानिक रूप से सही क्यों नहीं है? जान बचाने वाली किसी दवा के दाम अंतरराष्ट्रीय मुनाफाखोरी के चलते अगर इतने बढ़ा दिए जाते हैं कि गरीब उसे न खरीद पाने की वजह से बेमौत मर जाए तो ऐसी मुनाफाखोरी को वैधानिक बनाने वाला विधान अनैतिक है। और ऐसे विधान को न मानने में कोई बुराई भी नहीं है।
अब एक सवाल यह भी इस बात के साथ-साथ उठता है कि बाजार के किस हिस्से को अनैतिक माना जाए, और किसके खिलाफ लड़ाई में नकल को सही माना जाए यह कौन तय करेगा, और कैसे यह तय होगा? इसके पैमाने क्या होंगे? और क्या इससे एक अराजकता की नौबत नहीं आ जाएगी? यह तमाम बात मोटे तौर पर शहरों के बारे में हो रही है। और यह सोचने-समझने की जरूरत है कि इन सतही शहरी जरूरतों से कहीं अधिक बड़ी जरूरत राजधानियों से दूर के नक्सल इलाकों के आम गरीब लोगों की है। वहां पर नक्सलियों ने या उनके साथ की कुछ जनता ने अगर सरकार के कानून के कुछ हिस्से को जनहित के खिलाफ और अनैतिक मानकर बंदूक का कानून लागू करने का काम किया हुआ है, तो उसमें से कौन सी बात को जायज माना जाए? शहरों में बाजार और कानून की व्यवस्था के खिलाफ जो बगावत मुझे खटक नहीं रही है वह जंगलों में धमाकों के बीच भी क्या नहीं खटकेगी? इन दोनों मिसालों में फर्क सिर्फ एक है, या शायद बड़ा फर्क सिर्फ एक है कि एक में हिंसा शामिल है और दूसरे में खून-खराबे का कोई काम नहीं है।
एक जगह अराजकता को न्यायसंगत मानते हुए दूसरी जगह की अराजकता के खिलाफ मैं कैसे लिख सकता हूं, यह दुविधा किसी एक तर्क पर पहुंचने के लिए रास्ता ढूंढती है। जब तक ऐसी किसी राह का कोई नक्शा मेरे दिमाग में साफ न हो सके, तब तक भी यह बात साफ है कि मैं अपने पैमाने से जो ब्रांड मुनाफाखोर पाता हूं, उनकी जरूरत होने पर नकल को खरीद भी लेता हूं। दो लाख रूपए की किसी घड़ी की दो हजार रूपए वाली चीन की बनी हुई नकल से अगर कुछ लोगों के सपने पूरे होते हैं तो यह नकल उसी तरह अच्छी है जिस तरह भारत में एक किसी साबुन के इश्तहार में, दाग अच्छे हैं, जैसी बात कही गई है। जो नकल किसी सामान के असली ग्राहकों को कम न करे, और मामूली ग्राहकों के सपने भी पूरे कर सके, तो वह नकल शायद अच्छी ही है।
बाजार की हिंसा और साजिशों के खिलाफ जब सरकार, संसद और अदालत, किसी भी जगह लड़ाई कारगर न हो तो शहरों के भीतर बिना खून-खराबे वाली ऐसी अवैधानिक लेकिन नैतिक हक वाली लड़ाई ठीक है। दुनिया में जहां-जहां देश मिलकर बाजार के नए कानून बनाने को जुटते हैं, उन तमाम सम्मेलनों के सामने सड़कों पर सामाजिक संगठन आर्थिक साजिशों के खिलाफ आंदोलन करते खड़े रहते हैं। नकल को बनाना चाहे कोई सामाजिक आंदोलन न हो, लेकिन बाजार के दानवों को कुछ कमजोर करने में गरीब-विरोधी कानून को तोडऩे में क्या बुराई है? दुनिया में जब आर्थिक समानता की सोच पूरी तरह खत्म कर दी गई हो, तो लोगों को यह हक तो मिलता ही है कि वे अपने हिसाब से पूंजी का एक नया बंटवारा करने का नया रास्ता तलाशें। 
अवैध और नैतिक के बीच की यह दुविधा मेरे मन में जारी ही है।

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