संपादकीय
18 फरवरी 12
देश के आधा दर्जन से अधिक गैरकांगे्रसी मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार की एक ऐसी नई निगरानी संस्था राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र (एनसीटीसी) का विरोध किया है। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडू, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश खुलकर इसके खिलाफ आ गए हैं। इसमें केंद्र की यूपीए सरकार के लिए अधिक बड़ी परेशानी पश्चिम बंगाल से है जहां यूपीए की भागीदार पिछले कई महीनों से लगातार केंद्र सरकार से खफा चल रही है और इन दोनों के बीच बिना तनातनी देखे सूरज डूब नहीं रहा है। यूपीए के हिस्सेदारों में से तमिलनाडु में करूणानिधि वैसे ही घायल चल रहे हैं, और बाहर से यूपीए का साथ देने वाले माया-मुलायम के खिलाफ कांगे्रस के नेता लगभग हर घंटे गालियां दे रहे हैं। यह पूरी नौबत एक भयानक कमसमझी का सुबूत है।
लेकिन आज की यह चर्चा हम यूपीए की नासमझी और कमअक्ली भरी बददिमागी पर खराब करना नहीं चाहते। उसके लिए कल तक कांगे्रस फिर सामान जुटा देगी। आज हम इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि भारत के संघीय ढांचे के भीतर केंद्र और राज्यों के अधिकारों को लेकर आज एक ऐसे मुद्दे पर तनाव खड़ा हो रहा है जो पूरे देश को चूर-चूर करने की ताकत रखता है। आतंकवाद विरोधी केंद्र की यूपीए सरकार की सोच राज्यों को उनके अधिकार क्षेत्र में दखल लग सकती है, हो सकता है कि यह कानून व्यवस्था लागू करने के राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में पूरी दखल भी हो। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि जब देश के बहुत से राज्यों में घरेलू और विदेशी आतंक बढ़ते चले जा रहा है तब केंद्र सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है और उसके लिए उसे किस तरह के अभूतपूर्व अधिकारों की जरूरत है? अमरीका की मिसाल सामने है, जो दुनिया भर पर हमले करता है लेकिन खुद अमरीका की जमीन पर उसके खिलाफ किसी तरह के आतंकी हमले के खतरों को लगभग खत्म कर दिया गया है। इसके लिए वहां कुछ ऐसे केंद्रीय कानून हैं जो कि वहां की राष्ट्रीय सरकार को राज्यों के भीतर भी निगरानी रखने और कार्रवाई करने का हक देते हैं। भारत में अमरीका की एफबीआई जैसी कोई संस्था नहीं है। गैरकांगे्रसी पार्टियों की यह आशंका सही है कि ऐसे अभूतपूर्व अधिकारों से लैस कोई केंद्रीय संस्था कांगे्रस जैसे घाघ राजनीतिक दल के हाथों में राजनीतिक साजिशों का हथियार बन सकती है। लेकिन केंद्र पर राज करना न तो कांगे्रस का एकाधिकार है, और न ही दूसरी पार्टियों की सत्ता दिल्ली में आने पर ऐसे किसी बेजा इस्तेमाल से उनको भी रोका जा सकेगा।
ऐसे में हमको यह बात लग रही है कि आशंकाओं के चलते किसी जरूरी संस्था का विरोध करना केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक परेशानी खड़ी करने का काम तो हो सकता है लेकिन इससे देश एक ऐसे खतरे में भी पड़ सकता है जिससे उबरना फिर रातों-रात मुमकिन नहीं होगा। यह कुछ उसी तरह का मामला होगा कि आग लगने पर बाल्टी खरीदने का टेंडर निकालना। आतंक के खिलाफ लडऩे के लिए एक मजबूत केंद्रीय संस्था पहली नजर में ठीक और जरूरी लगती है। लेकिन देश की इस बहुत ही जरूरी जरूरत पर प्रदेशों को सहमत करने की क्षमता कांगे्रस खो चुकी है। वह गिनती के दम पर यूपीए में मुखिया तो बनी हुई है, लेकिन जिन पार्टियों ने उसे आड़े वक्त पर संसद में साथ दिया था उन पार्टियों को भी बिना किसी जरूरत गालियां बकने से वह अपने बड़बोले नेताओं को रोक नहीं पा रही है। आज पूरे देश की राजनीति में कांगे्रस ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि जिसको गाली खानी हो, वह आकर उसका साथ दे।
भारत जैसे चुनाव आधारित लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं जनहित और अपनी चुनावी संभावनाओं के बीच डोलती रहती हैं। ऐसे में इस पेंडुलम को अपनी तरफ करने के लिए उस पार्टी को भी कोशिश करनी पड़ती है जो कि देश पर राज कर रही है या देश पर राज करने वाले गठबंधन की मुखिया हो। कांगे्रस के साथ परेशानी यह है कि उसकी मुखिया से कोई उसी वक्त बात कर सकता है जब मुखिया ऐसा चाहती हैं। और उसके गठबंधन के प्रधानमंत्री न कोई बात करते और न ही उनसे बात का कोई मतलब कांगे्रस की व्यवस्था में निकलता है। ऐसे में यह देश केंद्र के सत्तारूढ़ गठबंधन की नालायकी का दाम चुका रहा है और देश के लिए जरूरी सुरक्षा एजेंसी भी खड़ी नहीं हो पा रही है। लेकिन आखिर हम एक बार फिर सभी राजनीतिक दलों से यह कहना चाहेंगे कि राष्ट्रीय खतरों के मामलों को राजनीतिक हिसाब-किताब से परे रखना चाहिए।

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