महंगा रोए एक बार...


संपादकीय
15 फरवरी 12
देश में जगह-जगह आए दिन सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर हड़ताल पर जाते दिखते हैं। छत्तीसगढ़ में बहुत बरस हुए ऐसी नौबत नहीं आई लेकिन एक दूसरी दिक्कत इस राज्य में बहुत बड़ी यह है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं और लोग नौकरी के लिए मिल नहीं रहे। सरकार के पास अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों का अपना ढांचा है और उसके पास डॉक्टरों की तनख्वाह का पैसा भी है लेकिन लोग यह नौकरी करना नहीं चाह रहे। यहां पर दो अलग-अलग बातों के बारे में सोचना होगा, एक तो यह कि आज की खुली बाजार व्यवस्था में जब डॉक्टरों को निजी काम में अधिक कमाई होती है तो वे कम कमाई और अधिक जवाबदेही, खतरे वाली सरकारी नौकरी में क्यों आना चाहेंगे? दूसरी बात यह कि मेडिकल पढ़ाई इतनी लंबी और महंगी हो चुकी है कि उसके बाद कोई डॉक्टर सरकारी तनख्वाह पर काम करना आमतौर पर तब तक नहीं चाहते जब तक कि उसके साथ उनके मन में निजी प्रैक्टिस की अतिरिक्त कमाई की बात न हो या इन दिनों आम हो चली अतिरिक्त कमाई की बात न हो। आज की सरकारी व्यवस्था में जब नेताओं और बड़े अफसरों के एक हुक्म से कितना भी अच्छा सरकारी डॉक्टर पल भर में निलंबित हो सकता है तो वैसी सरकारी असुरक्षा भी बहुत से डॉक्टरों नहीं सुहाती। नतीजा यह है कि सरकार बार-बार इश्तहार निकालती है और कुर्सियां खाली की खाली रह जाती हैं।
अगर डॉक्टरों की पढ़ाई को देखें तो करीब पांच बरस के बाद मेडिकल कॉलेज से निकला डॉक्टर और एक बरस के बाद अपना काम शुरू कर पाता है। इतनी लंबी पढ़ाई बहुत महंगी भी होती है और तब तक नौजवान डॉक्टरों की भी पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ चुकी होती हैं। ऐसे में जगह-जगह डॉक्टर हड़ताल पर जाते हैं और मरीजों का बुरा हाल होता है। हर प्रदेश की ऐसी खबरें आती हैं कि किस हड़ताल के चलते कितने दर्जन मरीज मारे गए। छत्तीसगढ़ में पिछले मुख्यमंत्री अजीत जोगी तीन साल मेडिकल पढ़ाई के बाद ऐसे डॉक्टरों को तैयार करने का काम शुरू किया था जिनके बारे में यह उम्मीद की जा रही थी कि वे शायद गांव में जाकर काम कर सके क्योंकि बारहवीं के बाद वे तीन-चार बरस में ही कुछ आसान किस्म के इलाज की इजाजत पा लेंगे जिनसे गांवों की या गरीबों की आए दिन की इलाज की जरूरत पूरी हो जाती है। लेकिन जमे हुए डॉक्टरों के संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट तक जाकर इसका पीछा किया और तीन साल के डॉक्टरों की योजना को खारिज करवा दिया। आज कई बरस बाद केंद्र सरकार पूरे देश में उस तरह की योजना बनाकर लागू करने जा रही है। ये उम्मीद की जा सकती है कि उससे साधारण इलाज की इजाजत वाले डॉक्टर गरीबों के बीच कुछ बढ़ सकेंगे। 
लेकिन एक दूसरी बात जिसकी वजह आज हमने यह चर्चा यहां शुरू की है। वह है सरकारी डॉक्टरों की तनख्वाह की। सरकार को आज की बाजार व्यवस्था को देखते हुए डॉक्टरों को इतनी तनख्वाह तो देनी ही होगी कि इलाज के सरकारी ढांचे की कुर्सियां खाली न पड़ी रहें, और उस ढांचे पर सरकार का पैसा बर्बाद न होता रहे। एक डॉक्टर की कमी से अगर अस्पताल बिना काम के पड़ा हुआ है, तो डॉक्टरों की तनख्वाह को कम रखने का क्या फायदा? एक डॉक्टर आज अपनी साधारण क्षमता से जितना कमा सकता है उसे पूरी तरह अनदेखा करके सरकार कभी एक कामयाब ढांचा नहीं बना सकती। और एक के बाद एक, देश और प्रदेश की सरकारें गरीब जनता के इलाज की जिम्मेदारी से अपने-आपको पीछे हटाते जा रही है। यह सिलसिला सबसे गरीब तबके के लिए सबसे अधिक नुकसानदेह है क्योंकि वह महंगे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकता।
हम सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों, चिकित्सकों, सांसदों और विधायकों, इन सभी के लिए अधिक तनख्वाह के हिमायती हैं क्योंकि हमारा मानना है कि दुनिया की खुले बाजार की संभावनाओं के मुकाबले बहुत पीछे रहने पर सरकारी कामकाज के लिए, या संसद या विधानसभा के लिए अच्छे और काबिल लोगों का आना नहीं बढ़ेगा और भ्रष्टाचार को कम करने की गुंजाइश भी कम रहेगी। सरकार को अधिक तनख्वाह देकर बेहतर लोगों को लाना और उन्हें ईमानदार बने रहने जितनी सहूलियतें देना चाहिए। बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं, सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। जिस तरह सरकारी खरीद के सामान के बारे में बाजार में यह चर्चा रहती है कि उसका अधिक से अधिक घटिया होना तय है, उस तरह की बात सरकारी नौकरियों में आने वाले लोगों के बारे में नहीं होना चाहिए। अधिक तनख्वाह के साथ-साथ अगर सरकार अधिक जवाबदेही और उत्पादकता जोड़ सकती है तो महंगे लोग जनता को सस्ते ही पड़ेंगे। फिलहाल बात डॉक्टरों पर से शुरू हुई थी और देश की सभी सरकारों को बिना देर किए अच्छी तनख्वाह पर डॉक्टरों को रखना चाहिए क्योंकि यह मोलभाव का मामला नहीं है, उस गरीब जनता की सेहत का मामला है जो सत्ता पर बैठे लोगों की तरह महंगे अस्पतालों में नहीं जा पाती है।

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