संपादकीय
16 फरवरी 12
उत्तरप्रदेश के विधानसभा के चुनाव में अब तब 55-60 फीसदी वोट डले हैं। इसमें भी उन सीटों पर अधिक वोट डले हैं जहां से गुंडे-बदमाश चुनाव लड़ रहे हैं या फिर जो नक्सल इलाकों की सीटें हैं। मतलब यह कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन वाले उत्तरप्रदेश के मतदाता अधिक वोट डाल रहे हैं। दूसरी तरफ इस वक्त मुंबई में म्युनिसिपल चुनावों के वोट डल रहे हैं, और घनी शहरी आबादी की वजह से कुछ कदमों की दूरी पर जो पोलिंग बूथ हैं वहां तक भी पहुंचने में लोग ठंडे बैठे हुए हैं। इस पल ट्विटर पर बहुत से जाने-माने लोग लिख रहे हैं कि जो लोग आज वोट डालने नहीं निकलें, वे लोग पांच बरस तक सड़क, नाली, पानी की कोई शिकायत न करें।
न सिर्फ चुनावों में वोट डालने की जागरूकता बल्कि बहुत सी दूसरी तरह की जागरूकता को लेकर हिन्दुस्तान का एक शहरी, पढ़ा-लिखा या दौलतमंद तबका, गरीबों, गांववालों और अनपढ़ों को तरह-तरह से कोसते रहता है और हर किस्म के पिछड़ेपन के लिए उनको जवाबदेह मानता है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक चेतना, सामाजिक चेतना और सुधार का इन बातों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। शराब को बुरी चीज मानने वाले लोग अपनी इस नापसंद को पल भर के लिए अगर अलग रखने को तैयार हों, तो देश के बहुत से आदिवासी इलाकों में आदमियों के साथ-साथ औरतों को भी बराबरी से शराब पीने का हक मिला हुआ है। शराब की अच्छाई और बुराई पर चर्चा किसी दूसरी जगह हो सकती है, इस बात को कहने का हमारा मकसद यह बताना है कि शहर, संपन्नता और पढ़ाई से दूर का आदिवासी समाज किस तरह औरत-मर्द की समानता पर अधिक भरोसा रखता है। भारत के शहरी मध्यम और उच्च वर्ग में क्या महानगरों से परे इस बात की कल्पना की जा सकती है कि औरतें भी बराबरी से बैठकर पी सकें? शुद्धतावादियों को यह लग सकता है कि पीना खराब है और हम यहां पीने की वकालत कर रहे हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि औरत-मर्द के बीच का भेदभाव पीने के मुकाबले भी कहीं अधिक बुरी बात है।
आदिवासियों के बारे में हम एक बात यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि बिना पढ़ाई-लिखाई और बिना टेलीविजन वाले दिनों में, भारत के आपातकाल के अंत में हुए आम चुनावों में आदिवासियों ने नेहरू की बेटी को खारिज कर दिया था। जब भारत का शहरी तबका आपातकाल के सारे महीनों में वक्त पर चलने लगी रेलगाडिय़ों पर मुग्ध होकर 'अनुशासन पर्वÓ मना रहा था, तब जंगलों में बसे, शहरी जुबान में कहें तो, अनपढ़ आदिवासियों ने इंदिरा-संजय को एकमुश्त खारिज कर दिया था। ऐसे आदिवासियों को आज हिंदुस्तान में उनके अपने किस्म के धर्म और ईश्वर की धारणा के साथ जीने भी नहीं दिया जा रहा और उन्हें एक शहरी-संगठित धर्म का बताने का काम चल रहा है। लेकिन यह एक अलग मुद्दा है जिस पर बात कभी और।
इसी तरह इस देश में एक यह सोच बनी हुई है कि लोग गरीबी की वजह से भ्रष्ट हो जाते हैं। कोई गरीबी की बेबसी में हो सकता है कि कोई पहला भ्रष्टाचार कर लेता हो। लेकिन इस भ्रष्टाचार की संपन्नता के बाद तो वह उतना गरीब भी नहीं रहता, और आगे के तमाम भ्रष्टाचार तो ऐसे लोग संपन्नता आ जाने के बाद भी जारी रखते हैं। दूसरी तरफ जब दूसरी-तीसरी और चौथी पीढ़ी के दौलतमंद लोग हर किस्म की बेईमानी और जालसाजी करते हुए पैसा कमाते हैं, तो वे गरीबों के लिए संपन्न तबके द्वारा सहेजकर रखी गई गालियों गलत साबित करते हैं। हमारा लंबा अनुभव यह है कि संपन्न लोग अधिक बेईमान होते हैं, वे अधिक अपराध करते हैं, वे अधिक गलत काम करते हैं, क्योंकि उनके पास इन कामों की सजा से बच निकलने के लिए पैसों की ताकत होती है। गरीब क्या खाकर ऐसे काम करने का हौसला करेगा जिससे कि बच निकलने के लिए उसके पास न तो जमानत की रकम होती, न रिश्वत होती, और न ही महंगे वकील की फीस उसके पास होती। जो इंसाफ को खरीद नहीं सकता वह जुर्म करने के पहले कई बार ठिठकता होगा।
उत्तरप्रदेश के चुनाव में नक्सली इलाकों में गांवों के मतदाता और आदिवासी मतदाता जिस बड़ी संख्या में पहुंचे हैं, वे मुंबई जैसे महानगर के मतदाताओं के मुंह पर एक तमाचे की तरह हैं जिनको मुंबई सिर्फ दूधवाले भैया की तरह जानता है। इस वक्त आ रही खबरें बताती हैं कि मुंबई में जो दौलतमंद इलाके हैं वहां किसी को वोट डालने की परवाह कम ही है।
भारत में सामाजिक बोलचाल की जुबान में, और बहुत से गैरजिम्मेदार मीडिया में भी एक संपन्न परिवार से जुड़ी खबरों में उसे अच्छे और प्रतिष्ठित परिवार जैसे शब्दों के साथ पेश किया जाता है। मानो दौलत अच्छाई का दूसरा नाम हो और दौलत प्रतिष्ठा का प्रतीक हो। इसी तरह गंवईयां शब्द को या देहाती शब्द को कम समझदार, अनजान और पिछड़े हुए के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मेहनतकश और ईमानदार गरीब को भी कंगले और दो कौड़ी के इंसान की तरह गिना जाता है, मानो चोरी की गिन्नियों से लदे इंसान बेहतर होते हों और पसीने की कौडिय़ां कोई दाग हों।
ऐसी गाली-गलौज की जुबान इस्तेमाल करने वाले लोग मतदान के दिन अपने-आपको बेहतर तो साबित करके दिखाएं।

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