25 जनवरी 2014
संपादकीय
महाराष्ट्र के सेवाग्राम में कल दर्जन भर राज्यों से आए पंचायत-प्रतिनिधियों से बात करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि 50 फीसदी सांसद सांसद स्थानीय क्षेत्रीय विकास निधि (एमपीलैड) के पक्ष में नहीं हैं। केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने पिछले महीने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर योजना के प्रावधानों में बदलाव या इसकी जगह नया कार्यक्रम लाने की मांग की थी। राहुल ने कहा कि इस योजना में इतना धन नहीं मिलता कि पूरे संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य कराया जा सके। इससे लोकसभा क्षेत्रों में सदस्यों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस बारे में सोचना चाहिए।
कुछ वक्त पहले एक प्रमुख जनसंगठन मास फॉर अवेयरनेस की रिपोर्ट में यह सामने आया था कि पिछले तीन बरस में लोकसभा के सांसद अपनी सांसदनिधि की एक तिहाई रकम भी खर्च नहीं कर पाए हैं। गरीबों के लिए संसद में सबसे अधिक बढ़-चढ़कर जो लोग बोलते हैं उनमें से एक, बिहार के छपरा के सांसद लालू प्रसाद यादव ने तीन बरस में मिले चौदह करोड़ रूपए में से एक पैसा भी खर्च नहीं किया है। इतनी ही रकम हर सांसद को मिली है लेकिन एनडीए के संयोजक शरद यादव उसमें से कुल पैंसठ लाख खर्च कर पाए। इस अध्ययन का एक दिलचस्प आंकड़ा यह है कि हिमाचल में भ्रष्टाचार के मामले में अदालत में खड़े हुए वहां के भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने सांसद रहते हुए अपनी सांसदनिधि से सबसे अधिक आबंटन किया था। दिल्ली की खबर है कि बड़े-बड़े नेताओं ने सांसद निधि से उन्हें अपने चुनाव क्षेत्र ने सार्वजनिक काम करवाने के लिए मिलने वाली बड़ी रकम खर्च करने की जहमत ही नहीं उठाई है।
सांसदनिधि की चर्चा होने पर यह याद पड़ता है कि किस तरह कुछ समय पहले कुछ सांसद इस बजट से आबंटन करने के लिए कमीशन के विवाद में घिरे थे, और इस पर संसद में चर्चा भी हुई थी। इसी तरह राज्यों में विधायकों के लिए विधायक निधि बना दी गई है जिससे कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने चुनाव क्षेत्रों के कुछ कामों के लिए रकम मंजूर कर सकें। दरअसल पंचायत व्यवस्था लागू होने के बाद शहरी संस्थाओं और पंचायतों के अलग-अलग स्तरों पर सारा खर्च उन्हीं के मार्फत होता है और सांसद-विधायक खाली हाथ, चुनाव क्षेत्र में बिना अधिकार रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि ये लोग सांसद और विधायक को वित्तीय अधिकार मिलने की वकालत करते हैं ताकि अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों को कुछ संतुष्ट कर सकें।
हम पहले भी कई मौकों पर सांसद-निधि या इसी तरह के विवेक के दूसरे अधिकारों के खिलाफ लिखते आए हैं। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि संसदीय व्यवस्था में सांसदों और विधायकों का काम सदन में सरकार के कामकाज, सार्वजनिक मुद्दों और दीगर बातों को उठाने का रहता है और नए कानून बनाने या पुराने कानून में संशोधन की जरूरत पडऩे पर उन पर विचार रखने और वोट डालने का रहता है। सरकार से संबंधित कई किस्म की रिपोर्ट सदन में रखी जाती है, सरकार वहां बजट रखती है, टैक्स प्रस्ताव रखती है, और उस पर भी सांसद और विधायक अपने-अपने सदनों में बात करते हैं। यह काम अपने चुनाव क्षेत्र में किसी रकम मंजूर करने से बिल्कुल अलग है, और ऐसे किसी बजट की जरूरत कानून निर्माताओं को होनी भी नहीं चाहिए। सांसद और विधायक को अपने इलाके में स्थानीय संस्थाओं के साथ ऐसे संबंध रखने चाहिए कि वे चुनाव क्षेत्र की दिक्कतों और संभावनाओं पर स्थानीय संस्थाओं से बात कर सकें। लेकिन अपने हाथों, अपने विवेक से कुछ बांटने की सामंती और राजसी आदत भारत जैसे देश में सैकड़ों बरस से चली आ रही है, और किसी व्यवस्था के तहत बंधकर ही काम करना लोगों को बेबसी सा लगता है। इसलिए किसी समय स्कूटर और टेलीफोन का सांसद कोटा होता था, अभी भी शायद रसोई गैस कनेक्शनों का सांसद कोटा है, केन्द्रीय विद्यालयों में प्रवेश का कोटा है, ट्रेन में आरक्षण का कोटा है जिसके बाजार में बिकने की बहुत चर्चा रहती है।
लोकतंत्र में विवेक का अधिकार कम से कम होना चाहिए, और सांसदनिधि और विधायकनिधि लोकतांत्रिक सोच के ठीक खिलाफ है। बहुत सी जगहों पर यह चर्चा भी रहती है कि इससे आबंटन करने के लिए जनप्रतिनिधि या उनके सहायक कमीशन भी लेते हैं। बिना किसी सुबूत के इस बात को ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं है, लेकिन इस तरह के सारे फंड खत्म होने चाहिए, विवेक के सारे अधिकार खत्म होने चाहिए। किस बच्चे को स्कूल में दाखिला दिया जाए, इसे सांसद के विवेक के अधिकार पर क्यों छोड़ा जाए? ऐसे में सबसे अधिक हकदार बच्चे स्कूल के बाहर रह जाएंगे और सांसद की सिफारिश पर उनके पसंदीदा बच्चे केन्द्रीय विद्यालय में पहुंच जाएंगे। विवेक के अधिकार की हसरत का तो कोई अंत नहीं हो सकता, यह बढ़ते हुए नौकरी बांटने तक भी जा सकती है, और खदान बांटने तक भी जा सकती है। आज देश की जो हालत है उसमें सार्वजनिक जीवन के लोगों को, जनता के पैसों का, समानता के अधिकारों का अपने विवेक से इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। काफी समय से देश में यह चर्चा चल रही है कि विवेक के ऐसे अधिकार खत्म हों, और अब जब संसद पर लोगों का भरोसा न रह जाने की बात हो रही है, तो ऐसे अविश्वास के जो भी कारण हो सकते हैं उनको दूर करना भी जरूरी है।

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