27 जनवरी 2014
संपादकीय
गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का यह भाषण, इस दिन का उनका पहला भाषण था, और यूपीए सरकार के इस कार्यकाल का आखिरी गणतंत्र दिवस भी यही था। इसलिए लोग राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संदेश को एक राजनीतिक और चुनावी संदेश की तरह भी देख रहे हैं, और एक व्याख्या यह हो रही है कि उन्होंने परंपरागत विवादहीन संदेश के बजाय एक जीता जागता संदेश दिया है जो एक नजरिए से देखने पर आम आदमी पार्टी पर हमला करते हुए भी लगता है, दिखता है। उनके भाषण को हम विस्तार से छाप रहे हैं इसलिए पूरी बातों को यहां लिखना गैरमुनासिब होगा, लेकिन आम आदमी पार्टी पर हमले की तरह जो लाईन दिख रही है, वह यह है- ''लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती।ÓÓ
उनकी यह बात जाहिर तौर पर इस पार्टी पर भी लागू होती है, लेकिन यह बात सिर्फ इसी पर लागू नहीं होती। इसी सांस में उन्होंने कुछ और बातें भी कही हैं- ''सार्वजनिक जीवन में पाखंड का बढऩा भी खतरनाक है। चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। ÓÓ इन बातों को देखें तो यह साफ है कि कल तक वित्त मंत्री रहे हुए प्रणब मुखर्जी ने देश की अर्थव्यवस्था की आज की बदहाली, और राजनीतिक दलों, राज्य और केन्द्र सरकारों द्वारा जनता को रियायतों के तोहफों के बारे में एक ऐसी बात कही है, जो कि देश को डूबने से बचाने के लिए कोई भी अर्थशास्त्री, या कोई भी वित्त मंत्री कह सकते हैं, या अर्थव्यवस्था की समझ रखने वाले लोग ऐसा कहते ही रहते हैं। यह बात उसी सांस में कही गई है, और यह सिर्फ केजरीवाल पर लागू नहीं होती। दूसरी बात यह कि लोकलुभावन अराजकता के खिलाफ उन्होंने जो कहा है, वह बात तो बहुत से सामाजिक संगठनों पर लागू होती है, और इसमें केजरीवाल-विरोधी संगठन भी शामिल हैं, जो कि सड़कों पर हैं। कल की ही बात लें, तो महाराष्ट्र में राज ठाकरे के भड़काऊ और हिंसक बयान के बाद महाराष्ट्र में कई जगहों पर उनके कार्यकर्ताओं ने टोल टैक्स देने के बजाय टोल नाकों पर तोडफ़ोड़ और हिंसा की। इसलिए लोकलुभावन अराजकता के एक नायक, या खलनायक, अरविंद केजरीवाल का कोई एकाधिकार इस अराजकता पर नहीं है। देश में गैरराजनीतिक ताकतों ने भी कई मौकों पर ऐसे आंदोलन किए हैं जो जनता को लुभाने वाले थे, लेकिन अराजक थे। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, आरक्षण के नाम पर, क्षेत्रीयता के नाम पर कितने ही ऐसे अराजक आंदोलन होते रहते हैं। इसलिए आज ऐसी अराजकता के सबसे बड़े मुजरिम अरविंद केजरीवाल पर ही यह निशाना लगा हो, ऐसा नहीं है। यह जरूर हो सकता है कि वे आज इस अराजकता के सबसे बड़े झंडाबरदार हैं, और इसलिए राष्ट्रपति की बात उन्हीं पर सबसे अधिक लागू होती है।
अगर बहस के लिए, कुछ देर के लिए हम यह मान भी लें कि केजरीवाल का नाम लिए बिना राष्ट्रपति ने उन पर हमला किया है, तो भी हमको एक मुर्दा भाषण के बजाय एक जिंदा भाषण बेहतर लगता है, जो कि भारतीय लोकतंत्र के खतरों पर हमला करता है, जनता को आगाह करता है। राष्ट्रपति ने तो देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना कुछ कहा है, और यह भी कहा है कि अगर सरकारें भ्रष्टाचार को खत्म नहीं करेंगी तो मतदाता उनको हटा देंगे। पहली नजर में कोई प्रणब मुखर्जी की इस बात को यूपीए पर हमला भी करार दे सकते हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के सबसे बड़े आरोप आज यूपीए सरकार पर ही लगे हैं। लेकिन जैसा उन्होंने लोकलुभावनी अराजकता, और रियायतों के नामुमकिन से वायदों के खिलाफ कहा है, उसी तरह यह बात भी कही है। और हम इसे देश के हालात की कई अलग-अलग मिसालों पर हमला मानते हैं, सिर्फ आम आदमी पार्टी, या यूपीए पर नहीं।
15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे मौकों पर परंपरागत मुर्दा भाषणों का कोई मतलब नहीं है। देश की हकीकत, और आज के हालात को देखते हुए, सच से मुंह मोड़े बिना, ठोस बात करनी चाहिए, और प्रणब मुखर्जी ने वैसा ही किया है।

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