तीस बरस पुरानी अंग्रेज चि_ियों से हिन्दुस्तानी जख्म फिर हरे..

15 जनवरी 2014
संपादकीय
स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को बाहर करने के लिए इंदिरा सरकार द्वारा की गई फौजी कार्रवाई को लेकर एक नया बवाल खड़ा हो गया है कि क्या उसमें इंदिरा ने ब्रिटेन की मदद ली थी? ब्रिटेन के नियमों के मुताबिक तीस बरस पूरे होने पर जो गोपनीय सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक कर लिए जाते हैं, उन दस्तावेजों में से ब्रिटिश सरकार की ऐसी चि_ियां सामने आई हैं, जो ऐसी मदद की चर्चा करती हैं। ऑपरेशन ब्लूस्टार, उसके बाद उसकी प्रतिक्रिया में इंदिरा गांधी की हत्या, और उसकी प्रतिक्रिया में देश के कई हिस्सों में सिक्ख विरोधी दंगों और हत्याओं के जख्म भरते दिख नहीं रहे हैं। दिल्ली की अदालतों में चौथाई सदी गुजर जाने के बाद भी इंसाफ की कोई खबर नहीं है। कांग्रेस पार्टी इन दंगों के वक्त की अपनी जवाबदेही को समझने के बजाय इन दंगों के दागी अपने नेताओं को बचाती रही, बढ़ाती रही, चुनाव लड़वाती रही, और मंत्री बनाती रही। ये राजनीतिक फैसले हजारों लोगों को खोने वाली सिक्ख बिरादरी के जख्मों पर नमक घिसने सरीखे थे, और वे जख्म अब तक रिस ही रहे हैं। 
हालांकि हम इस बात को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते कि भारत में स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई करने के पहले ब्रिटेन से ऐसी कार्रवाई के तजुर्बे की मदद मांगी थी या नहीं। इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि आतंकियों को मारने के लिए कौन किससे मदद लेते हैं? अगर इंदिरा सरकार ने ब्रिटेन से ऐसी मदद मांगी थी, तो उसके पीछे यह सोच भी हो सकती है कि कम से कम नुकसान के साथ यह कार्रवाई पूरी हो जाए। और अगर ऐसी सोच थी, तो उसके लिए दूसरे देश से फौजी तजुर्बा लेने में क्या गलत था? पूरी दुनिया के देश जुर्म और दहशतगर्दी से जूझने में एक-दूसरे की मदद लेते हैं, एक-दूसरे को मदद देते हैं। इसलिए आज जाहिर हुए ब्रिटिश दस्तावेज एक चर्चा छेड़ रहे हैं, लेकिन हमारा मानना है कि इस मुद्दे में कोई वजन नहीं है। इससे लोगों को पुरानी चर्चा नए सिरे से छेडऩे में तो मदद मिल रही है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र इस बात से बदनाम नहीं होता कि वह किसी और देश की फौजी खूबियों का इस्तेमाल अपने लोगों के नुकसान को कम करने के लिए कर रहा था। 
आज दरअसल दुनिया में आतंक का कारोबार देशों की सरहदों की इज्जत नहीं करता। इसीलिए बहुत से देश दूसरे देशों पर कार्रवाई करने में गिरोहबंदी भी करते हैं, और दूसरे देशों के अपने हक को कुचलते हुए भी जाकर कार्रवाई करते हैं। अमरीका जैसे देश कितने ही देशों पर, कितने ही बेकसूर देशों पर आतंक के खात्मे के नाम पर फौजी कार्रवाई करते हैं, और लाखों बेकसूरों को मारते हैं। आज पश्चिम की दुनिया में, खासकर अमरीका में वहां की अदालत 1984 के दंगों के लिए सोनिया गांधी को नोटिस भेज चुकी है, क्योंकि वहां सिक्खों के एक संगठन ने इंदिरा परिवार में होने की वजह से सोनिया को भी 1984 की इस हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराया है। लेकिन सोनिया गांधी की जवाबदेही से बहुत पहले खुद अमरीका के राष्ट्रपति की जिन फौजी कार्रवाईयों में आए दिन कई देशों में दर्जनों बेकसूर मारे गए, उनके बारे में अमरीकी अदालतों के पास करने को शायद कुछ नहीं है। ऐसे में ब्रिटिश सरकार के कुछ अंदरूनी दस्तावेजों के इस्तेमाल से कांग्रेस के खिलाफ हिन्दुस्तान में एक बार फिर अगर एक समाज को भड़काया जा सकता है, तो ऐसी कोशिश से कोई किसी को लोकतंत्र में रोक नहीं सकते। 
लेकिन हम 1984 के दंगों, उसके पहले इंदिरा गांधी की हत्या, और उसके पहले स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई के बारे में सोचें, तो फिर यह भी सोचने की जरूरत है कि स्वर्ण मंदिर पर किस तरह हत्यारे-आतंकियों का कब्जा हो चुका था, और उसके बारे में कोई दूसरी सरकार, सिक्खों की कोई दूसरी संस्था, कोई धार्मिक संगठन, कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। और इंदिरा सरकार को एक ऐसी कार्रवाई करनी पड़ी थी जिसमें उनको और उनके परिवार को न सिर्फ हत्यारों के, बल्कि राजनीतिक हत्या के खतरे के सामने भी खड़ा कर दिया था। हमको नहीं लगता कि इंदिरा गांधी के लिए भी स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई का फैसला आसान या सहूलियत का था, लेकिन सरकार को कुछ कड़वे फैसले भी लेने पड़ते हैं। इस फैसले के बाद, और इसके पहले भी, सरकार से परे राजनीतिक रूप से इंदिरा गांधी को, और फिर राजीव गांधी को जो कुछ करना था, उसमें कांग्रेस पार्टी ने बड़ी चूक की थी, और उसी का नतीजा है कि आज ब्रिटिश सरकार के ये दस्तावेज फिर भावनाओं को भड़काने का सामान बन रहे हैं। 

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