प्रधानमंत्री से जनता को सवाल पूछने के सीधे मौके की जरूरत

03 जनवरी 2014
संपादकीय

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आज सुबह की सवा घंटे से अधिक की प्रेस कांफ्रेंस बहुत कुछ नहीं निकाल पाई। इसमें उनकी कमजोरी कम है, वहां मीडिया के जिन दर्जनों लोगों को सवाल पूछने के मौके मिले, अगर उनको मर्जी के सवाल पूछने की इजाजत थी, और सवाल पहले से दाखिल नहीं करने पड़े थे, तो हम यही कहेंगे कि हिन्दुस्तानी मीडिया ने मनमोहन सिंह के साथ बड़ा रहम किया, और जलते हुए, तेजाबी मुद्दों पर उनसे तीखे सवाल नहीं किए। लेकिन जैसा कि किसी भी बड़े ओहदे पर बैठे हुए लोगों की प्रेस कांफ्रेंस में होता है, मनमोहन सिंह से भी सवाल पूछने के लिए दर्जनों लोगों की भीड़ बची हुई थी, और उनके सवाल भी देश की जनता के सामने नहीं आ पाए। इस प्रेस कांफ्रेंस के पहले से हम इसके बारे में सोच रहे थे, और इसके खत्म हो जाने के बाद भी सोच रहे हैं, तो लग रहा है कि भारत जैसे विशाल देश के प्रधानमंत्री से सवाल पूछने और जवाब पाने का सिलसिला इस एक प्रेस कांफ्रेंस के साथ थम नहीं जाना चाहिए। और आज जब इंटरनेट पर सवाल-जवाब की मुफ्त सहूलियत चुनिंदा अखबारनवीसों से परे भी लोगों को है, तो इस मौके का इस्तेमाल खुद प्रधानमंत्री को भी करना चाहिए। लोकतंत्र में लोगों के मन में सवाल बेजवाब पड़े रहें, यह ठीक नहीं है। 
हमको पौन सदी और उसके भी पहले की महात्मा गांधी की याद आती है जो कि अपने अखबारों में देश भर के लोगों से आए हुए पोस्टकार्डों पर मिले सवालों के जवाब लिखते थे। उनमें आजादी की लड़ाई से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक पर गांधी क्या सोचते थे, यह सामने आता था। आज की प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बहुत से सवालों के जवाब में यह कहा कि उनके कामकाज पर इतिहासकार अपनी राय लिखेंगे। इतिहास तो बहुत सी चीजों को दर्ज करते ही आया है, और अब तो टेक्नॉलॉजी की मदद से इतिहास अधिक दूर तक, अधिक बारीकी से, अधिक सुबूतों के साथ चीजों को दर्ज करता है। लेकिन दुनिया में डायरी लिखने का भी एक सिलसिला चलता आया है। कल तक की कागजी डायरी ने आज ब्लॉग की शक्ल ले ली है, और अमिताभ बच्चन से लेकर लालकृष्ण अडवानी तक हर तरह के लोग अपने ब्लॉग लिखते हैं। हमको भरोसा है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद मनमोहन सिंह भी अपने संस्मरण लिखेंगे, और शायद अपनी आत्मकथा भी। लेकिन आज जरूरत यह है कि मीडिया के सतही सैलाब की सुनामी में बह जाते लोगों को इतिहास में दर्ज होने वाले लोगों से बिना मीडिया सीधे भी कुछ जवाब मिल सकें। 
आज भारत का प्रधानमंत्री कार्यालय ट्विटर जैसे सक्रिय सामाजिक मीडिया का इस्तेमाल कर ही रहा है। और वहां पर प्रधानमंत्री की तरफ से कई घोषणाएं और फैसले पोस्ट भी किए जाते हैं। उनके औपचारिक भाषण प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर भी आते हैं। लेकिन एक ऐसा सिलसिला शुरू करने की उनको जरूरत लगती है जिसके तहत लोग प्रधानमंत्री को अपने सवाल भेज सकें, और फिर वे उनमें से जिनके जवाब देना चाहें, उनको जवाब सहित वेबसाइट पर डाल सकें। इससे वह नौबत भी सुधरेगी जिसके तहत यह कहा जाता है कि भारत का मीडिया किसी एक नेता या पार्टी का हिमायती है, या किसी दूसरे नेता और पार्टी का बड़ा बुरा आलोचक है। आज जब जनता और नेता दोनों को बिना एक बिचौलिए मीडिया के, खुद एक-दूसरे से मुखातिब होने का मौका हासिल है, तो इसका इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए, जनता के राजनीतिक शिक्षण के लिए, जनमत को जानने के लिए होना चाहिए। 
यह जरूर है कि ऐसा कोई सिलसिला आरोपों से घिरी हुई सरकार के लिए, उसके नेता के लिए कुछ मुश्किल हो सकता है, लेकिन ऐसे ही सिलसिले से उस नेता को, या उसकी सरकार या पार्टी को जनता के बीच अपनी बात को बेहतर तरीके से रखने का मौका भी मिल सकता है। हमारा मानना है कि भारत की राजनीतिक दलों को, देश-प्रदेश की सरकारों को, चुनिंदा मीडिया के सवालों के जवाब के साथ-साथ, जनता से सीधे आने वाले सवालों के जवाब देने की एक परंपरा शुरू करनी चाहिए। हर पार्टी और हर सरकार अपनी वेबसाइटों पर ऐसे सवालों के लिए सहूलियत दे सकती हैं, और फिर उनमें से जवाब के लिए छांटे गए सवाल के साथ अपनी बात इंटरनेट पर डाल भी सकती है। यह लोकतंत्र सूचना के अधिकार का एक किस्म का अलिखित और अघोषित विस्तार भी होगा, और यह कानून के तहत न्यूनतम जिम्मेदारी से ऊपर उठकर सूचना देने की जिम्मेदारी की तरफ एक कदम भी होगा। 
भारतीय लोकतंत्र में आज मीडिया और सामाजिक जनजीवन, सामाजिक मीडिया, और जनचर्चाओं में बहुत से मुद्दों पर असंतुलित या अनुपातहीन चर्चा होती है। लोग मजे के लिए, कटाक्ष या व्यंग्य करने के लिए, कोसने या गाली देने के लिए, बदनाम करने या किसी की स्तुति करने के लिए नारों की तरह के ट्वीट गढ़कर उनको बात की बात में फैला देते हैं। और यह सिलसिला कभी भी कम होने वाला नहीं है। इसलिए सरकार, पार्टी, या किसी संगठन या नेता की तरफ से उनकी औपचारिक बात कहने के लिए, जनता के सामने उनका सच रखने के लिए, जिम्मेदारी से सवाल-जवाब होने चाहिए। आज की प्रधानमंत्री की पत्रवार्ता को लेकर लिखने को बहुत कुछ नहीं है, सिवाय इसके की जनता के मन में जो दर्जनों सवाल भरे हुए हैं, वे इसमें पूछे भी नहीं गए, और लोकतंत्र में किसी मध्यस्थ मीडिया के बिना भी जनता को सीधे यह मौका मिलना चाहिए। 

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