कश्मीर को लेकर प्रशांत भूषण की पार्टी पर हमले से जुड़े पहलू

08 जनवरी 2014
संपादकीय
देश के एक बड़े वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता, और अब आप के एक प्रमुख राजनेता, प्रशांत भूषण पर कुछ महीने पहले भी एक उग्र हिन्दू संगठन के लोगों ने हमला किया था, जब उन्होंने कश्मीर को लेकर कुछ बयान दिए थे। अभी फिर कश्मीर पर उनके बयान को लेकर एक तनाव खड़ा किया जा रहा है, और दिल्ली में सत्तारूढ़ इस पार्टी के दफ्तर पर आज फिर उन्हीं हिन्दू कार्यकर्ताओं ने हमला किया है। किसी भी धर्म, जाति, आध्यात्मिक संगठन, या राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोग जब हमले पर उतारू होते हैं, तो यह जाहिर रहता है कि उनके पास तर्क खत्म हो चुके हैं। ऐसे ही हिन्दू संगठन संस्कृति रक्षा के नाम पर, नैतिकता कायम करने के नाम पर कर्नाटक में भी नौजवान पीढ़ी पर हिंसक हमले करके अपनी मौजूदगी देश भर में दर्ज करा चुके हैं। और अब उत्तर भारत में वे प्रशांत भूषण पर यह दूसरा हमला कर चुके हैं। 
लेकिन आज हम यहां पर न तो सिर्फ ऐसे हमलों पर बात शुरू करके, उसी पर खत्म करना चाहते, और न ही हम कश्मीर के मुद्दे पर बात को ले जाना चाहते हैं। कश्मीर का मुद्दा एक जटिल मुद्दा है, और उससे जुड़े हुए पहलुओं पर पहले खासे लंबे लेख की जरूरत है, उसके बाद ही उस पर हमारे विचार हमारे पाठकों के काम के हो सकते हैं। फिलहाल आज हम यहां पर इन दो मुद्दों से थोड़ा सा हटकर, किनारे के एक मुद्दे पर बात करना चाहते हैं कि कश्मीर को, या कि बांग्लादेश, गोवा हो, या कि सिक्किम, ऐसे बहुत से मौके और मुद्दे रहते हैं जिनमें सही या गलत, संवैधानिक या असंवैधानिक, ये बातें एक किनारे रखकर दुनिया के किसी भी देश को अपने व्यापक हितों को देखना पड़ता है। यहां पर हम कश्मीर के लोगों के हक को अनदेखा करते हुए यह बात नहीं कर रहे हैं, और न ही वहां के ऐतिहासिक समझौते के खिलाफ कोई बात कर रहे हैं। हमारी कुल जमा बात यह है कि किसी देश के व्यापक हित कई बार नैतिकता से, कानून से, और ऐतिहासिक समझौतों से परे भी रहते हैं, और उनको देखते हुए ही कई बार फैसले लिए जाते हैं। 
अब बांग्लादेश को बनाने की बात करें, तो बहुत से अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर लोग उस फौजी कार्रवाई के खिलाफ भी तर्क दे सकते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में पाकिस्तान के इन दो हिस्सों को, एक-दूसरे से अलग करके बांग्लादेश बनवाकर अपने फौजी फायदे का भी एक काम किया था, और बिना कहे भी भारत इसे अपनी कामयाबी मानता है, और इसके लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को उस वक्त शायद दुर्गा भी कहा था। इसी तरह सिक्किम का भारत में विलय, या कि कश्मीर के कई मुद्दों पर किसी कार्रवाई में देर, या कि देश के भीतर भी कुछ मुद्दों पर कार्रवाई न करना, एक किस्म की कार्रवाई होती है। सरकार चलाना, और दूसरे देशों के साथ रिश्ते रखना, अपनी सरहदों को महफूज रखना, और अपने लोगों की जिंदगियों को बचाकर रखना, इसके लिए दुनिया का हर देश बहुत किस्म के अनैतिक समझौते करता है, और भारत ऐसे फैसलों में दूसरे देशों से खासा पीछे भी रहता है। 
दुनिया के देशों की बीच की आज की राजनीति, कूटनीति, और फौजी रणनीति, बाजार और कारोबार के हित, अपने नागरिकों के अस्तित्व के मुद्दे, इन सबको देखते हुए देशों के फैसले एकदम काले और सफेद नहीं रहते। वे सलेटी से रहते हैं, और कहीं पर उनका रंग गाढ़ा होता है, और कहीं पर हल्का। इसलिए कश्मीर पर अलग-अलग सरकारों का अलग-अलग वक्त के रूख, और अलग-अलग विचारधाराओं के आंदोलनकारियों के रूख के बीच कई बार टकराव हो सकता है, या यह कहना बेहतर होगा कि हमेशा ही एक टकराव बने रहता है, और इसमें जायज या इंसाफ जैसा कोई साफ-साफ एक रूख शायद मुमकिन भी नहीं हो सकता। इसलिए जिन लोगों को देश के व्यापक हितों की फिक्र है, उनको जिम्मेदारी के साथ भी ऐसे मुद्दों को छेडऩा चाहिए, और जिम्मेदारी के साथ ही ऐसे मुद्दों का विरोध करना चाहिए। आने वाले महीनों में चुनाव को देखते हुए सड़कों पर कूटनीति और देश की अंतरराष्ट्रीय नीति, देश की फौजी जरूरत, इन सबको नारों में तय करने की कोशिश होगी, और वह खतरनाक होगी। इसलिए हर तबके को कुछ जिम्मेदारी से, कुछ सब्र से काम लेना चाहिए, और जुबान की किफायत का ख्याल रखना चाहिए।

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