बेचैन विधायक और हड़बड़ी वाले मीडिया को सोचने की जरूरत

16 जनवरी 2014
संपादकीय
दिल्ली में आज सुबह आम आदमी पार्टी के 28 में से एक विधायक के बेचैनी और नाराजगी पिछले एक पखवाड़े में दूसरी बार खबरों में आई है। इसके पहले जब विनोद कुमार बिन्नी नाम के इस भूतपूर्व कांग्रेसी और वर्तमान आप विधायक को मंत्री नहीं बनाया गया तो भी बेचैनी की खबरें थीं। आज दिल्ली के मीडिया ने घंटे भर तक इस असंतुष्ट विधायक की बहुत आम बातों को खास की तरह सीधे प्रसारित किया, और उसके बाद पार्टी की तरफ से उसके एक विचारक और नेता योगेन्द्र यादव ने इसका जवाब भी दिया। 
इस बहुत मामूली बात पर हम लिखना नहीं चाह रहे हैं, लेकिन इससे जुड़े हुए दो दूसरे पहलू हैं जिन पर चर्चा अधिक मायने रखेगी। एक तो यह कि कल तक जब बिना सत्ता, बिना अहमियत, आम आदमी पार्टी के लोग कांग्रेस और भाजपा जैसी सत्ताओं के खिलाफ एक जन आंदोलन कर रहे थे, तब तक उसके भीतर ऐसी बेचैनी और ऐसे मतभेद नहीं थे। लेकिन अब सरकार बनाने के बाद आप एक सत्तारूढ़ पार्टी हो गई है, और सत्ता की ताकत के साथ-साथ जो-जो खामियां आ सकती हैं, आती हैं, उनका सामना अरविंद केजरीवाल की इस नई-नई पार्टी को करना पड़ रहा है। दूसरी बात यह है कि दिल्ली राज्य तक सीमित इस पार्टी के घरेलू मुद्दों को लेकर मीडिया ने इसे जिस तरह का महत्व दिया है, वह दिल्ली स्थानीय मीडिया के लिए तो ठीक हो सकता था, लेकिन जो मीडिया दिल्ली में अपनी जड़ों की वजह से पूरे देश तक अपनी डालोंं के फैलने का दावा करता है, उसका यह रूख बिल्कुल ही गैरपेशेवर और स्थानीय पत्रकारिता का है, जिसका कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं हो सकता। देश में इतने किस्म के, इतने मुद्दे हैं, कि मीडिया की नजर में आज सुबह एक असंतुष्ट विधायक द्वारा लगाए गए महत्वहीन, और अर्थहीन आरोपों को ऐसी जगह नहीं मिलनी चाहिए थी। मीडिया ने जिस तरह दिल्ली सरकार पर कुछ हफ्तों में कई तरह के काम न करने के जो एक सत्तारूढ़ असंतुष्ट विधायक के मुंह से दिखाए हैं, उनका कोई वजन नहीं दिखता। लेकिन लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक-दूसरे को पीछे छोडऩे की होड़ में, या एक-दूसरे से पीछे न रह जाने की हड़बड़ी में हर छोटी-छोटी बात को जिस तरह जीवंत प्रसारित करता है, उससे देश-प्रदेश, दुनिया के असल मुद्दे हाशिए पर इंतजार करते खड़े रह जाते हैं, गायब हो जाते हैं।
दुनिया में ऐसी कौन सी सरकार हो सकती है जो अपने चुनावी घोषणा पत्र पर कुछ हफ्तों के भीतर ही पूरा अमल कर सके? आम आदमी पार्टी जाहिर तौर पर, और घोषित रूप से सरकार चलाने के तजुर्बे के बिना पहली बार चुनाव लडऩे वाली पार्टी रही है। और उसने अब तक बिना किसी भ्रष्टाचार के ठीक-ठाक तरीके से ही पहले कुछ हफ्ते गुजारे हैं। कांग्रेस और भाजपा के लोग, या मीडिया के लोग उससे हर चौबीस घंटे में सोने के एक अंडे की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन जब किसी किस्म की खोखली उम्मीद खुद इस पार्टी का एक विधायक बड़े भांडाफोड़ की तरह सामने रखे, तो उससे उस विधायक का बेचैन खोखलापन जाहिर होता है। हो सकता है कि केजरीवाल की सरकार दिल्ली की सबसे नाकामयाब सरकार साबित हो, हो सकता है कि इस सरकार के मंत्री और इस पार्टी के नेता भी भ्रष्ट ही साबित हों, लेकिन इनको काम करने का मौका देना चाहिए। हम आम आदमी पार्टी को लेकर मीडिया के सुनामी रूख को किसी के भले का नहीं मानते। कभी केजरीवाल को नायक, और फिर किसी एक के कहे खलनायक की तरह पेश करने को अखबारनवीसी तो नहीं कहा जा सकता, और वैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने आपको अखबारनवीस या पत्रकार कहता भी नहीं है। टीवी समाचार चैनलों ने अखबारों की दुनिया को मीडिया बनाकर रख दिया है, और इसके साथ-साथ अखबारों की परंपरागत जिम्मेदारी की शैली भी खत्म कर दी है। कोई हैरानी नहीं होगी कि लोग गंभीरता से खबरों को पाने के लिए एक बार फिर अखबारों की तरफ रूख करेंगे। आम आदमी पार्टी के बेचैन विधायक, और उसे घंटे भर तक दिखाने वाले इलेक्ट्रॅनिक मीडिया, इन दोनों को बराबरी का आत्मविश्लेषण करना चाहिए। 

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