सामाजिक संपत्ति के बेहतर प्रबंधन की एक अच्छी सोच राष्ट्रीय वक्फ विकास निगम

29 जनवरी 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज राष्ट्रीय वक्फ विकास निगम लिमिटेड नाम के एक पब्लिक सेक्टर की शुरुआत की है, जो कि देश भर में वक्फ की बिखरी हुई जमीन-जायदाद को देखेगा, और उसके बेहतर इस्तेमाल, उससे कमाई का इंतजाम भी करेगा। अल्पसंख्यकों के हाल का अध्ययन करके सच्चर कमेटी ने जो रिपोर्ट दी थी उसमें भारत को दुनिया भर में सबसे अधिक वक्फ-जमीन-जायदाद वाला देश पाया गया था और ऐसी करीब पांच लाख संपत्तियों से बारह हजार करोड़ रूपए सालाना तक की कमाई का अंदाज कमेटी ने लगाया था। आज उनसे सालाना कमाई कुल 163 करोड़ रूपए ही है, क्योंकि कहीं स्थानीय वक्फ बोर्ड और कमेटियों में बदइंतजामी है, तो कहीं उसकी जमीन-जायदाद पर अवैध कब्जे हैं।  यह अपने किस्म का एक पहला काम है, जिसमें किसी धर्म से, उसके संगठनों से जुड़ी हुई धार्मिक और सामाजिक जमीन-जायदाद के रख-रखाव और उसकी कमाई की संभावनाओं को देखते हुए उनको संगठित और योजनाबद्ध तरीके से विकसित करने के लिए ऐसा एक राष्ट्रीय निगम बनाया गया है। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम कई बार धार्मिक और सामाजिक, राजनीतिक और समाजसेवी संगठनों को लेकर ऐसी बात लिखते हैं कि सरकार या जनता के दिए हुए दान या सहयोग से जो संगठन चलते हैं, उनके कामकाज, हिसाब-किताब, और उनकी दौलत को लेकर एक पारदर्शिता रहनी चाहिए, और उनके बेजाइस्तेमाल के खिलाफ एक अधिक कड़ा कानून असरदार तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। अभी कुछ वक्त पहले ही एक खबर आई थी कि एक विदेशी दानदाता अफ्रीका में किसी ईमानदार नेता को छांटकर उसको दान देना चाह रहा है, लेकिन उसे ऐसा कोई नेता अफ्रीकी देशों में मिल नहीं रहा। भारत में भी लोग दान देने की नीयत रखते हुए भी कई बार दान नहीं दे पाते क्योंकि उनको कोई भरोसेमंद समाजसेवी संगठन नहीं मिलता। यह सिर्फ मुस्लिम समाज के वक्फ की जमीन-जायदाद का मामला नहीं है, हिन्दू समाज में भी जगह-जगह गौशाला से लेकर मंदिर तक, और मठ से लेकर आश्रम तक की जमीनों के बेजा इस्तेमाल, उनमें अवैध कब्जे, उनकी अवैध बिक्री के मामले बिखरे पड़े हैं। इसी तरह चर्च की संपत्ति या ईसाई मिशनों की संपत्ति पर चारों तरफ अवैध कब्जे होते हैं, और हम छत्तीसगढ़ में ही चर्च की संपत्ति की अवैध बिक्री के मामले देख चुके हैं, जो कि अदालतों में चल रहे हैं।
इसलिए आज अगर मुस्लिमों की सामाजिक संपत्ति के रख-रखाव के लिए, और उसके बेहतर इस्तेमाल के लिए केन्द्र सरकार ने ऐसा एक निगम बनाया है, तो यह एक अच्छी पहल है। इसी तरह हिन्दुओं के मंदिरों और मठों के रख-रखाव के लिए भी अगर केन्द्र या राज्य सरकारें कोई पहल कर सकती हैं, तो उससे धर्म स्थानों के प्रति धर्मालु लोगों का भरोसा बढ़ेगा, वहां का काम बेहतर होगा, और वहां पर दान भी बढ़ेगा। देश के सबसे बड़े हिन्दू धर्म स्थानों में से एक, आन्ध्र के तिरूपति में राज्य सरकार का ट्रस्ट ही सारा इंतजाम देखता है, और वहां की कमाई से सरकार जनकल्याण के बहुत सारे काम भी करती है। धर्म, आध्यात्म, जाति, या आस्था के किसी और किस्म के केन्द्र पर से मनमानी और एकाधिकार का इंतजाम खत्म होना चाहिए, और वहां पर एक पारदर्शिता सार्वजनिक जीवन के हित में आनी चाहिए। आज हम देख रहे हैं कि किस तरह आसाराम नाम के जेल में बंद आदमी के बनाए हुए कानूनी और गैर कानूनी आश्रमों में हजारों करोड़ की दौलत लगी हुई है, लेकिन उसकी कोई सामाजिक जवाबदेही नहीं है। इसी तरह हम छत्तीसगढ़ के बहुत से मठों की संपत्ति देखते हैं, जिन पर कब्जा करने के लिए गुंडे-मवाली जुट जाते हैं, और वहां गद्दियों पर बैठे हुए लोग दान से मिली हुई दौलत को अपने जेब के निजी सिक्कों की तरह खर्चते हैं, बांटते हैं, दबा लेते हैं। हिन्दू समाज में जब-जब मंदिरों की दौलत को एक सीमा से बढ़ते हुए देखकर उस पर सरकारी इंतजाम की बात उठती है, तो उसका विरोध भी होता है। दक्षिण भारत के एक प्रमुख मंदिर के सोने के खजाने को लेकर बड़ी अदालतों तक मामला गया, कि सरकार को उस दौलत को तौलने का हक भी नहीं है। दरअसल सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए नेताओं और अफसरों की साख इतनी कम रहती है, कि बहुत सी जगहों पर लोगों को लगता है कि धर्म स्थानों को लूटने वाले मौजूदा मुखिया सरकारी लोगों के मुकाबले फिर भी कम बेईमान होंगे। सरकार की साख कम होने का यह एक नुकसान होता है। 
ऐसे माहौल में अगर मुस्लिम समाज के वक्फ की जमीन-जायदाद का एक बेहतर प्रबंधन हो सकता है, और उसकी कमाई से समाज का भला हो सकता है, तो आगे चलकर इससे बाकी धर्म के लोगों को भी एक राह सूझ सकती है।

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