कल तक सत्ता में रहते चुप, आज राजनीति में बड़े दावे

14 जनवरी 2014
संपादकीय
भारत के भूतपूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह नौकरी पूरी होते ही भाजपा में शामिल हो गए हैं, और अब सक्रिय राजनीति में बयान भी देने लगे हैं। कल ही उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम के एक करीबी पर हाथ डालने से दिल्ली पुलिस को रोका था। उन्होंने कहा कि आईपीएल मैच फिक्सिंग में एक बिजनेसमैन का नाम आ रहा था। यह व्यक्ति दाऊद का करीबी हो सकता था। मगर जब पुलिस ने उसकी जांच करने की पहल की, तो शिंदे उसके बचाव में आ गए। सिंह ने दावा किया कि वह ऐसी कई बैठकों में मौजूद थे, जब शिंदे ने दिल्ली पुलिस के काम में हस्तक्षेप किया। सिंह के मुताबिक शिंदे के दफ्तर से पुलिस मुख्यालय को दिल्ली के थानों में एसएचओ की तैनाती तक के निर्देश जाते थे। उन्होंने दावा किया कि इसके एवज में रुपये तक लिए गए। नौकरशाह से नेता बने आरके सिंह ने यूपीए और कांग्रेस के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। 
अब सवाल यह उठता है कि देश के गृह सचिव रहते हुए अगर आर.के. सिंह दाऊद इब्राहिम के करीबी का शक होने पर भी ऐसे इंसान पर हाथ डालने से गृहमंत्री की दखल पर पीछे हट जाएं, और इस बात को लेकर सरकार की फाइलों में अपनी असहमति, अपना विरोध, और अपना शक जाहिर न करें, तो उनको आज अपनी इस ताजा-ताजा सरकारी-गैरजिम्मेदारी को शहादत की तरह पेश करने का क्या हक है? देश के सबसे बड़े अफसरों में से एक, केन्द्रीय गृह सचिव में भी अगर किसी मंत्री की गलत बात का विरोध करने का हौसला न हो, और यह हौसला आज एक विपक्षी पार्टी में आने के बाद राजनीतिक चुनाव अभियान के हिस्से की तरह एकदम से जाग जाए, तो ऐसे अफसर, ऐसे भूतपूर्व अफसर के लिए हमारे मन में कोई इज्जत पैदा नहीं होती। 
भारतीय लोकतंत्र में बहुत से छोटे-छोटे कर्मचारी भी ऐसे हुए हैं जिन्होंने सत्ता पर काबिज अपने ऊपर के नेताओं या अफसरों की मनमानी का विरोध किया है। गुजरात से लेकर हरियाणा तक, और भी दूसरी जगहों पर ऐसे छोटे-छोटे अफसर रहे हैं, जिन्होंने अपनी कानूनी सरकारी जिम्मेदारी को निभाते हुए सत्ता की भारी नाराजगी झेली है। ऐसे में जो केन्द्रीय गृह सचिव, गृह सचिव बन जाने के बाद समय रहते नेताओं के गलत कामों का विरोध नहीं करता, अपने सामने मौजूद संवैधानिक और सरकारी विकल्पों का इस्तेमाल नहीं करता, उसे आज सरकारी कामकाज को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बातें कहने का नैतिक हक कैसे मिल सकता है? और फिर जहां तक दाऊद इब्राहिम से रिश्तों का शक किसी पर होने की बात है, तो उसके लिए तो आर.के. सिंह के सामने राष्ट्रीय हित में ऐसी बातों को किसी विपक्षी पार्टी के मार्फत गुमनाम तरीके से उजागर करने का रास्ता खुला था। देश के बहुत से मंत्री और अफसर इस तरह का गुमनामी का काम व्यापक जनहित में करते हैं, और आर.के. सिंह तो किसी को सुझाकर सूचना के अधिकार के माध्यम से भी ऐसी जानकारी दे सकते थे, लीक कर सकते थे। ऐसा करना उनके सरकारी नियमों के खिलाफ तो होता, लेकिन ऐसा करना दाऊद जैसे आतंकी की जांच के राष्ट्रीय हित में भी होता। आज हमको अधिक खुशी होती अगर आर.के. सिंह इस इंटरव्यू में यह कह पाते कि उन्होंने अपना शक जाहिर करते हुए गृहमंत्री से ऊपर के किसी विकल्प तक कोशिश की थी, और आज वे राष्ट्रहित में अपनी वैसी किसी कोशिश को उजगार भी करते। 
जब तक सत्ता में बने हैं, तब तक सत्ता का हिस्सा बने रहना, और फिर जब सत्ता के बाहर हो गए, तो अपनी हिस्सेदारी की चर्चा भी न करते हुए सिर्फ दूसरों को कोसना ठीक बात नहीं है, और इससे आज की ताजा नीयत उजागर भी होती है। हमारा यह भी मानना है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका, सेना और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के कार्यकाल पूरे होने के बाद सक्रिय राजनीति में उनके आने पर कुछ बरसों की रोक रहनी चाहिए। एक किस्म की वर्दी को उतारकर, आनन-फानन में चुनावी कुर्ता-टोपी पहन लेना, और अपने कार्यकाल की बातों को लेकर चुनावी बयान देना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। इस पर संसद को सोचना चाहिए। 

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