19 जनवरी 2014
संपादकीय
असम में कल बोडो उग्रवादियों ने एक बस में सवार मुसाफिरों में से हिंदीभाषी लोगों को उतारा, और उनको गोली मार दी। उन्होंने कहा है कि अगर असम सरकार उनके बेकसूर साथियों को मुठभेड़ों में मारना बंद नहीं करती है तो वे हिंदीभाषी लोगों की ऐसी हत्या और भी करेंगे। अभी मारे गए लोगों में बिहार के मजदूर हैं जो वहां काम करने गए हुए थे।
यह एक बहुत भयानक बात इसलिए है कि भारत एक संघ के रूप में बहुत से प्रदेशों से बना हुआ एक ऐसा देश है जिसमें हर प्रदेश के लोग बेरोक-टोक दूसरे प्रदेशों में जाकर काम कर सकते हैं, करते हैं, और कामकाज से लेकर रिश्तों तक, इस तानेबाने में पूरा देश एक है। अब अगर एक प्रदेश में भाषा या क्षेत्रीयता के आधार पर, रंग या धर्म, जाति या वैचारिक आधार पर लोगों को मारा जाएगा, तो यह पूरा देश तानेबाने खोकर धागों का एक बेमतलब गुच्छा ही रह जाएगा। हमने पिछले महीनों में कई मौकों पर ऐसी नौबत के खिलाफ लिखा है, और उनमें से कुछ तर्क, हमारी सोच आज भी असम के इस आतंकी हमले पर लागू हैं।
और इसी वक्त देश की राजधानी दिल्ली में अफ्रीकी महिलाओं के साथ आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री और उनकी भीड़ ने जो बदसलूकी की है, और दिल्ली पुलिस इस बदसलूकी की गवाह भी है, उसके नतीजे आम आदमी पार्टी की सीमित म्युनिसिपल-समझ में अभी नहीं आ रही। अफ्रीकी देशों में हिंदुस्तान के जो लोग पीढिय़ों से बसे हुए हैं, वहां कमा-खा रहे हैं, उनके साथ अगर कोई जवाबी-हिंसक बर्ताव शुरू हो गया, तो क्या उसे दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती संभाल सकेंगे? तंग नजरिए और कमसमझ के लोग खुद हिंसा करने के पहले उस हिंसा की प्रतिक्रिया के बारे में नहीं सोच पाते।
कुछ समय पहले गुजरात की खबर आई थी कि वहां पर बरसों से खेती कर रहे पंजाबी-सिख किसानों को मोदी सरकार ने नोटिस दिया था कि वे अपने खेत बेचकर चले जाएं, क्योंकि 1948 का मुंबई किरायादारी और खेतिहर जमीन कानून गुजरात में गैरगुजरातियों को खेती की इजाजत नहीं देता। इस मामले की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंची और अभी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार पहली नजर में ऐसे सैकड़ों सिख किसानों के साथ भेदभाव की दोषी लगती है। आयोग ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति की है कि वहां की सरकार यह मानती है कि गैरगुजराती वहां जमीन के मालिक नहीं रह सकते, और सिख किसानों की ऐसी जमीनों के खाते सरकार ने अभी रोक रखे हैं।
एक दूसरी खबर उसी दौरान यह आई थी कि जम्मू-कश्मीर में एक कट्टरपंथी और अलगाववादी नेता सईद अली शाह गीलानी ने वहां के स्थानीय लोगों से कहा है कि वे बाहर से आकर काम करने वाले पांच लाख से अधिक मजदूरों को आने की इजाजत न दें, क्योंकि वे स्थानीय संस्कृति बिगाड़ते हैं। कश्मीर में खेती और दूसरे कामों में मजदूरों की कमी की वजह से बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, और छत्तीसगढ़ से लाखों मजदूर काम पाने जाते हैं। वर्ष 2008 में भी गीलानी ने बिहार के मजदूरों राज्य छोड़ जाने को कहा था, और ऐसे कुछ मजदूरों की हत्याओं के बाद दहशत में बाकी मजदूर छोड़कर चले गए थे। इस बार भी इस नई धमकी से दूसरे राज्यों के मजदूरों मेें कश्मीर में दहशत है। कश्मीर के लोगों का यह मानना है कि ऐसी धमकी से और मजदूरों के चले जाने से कश्मीर की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी।
भारत अपने-आपमें इतनी विविधताओं से भरा हुआ, इतने प्रदेशों वाला, इतनी भाषाओं और संस्कृतियों वाला, इतने पड़ोसी देशों से रोटी-बेटी के रिश्तों वाला, इतने धर्मों वाला, इतने किस्म के काम-धंधों वाला देश है कि यहां पर अगर इनमें से किसी एक आधार पर लोगों की आवाजाही रोकी जाती है, तो देश के भीतर बहुत बुरा तनाव हो सकता है। लोगों को याद है कि महाराष्ट्र में बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक शिवसेना की सोच ने दूसरे प्रदेशों से आए हुए लोगों पर हमले किए, उनको वहां काम करने से रोका, दहशत फैलाई, और अपने लिए स्थानीय वोटरों की हमदर्दी बटोरी। अब अगर एक-एक करके अलग-अलग राज्य दूसरे राज्यों के लोगों से परहेज करने लगेंगे, तो इससे दूसरे राज्यों के गरीब मजदूरों का नुकसान तो कम होगा, परहेज करने वाले राज्यों का नुकसान ही अधिक होगा। पसीना बहाकर रोजी कमाने वाले लोग तो कहीं भी रोजी कमा लेंगे, लेकिन उनकी मेहनत इस्तेमाल करके जो राज्य अपनी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ाते हैं, उनका क्या होगा? अभी कुछ वक्त पहले की ही एक तस्वीर हमको याद पड़ती है जिसमें पंजाब के एक रेलवे प्लेटफार्म पर एक स्थानीय सिख किसान बोर्ड लिए बैठा है कि बाहर से आने वाले मजदूरों को उसके खेतों पर काम करने पर क्या-क्या सहूलियतें मिलेंगी।
कुछ महीने पहले कर्नाटक में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों पर हमले की अफवाह फैली तो बात की बात में दसियों हजार लोग रेलवे स्टेशन पर इक_ा हो गए और असम की तरफ जाने वाली रेलगाड़ी में पांव धरने की जगह भी नहीं बची। यह उस वक्त हुआ था जब असम झुलसा हुआ था, जल रहा था और अपने घर से बेदखल था। यह उस वक्त हो रहा था जब मुंबई में मुसलमानों ने असम-म्यांमार की मुस्लिम मौतों के खिलाफ एक हिंसक प्रदर्शन वहां किया, यह उस वक्त हो रहा था जब असम को लेकर दिल्ली में एक राजनीति भी चल रही थी और लगी आग के बीच हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के मुद्दे भी उठाए जा रहे थे। ऐसे में कर्नाटक छोड़कर भाग रहे उत्तर-पूर्वी लोगों को वहां की सरकार, वहां की सत्तारूढ़ भाजपा, आरएसएस से लेकर असम सरकार और केंद्र सरकार तक, हर किसी ने यह दिलासा दिया थौ कि इन लोगों को कर्नाटक में कोई खतरा नहीं है और वे छोड़कर न जाएं। लेकिन अपनी जान पर जिनको खतरा लगता था वे छोड़कर भाग रहे थे। कर्नाटक की अफवाह वहां पहुंचते ही वहां हिंसा का एक नया दौर शुरू हो गया था, और यह जख्म जल्दी भरने वाले भी नहीं थे।
आज गुजरात में नरेन्द्र मोदी हों, या कश्मीर में वहां के अलगाववादी नेता, उनकी सोच इस मामले में एक दिखती है। कश्मीर में तो गीलानी को चुनाव नहीं लडऩा है, लेकिन आज जब नरेन्द्र मोदी पूरे देश के नेता बनने की राह पर चल रहे हैं, तो वे पंजाब के लोगों को, अपने अकाली भागीदारों को इस बात के लिए क्या जवाब देंगे? राष्ट्रीय नेता बनने के लिए सोच भी राष्ट्रीय रखनी पड़ती है, और समझ अंतरराष्ट्रीय रखनी पड़ती है। केंद्र सरकार इस नौबत के लिए इसलिए जिम्मेदार है क्योंकि पूरे देश के लोगों को अपनी हिफाजत का जो भरोसा एक मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे हो सकता है, वह देश से गायब है। मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी तक, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन में एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी नीयत पर, जिसकी ताकत पर और जिसकी लीडरशिप पर पूरे देश को भरोसा हो। इसलिए विश्वास की यह कमी भी इस दहशत के पीछे है जो आज असम में हिंदीभाषी मजदूरों को छांट-छांटकर इस तरह मारने की नौबत की जिम्मेदार है।

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