10 जनवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ विधानसभा में राज्य सरकार की तरफ से तैयार सालाना अभिभाषण राज्यपाल पढ़ते हैं, और इसमें राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की चर्चा रहती है। इस पर विपक्ष को सरकार की आलोचना का मौका मिलता है और फिर सरकार भी आलोचना का जवाब देती है। कल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ऐसे ही जवाब में अपनी सरकार की गरीब हितैषी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन योजनाओं का मजाक उड़ाने का अधिकार किसी को भी नहीं है। छत्तीसगढ़ का गरीब आदमी चावल बेचकर शराब नहीं पीता। कुछ लोग अगर यह कहते हैं कि एक रूपए किलो चावल लेकर गरीब लोग अपनी आमदनी शराब खर्च में कर देते हैं, तो ऐसा कहने वाले उन गरीबों का मजाक उड़ाते हैं, उन्हें जनता कभी माफ नहीं करेगी।
दरअसल यह बात न सिर्फ छत्तीसगढ़ में है, और न सिर्फ एक रूपए किलो चावल को लेकर है। गरीबों को मिलने वाली रियायत ताकतवर और संपन्न तबकों के मुंह में खुशबूदार चावल के बीच आए कंकड़ की तरह खटकती है। लोग समझते हैं कि इससे गरीब लोग कामचोर हो जाते हैं, सरकार की रोजगार योजनाओं, जनकल्याण की योजनाओं का फायदा अर्थव्यवस्था को सीधे नहीं मिल पाता। दरअसल हिन्दुस्तान में ही नहीं, सारी पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में इंसानों को एक आंकड़े की तरह देखने और इस्तेमाल करने की बुनियादी सोच रहती है। और ऐसे में किसी इंसान के पेट में सरकारी लागत से कितना जा रहा है, और उस इंसान से अर्थव्यवस्था में कितना योगदान मिल रहा है, इसका हिसाब करते हुए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के केलकुलेटर दुनिया के देशों को यह हुक्म देते हैं कि उनको खेती और खाने पर रियायतों को कितना कम करना है, तभी उनको अंतरराष्ट्रीय कर्ज मिल सकेंगे।
ये सारे आंकड़े मशीनी होती जा रही उस दुनिया के हिसाब से तैयार होते हैं जिनमें इंसानों की गिनती सिर्फ गिनती के लिए होती है, एक जिंदगी की तरह नहीं। ऐसे में जब अभी कुछ बरस पहले तक ही छत्तीसगढ़ जैसे इलाकों से भूख से मौतों की खबरें आती थीं, तो उसे लेकर विधानसभा से लेकर संसद तक हल्ला होता था। लेकिन आज जब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में फसल की खरीदी की सरकारी जिम्मेदारी, और अनाज पर गरीब का हक, इन दोनों को बढ़ाते हुए कुल मिलाकर गरीबों का भला जब होता है, तो संपन्न और शहरी तबका उसके मायने नहीं समझ पाता। जिस राज्य में गरीबों को पीढ़ी दर पीढ़ी आधे पेट खाकर ही सोना पड़ता था, जहां पर कुपोषण की वजह से पीढिय़ों से लोगों को कमजोर बन जाना एक नियति बनी हुई थी, वहां पर आज अगर राज्य सरकार के बजट के बहुत थोड़े से हिस्से से आधी गरीब आबादी के सामने से भूख खत्म हो गई है, तो ऐसी योजनाओं का मजाक उड़ाना एक हिंसा है।
शहरी बिल्डरों और कारखानेदारों को आज छत्तीसगढ़ में पहले जैसी मजदूरी पर मजदूर नहीं मिलते। लेकिन जब लोगों के काबू से सोने का रेट बाहर है, हवाई सफर की टिकटों का दाम बाहर है, जब पेट्रोल और डीजल का दाम उनके काबू से बाहर है, तो फिर गरीब के खून और पसीने के दाम को वे क्यों काबू में रखना चाहते हैं? आज मजदूर न मिलने, या शराबखोरी बढऩे की शिकायत वे लोग करते हैं जो कि आज बाजार के नीति-सिद्धांतों के मुताबिक मांग और आपूर्ति के आधार पर अधिक मजदूरी देना नहीं चाहते। गरीब को चावल सस्ता मिलता है तो वह अपनी कमाई से दारू पी लेता है, यह एक बहुत ही गैरगरीब सोच है। अगर कोई गरीब ऐसा करता भी है, तो दारू पीने का उसका हक उतना ही है, जितना कि किसी अमीर का है। और छत्तीसगढ़ में आज अगर पूरे परिवार का, बच्चों का पेट भरना शुरू हुआ है, कुपोषण कम हुआ है, शिशु मृत्यु दर घटी है, सेहत के बाकी पैमाने अगर बेहतर हुए हैं, तो इसकी वजह गरीबों को मिलने वाला रियायती अनाज है। केन्द्र सरकार की रोजगार योजनाओं, और राज्य सरकार के अमल को मिलाकर अगर गरीब को अपने आसपास पहले से अधिक रोजगार मिल रहा है, प्रदेश के बाहर बेबसी में मजदूरी करने जाना अब पहले के मुकाबले बहुत कम हुआ है, तो कम से कम इंसान की तरह जीने का उसका ऐसा हक आज उसे कुछ या अधिक सीमा तक मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में दो बार के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पार्टी को अगर तीसरी बार सत्ता पर लेकर आए हैं, तो उसके पीछे बहुत सी दूसरी वजहों के साथ-साथ एक बड़ी वजह यह भी है कि प्रदेश के गरीबों की जिंदगी पिछले दस बरसों में बहुत बदल गई है। चुनाव में जीत-हार की और दूसरी वजहें तो आती-जाती रहती हैं, लेकिन हमारा चुनाव के पहले भी यही मानना था कि सबसे गरीब का सबसे अधिक साथ डॉ. रमन सिंह को मिलेगा, और राज्य में भाजपा की जीत के आंकड़ों में सबसे बड़ा योगदान इसी बात का था। यह छत्तीसगढ़ का भरे पेट वाला गरीब ही था जिसने अपनी पूरी ताकत से भाजपा के हार के खतरे को पीछे धकेल दिया।
हमारा मानना है कि गरीब का हक देश और प्रदेश के प्राकृतिक साधनों पर नहीं दिया जा रहा, और ताकतवर तबके उसका हक लूट ले रहे हैं। जंगल से लेकर जमीन तक, और खेतों से लेकर पानी तक, खदानों से लेकर आसमान तक, सत्ता जिन चीजों को मनमानी रियायतों पर खरबपतियों को बेचती है, उसमें इन चीजों के साथ-साथ गरीब की धड़कनें भी बिक जाती हैं। जिस तरह देश की संसद और विधानसभाओं में करोड़पतियों और अरबपतियों का अनुपात बढ़ते चल रहा है, उससे जाहिर है कि इतनी गरीबी को लेकर सत्ता और सदन में संवेदनशीलता पहले की तरह की अब नहीं रह गई है। ऐसे में कोई भी पार्टी, कोई भी नेता, अगर गरीबों के भले के लिए कोई अच्छी रियायती योजना बनाते हैं, उस पर ईमानदार अमल करवाते हैं, तो यह सिर्फ इंसाफ की बात है। इसका विरोध करने वाले लोगों को अपनी सोच का खतरा समझना चाहिए।

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