23 जनवरी 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले एक महत्वपूर्ण फैसले में फांसी के इंतजार में जेलों में बरसों से बंद दर्जन भर से अधिक लोगों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, क्योंकि सरकार ने उनके मामलों में फैसले लेने में बरसों लगा दिए थे। लोगों को याद होगा कि पिछले दो-तीन बरस में केन्द्र सरकार ने अपने बचाव में यह तर्क दिया था कि यूपीए ने कितने बरसों में फांसी के कितने मामलों में रहम की अर्जी पर फैसले लिए और राष्ट्रपति को भेजे, और यूपीए के पहले एनडीए ने इस पर धीमी रफ्तार से काम किया था।
भारत की अदालतों में कामकाज को लेकर तो लोगों के मन में यह बात बैठी भी है कि कई किस्म के मामलों में फैसला आने में पीढिय़ां निकल सकती हैं, अभी किसी ने हिसाब किया था कि दिल्ली हाईकोर्ट में खड़े हुए मामलों, और हाईकोर्ट में निपटारे की रफ्तार को देखते हुए सारे मामले निपटने में चार सौ से बहुत अधिक बरस लग जाएंगे। अब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि केन्द्र सरकार में भी कामकाज की क्या रफ्तार है, खासकर ऐसे मामलों में जहां जेलों में बंद सजायाफ्ता कैदी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, और बाहर उनका परिवार ऐसी ही मानसिक यातना और अनिश्चितता से गुजरते हैं। ऐसे मामलों में भी केन्द्र सरकार फैसले लेने और सिफारिश राष्ट्रपति को भेजने में बरसों लगाती है। लेकिन अदालत या सरकार की यह देरी आज की इस चर्चा का मकसद नहीं है। हमारा सोचना यह है कि देश की निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट होते हुए जो मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं और वहां पर आखिरी फैसला होने के बाद अगर केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के हाथ फांसी की सजा से माफी का हक है, तो फिर अदालती कार्रवाई का, और इंसाफ के लिए बनाए गए ढांचे का क्या महत्व है?
पिछले बरसों में कश्मीर या पंजाब के फांसी के कुछ मामलों में उन प्रदेशों में भारी तनाव का सामना करना पड़ा, और केन्द्र सरकार के खिलाफ विपक्षी राजनीतिक दलों ने अल्पसंख्यकों को फांसी देने में देरी का आरोप लगाया, और देश में एक निहायत गैरजरूरी कड़वाहट हवा में घुली। केन्द्र सरकार को माफी के इस पूरे सिलसिले से अपने को अलग रखना चाहिए, और देश के कुछ राष्ट्रपतियों ने केन्द्र सरकार के रहम की अर्जी पर भेजी सिफारिश पर कोई फैसला लेने से इंकार भी कर दिया था। देश के पूरे अदालती ढांचे से परे चुनावों में जाने वाली राजनीतिक ताकतों को किसी तरह के विवेक का अधिकार नहीं देना चाहिए जिससे कि वे जिंदगी और मौत तय कर सकें। सत्ता हांकने वाले लोगों को विवेक के अधिकार बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन यह सोचें कि मौत की सजा पाए हुए, जेल में बंद कैदी अगर किसी छोटे और कमजोर प्रदेश के हैं, उनके पीछे कोई राजनीतिक ताकतें नहीं हैं, उनके पीछे किसी जाति या धर्म की भीड़ नहीं है, तो फिर उनके मामलों में केन्द्र सरकार रियायत क्यों करेगी? राजनीतिक ताकतों के हाथ चुनावी मजबूरी के पहले ऐसे कोई हक नहीं दिए जाने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट को केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के माफी के हक के बारे में भी खुलकर कहना चाहिए, कि इससे इंसाफ के बाद राजनीतिक मनमर्जी से फैसले होते हैं, और यह बराबरी के अधिकार के खिलाफ है। पूरे देश में आज सत्ता के विवेक के अधिकार, विशेषाधिकार, सामंती मनमानी के अधिकार के खिलाफ एक हवा चल रही है। और सरकारों या राष्ट्रपति-राज्यपाल को भी विवेक के अधिकारों को खत्म करना चाहिए, क्योंकि इनके बेजा इस्तेमाल का खतरा कभी खत्म नहीं हो सकता।

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