जनजीवन को बंधक बनाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कुछ करे

24 जनवरी 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट से आज दो ऐसे आदेश निकले हैं जिनके बारे में हम पिछले कुछ दिनों से लगातार लिख रहे थे कि अदालत को खुद होकर ऐसी दखल देनी चाहिए। पश्चिम बंगाल में एक जाति-पंचायत ने एक महिला पर जिस तरह से सामूहिक बलात्कार करवाया, उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने खुद होकर बंगाल सरकार को नोटिस दिया है और उस जिले के जज को भी आदेश दिया है। दूसरी तरफ दिल्ली में बदअमनी फैलाने वाले वहां के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के गैरजिम्मेदाराना धरने को लेकर भी दायर एक जनहित याचिका को मंजूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार, दिल्ली पुलिस, और केजरीवाल को नोटिस दिया है। 
आज जब खाप पंचायतों से लेकर आदिवासी पंचायतों तक में भयानक जुर्म के दर्जे के जुल्म महिलाओं पर हो रहे हैं, देश के सामाजिक माहौल को हजारों बरस पहले की कट्टरता तक ले जाने की कोशिश हो रही है, और जब चुनावी राजनीति करने वाली ताकतें ऐसी कोशिशों के खिलाफ मुंह खोलने से भी कतराती हैं, तो अदालत की दखल जरूरी हो जाती है क्योंकि जजों के सामने चुनाव लडऩे की मजबूरी नहीं होती और वे भीड़ को कड़वे लगने वाले फैसले ले सकते हैं, दे सकते हैं। जो खबर बंगाल के आदिवासी इलाके से निकली है, वह इतनी भयानक है, कि दिल्ली की सड़कों पर चलती गाडिय़ों में होने वाले गैंगरेप भी उसके सामने कहीं नहीं टिकते। जब एक गांव की जाति पंचायत फैसला लेकर गैरजात में प्रेम या शादी करने वाली लड़की पर सार्वजनिक रूप से, लोगों की मौजूदगी में दर्जन भर लोगों से सामूहिक बलात्कार करवाती है, और उसे सामाजिक सजा करार देती है, तो यह मामला देश के माहौल की एक झलक भी बतलाता है। जब आम बलात्कारी एक जुर्म के तहत बलात्कार करते हैं, तो वह जुर्म भी ऐसे सामाजिक फैसले वाले जुर्म के मुकाबले छोटे जुर्म लगते हैं। 
किसी गांव की जात पंचायत वहां की बेबस महिला के साथ जो कर रही है, कमोबेश वैसी ही हरकत केजरीवाल जैसे, बददिमाग नेता सत्तारूढ़ रहते हुए भी शहरी जिंदगी के साथ कर रहे हैं, उनके मंत्री कानून मंत्री रहते हुए जाहिर तौर पर गैरकानूनी काम कर रहे हैं, पहली नजर में जुर्म दिखने वाला काम कर रहे हैं, रंगभेदी काम कर रहे हैं, महिला विरोधी काम कर रहे हैं, और इस देश में बाहर से आए हुए विदेशियों के खिलाफ काम कर रहे हैं। और ऐसे जुर्म के बाद भी केजरीवाल और उनकी पार्टी अपने ऐसे मुजरिम मंत्री को बचाते हुए उसे सर्टिफिकेट देते हुए शहर की जिंदगी तबाह कर रहे हैं। जैसा कि इस पार्टी का नाम है, इसमें औरतों के लिए इज्जत की कोई जगह नहीं है, इस पार्टी से अन्ना हजारे के वक्त से जो लोग जुड़े हैं उन्होंने लोकपाल मसौदा कमेटी में किसी महिला को नहीं रखा था, इसलिए जब पार्टी बनी तो उसके नाम में आदमी शब्द उसी सोच को आगे बढ़ाने वाला था। आज जब इस पार्टी का एक पढ़ा-लिखा, वकालत करने वाला, कानून समझने वाला, कानून मंत्री सड़क पर आधी रात विदेशी महिलाओं से बदसलूकी की अगुवाई करता है, उनको घर से निकालकर उन पर वेश्यावृत्ति और नशे के धंधे के आरोप लगाता है, कानून हाथ में लेता है, तो यह इस पार्टी की उसी सोच का हिस्सा है जिसके तहत इसके मुख्यमंत्री कानून तोड़ते हुए सड़कों पर एक निहायत गैरजरूरी धरना देते हैं, और देश की राजधानी की जिंदगी तबाह करते हैं। हमारा मानना है कि मीडिया के कई हिस्सों में आ रहे चुनावी सर्वे में इस पार्टी को जितने भी वोट मिलने की बात कही जा रही है, वे अंदाज दिल्ली के इन दो ताजा तानाशाह मामलों के पहले के होंगे, और आज अगर देश में फिर से सर्वे होगा, तो थकी-हारी जनता इस पार्टी के खिलाफ ही जाएगी। 
सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाईकोर्ट जनजीवन से जुड़े हुए मामलों को लेकर दशकों से ऐसे फैसले और आदेश देते आ रहे हैं जो कि धरना-प्रदर्शन, बंद और जुलूस, ध्वनि प्रदूषण जैसे मामलों में जनता का ख्याल रखने वाले हैं। यह एक अलग बात है कि राजनीतिक दल सत्ता या विपक्ष कहीं भी रहते हुए इन फैसलों की इज्जत नहीं करते। ऐसे में दिल्ली के ताजा धरना को लेकर केजरीवाल से लेकर केन्द्र सरकार तक जारी नोटिसों पर जब आगे सुनवाई हो, तो सुप्रीम कोर्ट को यह साफ कर देना चाहिए कि राजनेता, राजनीतिक दल अपनी मनमानी से जनता के जिंदगी को बंधक नहीं बना सकते। 

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