07 जनवरी 2014
संपादकीय
पाकिस्तान से काम कर रहे आतंकी संगठन लश्कर के शक में हिन्दुस्तान में गिरफ्तार कुछ संदिग्ध आतंकियों जांच एजेंसियों को बताया है कि उन्होंने मुजफ्फरनगर के दंगों का बदला लेने के लिए दंगा राहत शिविरों के लोगों से संपर्क किया था। दूसरी तरफ कल ही यह खबर भी मिली थी कि छत्तीसगढ़ में आतंक से जुड़े होने के शक में जो लोग पकड़ाए हैं, उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी से पूछताछ में यह कुबूला है कि बोधगया में जो आतंकी धमाके किए गए थे, वे पड़ोसी देश म्यांमार में बौद्ध समुदाय के लोगों द्वारा सरकार के संरक्षण में वहां के मुस्लिम समुदाय के व्यापक जनसंहार का बदला लेने के लिए किए गए थे।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि बोधगया पर आतंकी हमले के तुरंत बाद हमने इसी जगह संपादकीय में लिखा था- ''...इतने अंदाज के लिए किसी बहुत बड़े फार्मूले की जरूरत नहीं पड़ती है और साधारण समझ यह कहती है कि धार्मिक आधार पर जब कभी जानलेवा हमले होते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया भी होती है। गुजरात में गोधरा हत्याओं के बाद के दंगों के पीछे सरकारी बढ़ावा चाहे जितना रहा हो, गोधरा से आहत हुआ हिंदू समुदाय इतना भड़का हुआ था कि सरकारी छूट या बढ़ावा मिलते ही उसने खूब कत्लेआम किया था। पिछले कुछ महीनों में जितने बड़े पैमाने पर म्यांमार में सरकार और बौद्ध समुदाय के हाथों मुस्लिम मारे जा रहे थे, उसकी ऐसी कोई प्रतिक्रिया हो सकती थी...ÓÓ
लोगों को यह भी याद होगा विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी मुजफ्फरनगर दंगा पीडि़तों से संपर्क में है। उस वक्त राहुल के बयान को लेकर बड़ा बवाल हुआ था। उस वक्त बवाल की एक वजह यह भी थी कि राहुल गांधी ने अपने बयान में यह कहा था कि उनको यह बात खुफिया एजेंसियों के अफसर से पता लगी थी, और उस पर यह सवाल उठा था कि उनको किस हैसियत से खुफिया जानकारी मिल सकती थी। खैर चुनावों के बीच वह बात आई-गई हो गई थी, लेकिन आज कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी के उस बयान की याद ताजा करते हुए कहा था कि उस वक्त का वह बयान आज सही साबित हो रहा है।
दरअसल चीजों की प्रतिक्रिया होती ही होती है। भारत और उसके अड़ोस-पड़ोस के देशों के ऐसे जटिल और घने अंतरसंबंध हैं कि धर्म और जाति, क्षेत्रीयता और राजनीतिक सोच, कई किस्म से सरहद के एक तरफ की प्रतिक्रिया दूसरी तरफ भी होती है। देश के भीतर भी होती है, और देश के बाहर भी। और ऐसा सिर्फ हिन्दुस्तान के साथ होता हो यह भी नहीं। मुस्लिम देशों में अमरीका और उसके गिरोह के देश जो फौजी हमले करते हैं और लाखों बेकसूरों को मारते हैं, तो उसका आतंकी जवाब पश्चिमी देशों को भी वक्त-वक्त पर मिलते रहता है। स्वर्ण मंदिर पर ऑपरेशन ब्लूस्टार की प्रतिक्रिया में इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, और उसकी प्रतिक्रिया में देश में जगह-जगह सिख विरोधी दंगों में हजारों जानें गई थीं। इसके बाद श्रीलंका में तमिल टाइगर्स के खिलाफ हिन्दुस्तानी फौज भेजने की प्रतिक्रिया राजीव गांधी की हत्या की शक्ल में सामने आई थी। बाबरी मस्जिद गिराने की प्रतिक्रिया मुंबई हमलों की शक्ल में दाऊद इब्राहिम के वक्त हुई थी, गोधरा में ट्रेन के मुसाफिरों को जिंदा जलाने की प्रतिक्रिया गुजरात के मुस्लिमविरोधी दंगों की शक्ल में हुई थी। हम देश के भीतर भी देखते हैं कि जब मुंबई में शिवसेना या राज ठाकरे उत्तर भारतीय लोगों के खिलाफ कुछ कहते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया बाकी देश में भी होती है।
इसलिए आज अगर मुजफ्फरनगर के दंगों की प्रतिक्रिया खड़ी करने के लिए दंगों के शिकार लोगों के बीच कोई आतंकी संगठन घुसपैठ करने की कोशिश करता है तो उसमें हैरानी की कोई बात नहीं होगी। ऐसी प्रतिक्रियाओं के लिए भारत एक देश नहीं है, यह एक क्षेत्रीय केन्द्र है, जो कि चारों तरफ से अलग-अलग जातियों, धर्मों, और राजनीतिक विचारधाराओं से घिरा हुआ है। देश के राजनीतिक नक्शे की सरहद भारत को बाकी देशों से अलग-थलग नहीं कर सकती। इसलिए हिन्दुस्तान को न सिर्फ अपने देश के भीतर राष्ट्रीय एकता और सद्भाव के एक माहौल की जरूरत है, बल्कि पड़ोसी देशों के साथ भी उसके रिश्ते ऐसे होने चाहिए कि वहां भी वह एकता और सद्भाव को बढ़ावा दे सके, और वहां का माहौल ठीक रहने पर ही, भारत का घरेलू माहौल ठीक हो सकता है। कोई राहत शिविर जख्मों को ठीक नहीं कर सकते। लोकतंत्र में जरूरत यह है कि जख्मों की नौबत न आए, और जख्मों को कुरेदकर वोट बटोरने की कोशिशें न हों। समुदायों के टकराव में अगर आंख के बदले आंख निकालने का सिलसिला चलते रहेगा, तो एक दिन पूरी दुनिया ही अंधी बच जाएगी।

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