सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली सरकार के रूख पर कड़े फैसले की जरूरत

21 जनवरी 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई तय की है कि अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से दिल्ली जिस तरह अस्त-व्यस्त हो रही है उसे देखते हुए इस आंदोलन पर रोक लगाई जाए। और दूसरी याचिका है कि केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने विदेशी महिलाओं से जिस तरह का सुलूक किया है उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो दिन बाद सुप्रीम कोर्ट इन याचिकाओं पर तर्क सुनेगा। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बहुत से ऐसे मामलों को लेकर लिखते हैं कि देश की अदालतों को खुद होकर भी वीडियो रिकॉर्ड हो चुके, और प्रसारित हो चुके मामलों पर सरकारी चुप्पी देखते हुए अदालती दखल देना चाहिए। मुजफ्फरनगर दंगों के शिकार लोगों के बारे में भी हमने यह तर्क दिया था, कि उत्तरप्रदेश सरकार के मालिक मुलायम सिंह यादव जिस तरह की हिंसक बातें दंगाग्रस्त लोगों के खिलाफ कर रहे थे, उसके खिलाफ अदालत को उनको नोटिस देना था। अदालतों के तौर-तरीकों को लेकर लोकतंत्र में कई बार यह बहस चलती है कि न्यायिक सक्रियता कितनी हो, और कितनी नहीं, उससे कितना भला होता है और कितने खतरे होते हैं? ऐसे में अलग-अलग सोच काम करती है, और सुप्रीम कोर्ट में भी बैठे हुए बहुत से जजों का अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग रूख रहा है, और कुछ जज जनहित याचिकाओं को मंजूर करने के मामले में तंगदिल भी रहते हैं, और कुछ जज अखबारी खबरों को भी जनहित याचिका मानकर खुद होकर सुनवाई शुरू करने वाले भी रहे हैं। 
हमारी सोच इस बारे में यह है कि अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग मामलों में, लोकतंत्र के बाकी स्तंभ अगर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं, तो अदालतों को खुद होकर उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लेना चाहिए, क्योंकि जनता के हाथ में यह नहीं है कि वह हर मामले को लेकर अदालत तक जा सके। उसे हक तो है, लेकिन उसके पास इतनी ताकत नहीं है कि वह बड़ी अदालत में पहुंचकर, जनहित याचिका लगाकर, तुरंत सुनवाई पा सके। ऐसे में अदालत को खुद होकर पहल करनी होगी। मिसाल के तौर पर मुजफ्फरनगर में हत्या और बलात्कार के शिकार, जली हुई बस्तियों से बेदखल, और राहत शिविरों में ठंड में अपने बच्चे खो रहे लोगों के बारे में कोई अगर यह सोचे कि अदालत तक पहुंचना उनका हक है, तो यह कागजी हक उनके किसी काम का नहीं है, क्योंकि उनके पास अदालती लड़ाई की ताकत ही नहीं है। इसी तरह दिल्ली में बार-बार एक बहुत गैरजिम्मेदार अराजक तरीके से, तानाशाह अंदाज में, बिना जरूरत जिस तरह से अरविंद केजरीवाल आंदोलन करके, शहर की जिंदगी को अस्त-व्यस्त करके, सड़कों पर कभी इस सरकार को, तो कभी उस सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं, उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर भी पहल करनी थी, और उसने इस पर जनहित याचिका मंजूर की है, तो हम इसे एक सही अदालती फैसला मानते हैं। 
जब देश में सरकारी, कानूनी, और संवैधानिक विकल्प सारे के सारे बचे हुए हैं, उस वक्त अगर केजरीवाल जैसे लोग भीड़ के बाहुबल से सरकारों से फैसला चाहते हैं, बिना जांच सजा दिलवाना चाहते हैं, लोगों की निजी जिंदगी को कुचलते हुए अपने आरोपों और शक के आधार पर इज्जत की धज्जियां उड़ाना चाहते हैं, तो वे सड़क पर सोने के हकदार नहीं हैं, जेल में सोने के हकदार हैं। और सुप्रीम कोर्ट को यह तय भी करना चाहिए कि दिल्ली का कानून मंत्री हो या कि कोई और, फुटपाथ पर भीड़ को लेकर इंसाफ तय करने का हक इस लोकतंत्र में कैसे दिया जा सकता है, किसे दिया जा सकता है, और वह कैसा लोकतंत्र होगा? क्या यह मौके पर मनमानी का इंसाफ और सजा कुछ उसी तरह के नहीं होंगे, जैसे कि कहीं पर तालिबान करते हैं, और कहीं पर नक्सली? सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में तय करना होगा, और हमारा मानना है कि दिल्ली सरकार के मंत्री-मुख्यमंत्री इस मोर्चे पर सजा के हकदार हो सकते हैं। 

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