नक्सलियों को प्रशांत भूषण के न्यौते में गलत कुछ नहीं

12 जनवरी 2014
संपादकीय
आम आदमी पार्टी के एक प्रमुख नेता, सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील, और मानवाधिकारवादी प्रशांत भूषण ने एक बार फिर लोगों के बीच अपने बयान से बहस छेड़ी है। कश्मीर के मुद्दों पर जनमत संग्रह के बयान के बाद अब उन्होंने नक्सल इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती के पहले वहां के स्थानीय, आदिवासी लोगों से रायशुमारी की वकालत की है। उनकी इस बात का तो कोई अधिक काम आज नहीं है, क्योंकि नक्सल हिंसा के शिकार इलाकों में सुरक्षा तैनाती राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, और उनका अधिकार है। इसके लिए किसी जनमत संग्रह या रायशुमारी की बात अभी तक न तो किसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत उठाई गई थी, और न ही आदिवासियों के बीच से ही ऐसी कोई मांग उठी है। नक्सल जरूर ऐसी तैनाती के खिलाफ चेतावनी जारी करते रहते हैं। लेकिन प्रशांत भूषण की बात का एक दूसरा हिस्सा अहमियत रखता है, वह यह  कि अगर नक्सली मूलधारा की राजनीति में आने के लिए आम आदमी पार्टी से जुडऩा चाहते हैं, तो उनका स्वागत है। इस संदर्भ में प्रशांत भूषण ने आदिवासी इलाकों में जमीन से लेकर बेदखली जैसे मुद्दों की चर्चा की है कि नक्सल नौबत क्यों आती है।
हम प्रशांत भूषण की इस राय से सहमत हैं कि नक्सलियों को लोकतांत्रिक राजनीति की मूलधारा में आना चाहिए, चाहे वे आम आदमी पार्टी के मार्फत आएं, या फिर अपनी खुद की एक अतिवामपंथी नीतियों वाली पार्टी बनाकर आएं। लेकिन हिंसा की राह छोड़कर नक्सलियों को लोकतांत्रिक राजनीति में आना चाहिए, और आज जिन इलाकों में उनकी पकड़ मजबूत है, वे इलाके आम आदमी पार्टी की अब तक की शहरों तक सीमित पहुंच से खासे दूर के, और खासे अलग इलाके हैं। इसलिए अगर शहरों में आम आदमी पार्टी एक विकल्प पेश कर चुकी है, और अगर जंगलों और आदिवासी आबादी इलाकों में माओवादी नक्सली लोकतांत्रिक चुनावों में हिस्सा लेते हैं, तो इससे सामाजिक बदलाव का सिलसिला दो अलग-अलग इलाकों में, अलग-अलग हाथों से शुरू हो सकता है। इतने बड़े देश में नक्सल हिंसा से कभी भी राजनीतिक बदलाव नहीं आ सकता, खासकर सत्ता का बदलाव। यह जरूर है कि नक्सली नहीं होते, तो बहुत से मुद्दों पर बात भी शुरू नहीं हुई होती, और जमीन अधिग्रहण जैसे कुछ कानून शायद न ही बने होते। नक्सलियों ने लोकतांत्रिक ताकतों के सामने, और लोकतंत्र के स्तंभों के सामने एक कड़ी और बड़ी चुनौती पेश करके उनको जनता के हित में कई फैसले लेने को बेबस किया, जिनमें से भूमि अधिग्रहण शायद सबसे बड़ा और सबसे ताजा मामला है। 
प्रशांत भूषण नक्सलियों को न्यौता देकर अपने आपको कुछ और अखबारी सवालों के निशाने पर खड़ा कर चुके हैं, लेकिन देश में ऐसी कौन सी पार्टी है, और कौन सी सरकार है, जिसने समय-समय पर नक्सलियों को लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति की मूलधारा में आने का न्यौता नहीं दिया है? यह जरूर है कि सीधे अपनी पार्टी में बुलावा देने की बात शायद किसी पार्टी ने इस वजह से भी नहीं की, कि नक्सलियों को उनकी पार्टी कैसे पचाएगी, और शायद इस वजह से भी नहीं बुलाया कि उनको यह पक्का मालूम था, और है, कि नक्सली उनकी पार्टी की नीतियों को खारिज ही करेंगे, उनमें आने के बजाय। ऐसे में आम आदमी पार्टी अपने इतिहास का कोई बोझ ढोकर नहीं चल रही है। यह पार्टी इतनी नई है, इसकी नीतियां इतनी कम है, इतनी पारदर्शी और साफ हैं, इसका दिल और इसकी बांहें अभी सबके लिए खुली हुई हैं, इसलिए यह पार्टी नक्सलियों को भी अपने साथ आने का न्यौता दे पा रही है। चाहे अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी की एक बहुत ही असाधारण साख की वजह से नक्सली या कोई और उनकी पार्टी में आना ठीक समझेंगे, या फिर उनकी सलाह पर अपनी खुद की पार्टी बनाकर चुनाव लडऩा चाहेंगे, लोकतांत्रिक चुनाव हथियारबंद लड़ाई से हमेशा ही बेहतर होंगे। आन्ध्र में अभी-अभी एक बड़े नक्सल नेता ने पुलिस के सामने समर्पण किया है, देश में ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है कि लोकतांत्रिक राजनीति भी एक असल फर्क ला सकती है, और वैसे माहौल के बाद ही नक्सल आंदोलन से लोकतांत्रिक होने की उम्मीद की जा सकेगी। प्रशांत भूषण की राय से हम सहमत हैं, और यह राय अधिक मायने इसलिए रखती है कि माओवादी विचारकों से प्रशांत भूषण के बातचीत के रिश्ते हैं, और एक मानवाधिकारवादी वकील की हैसियत में प्रशांत भूषण की साख भी है। ऐसे ही लोगों के दिए हुए न्यौते का कोई वजन हो सकता है, और देश के तमाम लोकतांत्रिक नक्सल हिमायतियों को इस बात को आगे बढ़ाना चाहिए। 

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