04 जनवरी 2014
संपादकीय
जब कोई खबरों में आ जाते हैं, तो उनकी छोटी-छोटी बात भी मीडिया और जनचर्चा का खासा बड़ा हिस्सा खाने लगती हैं। दिल्ली के नौजवान और नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मकान का मामला कुछ ऐसा ही है। दो दिनों से न सिर्फ अटकलें चल रही हैं, बल्कि बंगलों की तस्वीरें भी दिखाई जा रही हैं कि अरविंद केजरीवाल किस सरकारी बंगले को मुख्यमंत्री निवास बनाने जा रहे हैं, और किस दूसरे बंगले को वे अपना दफ्तर बनाने जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने यह कहना भी शुरू कर दिया था कि इतने बड़े बंगले को केन्द्रीय मंत्रियों और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी नहीं मिलते। और यह चर्चा केजरीवाल की पार्टी आप के घोषणा पत्र के खिलाफ दिख रही थी, इसलिए इस चर्चा को लेकर इस नई पार्टी की आलोचना भी शुरू हो गई थी। लेकिन आज सुबह केजरीवाल ने यह साफ कर दिया है कि वे किसी बंगले में रहने नहीं जा रहे हैं।
आज हम जिस पर लिखना चाहते हैं, वह एक व्यक्ति केजरीवाल नहीं है, बल्कि एक परंपरा है जिसमें लोकतंत्र को सामंतवाद की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। पूरे देश में केन्द्र सरकार या प्रदेश सरकारों के ओहदों पर बैठे हुए लोग अपने इस्तेमाल के लिए जनता की जितनी दौलत का झोंक देते हैं, वह एक ऐसी परंपरा बन चुकी है कि एक पार्टी के बाद आने वाली दूसरी पार्टी की सरकार भी उसी नक्शेकदम पर चलने लगती है। उत्तरप्रदेश में दलितों की मसीहा मायावती अपने बंगलों पर सैकड़ों करोड़ खर्च करने के आरोपों से घिरी हुई हैं, और उनके पहले और उनके बाद के मुख्यमंत्री, समाजवादी पार्टी के पिता-पुत्र, अपने गांव में एक पूरा हवाई अड्डा बनवाकर जनता के पैसों से आए दिन उड़ान भर रहे हैं।
एक-एक मंत्री-अफसर को देखें तो उनके बंगलों पर सालाना खर्च ही करोड़ों का होता है, उन बंगलों के दाम भी दसियों करोड़ होते हैं, इससे परे गाडिय़ों के काफिले, रोजाना के दसियों हजार के खर्च भी किसी न किसी सरकारी मद से किए जाते हैं। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र के लिए तो नुकसानदेह और खतरनाक है ही, एक गरीब देश में यह सिलसिला हिंसा का भी है। हिंसा सिर्फ आतंकी बंदूकों और धमाकों से नहीं होती, जो जाहिर तौर पर गैरजानलेवा चीजें दिखती हैं, उनसे भी हिंसा होती है। जो महाराष्ट्र कुपोषण का शिकार है, वहां पर जब एक मंत्री सार्वजनिक रूप से दूध से नहाता है, तो वह भी कुपोषण से मरते हुए बच्चों के साथ हिंसा है। जब लोग पानी के टैंकरों के पास रात-रात गुजार देते हैं, तब मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर कई टैंकर पानी घास को सींचने में लगा दिया जाता है, कुत्तों को नहलाने में खर्च होता है, तो यह हिंसा से कम कुछ नहीं है।
हम उम्मीद करते हैं कि अरविंद केजरीवाल अपनी बात पर टिके रहेंगे, और किसी बड़े बंगले में जाकर नहीं रहेंगे। उनके साथ-साथ उनके बाकी मंत्रियों को भी छोटे मकान लेकर, या निजी घरों में रहकर काम करना चाहिए, ताकि सामंतवाद से थके हुए, और उससे नफरत करते हुए देश के भीतर उम्मीद का एक झोंका आए। ऐसा करने वाले बहुत से दूसरे लोग भी रहे हैं। पुरानी मिसालें देखें, तो त्रिपुरा में वामपंथी मुख्यमंत्री एक कमरे की जिंदगी गुजारते थे, और कई लोगों के लिखे संस्मरण बताते हैं कि एक वक्त ऐसा था कि नृपेण चक्रवर्ती और उस वक्त के उनके सादगी के हिमायती मुख्य सचिव शंकरन एक-एक कमरों में रहते थे, और कुर्सी छोडऩे पर मुख्यमंत्री एक छोटी सी पेटी उठाकर रिक्शे में ही रवाना हुए थे। वामपंथी मिजाज के चलते पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बैनर्जी ने भी छोटी कार में चलना तय किया, लालबत्तियों पर उनके लिए रास्ता खाली नहीं कराया जाता था, और शायद वे छोटे से निजी मकान में, घनी और आम बस्ती के भीतर रहती हैं।
दरअसल गांधी के इस देश में सत्ता आने के बाद लोगों के भीतर सेवाभाव जागने के बजाय जो सामंती अहंकार आ जाता है, उस सिलसिले को कहीं न कहीं तोडऩा जरूरी था। वामपंथियों ने तो एक लंबी परंपरा के तहत ऐसा हमेशा ही किया है, और दिल्ली में उनके सांसदों को मिलने वाले बंगलों में भी उनकी पार्टी के अखबारों, संगठनों, और कार्यकर्ताओं को जगह मिलती है, वामपंथी सांसदों की तनख्वाह भी पार्टी में जमा होती है और उनको उसका एक छोटा हिस्सा ही घर चलाने के लिए मिलता है। अरविंद केजरीवाल की जीत का वामपंथियों ने स्वागत किया है, खुलकर स्वागत किया है। और हमारा यह मानना है कि सादगी के जिस सिद्धांत को केजरीवाल ने सामने रखा है, ईमानदारी के जिस बर्ताव को सामने रखा है, उसकी वजह से भी वामपंथी प्रभावित हुए हैं।
आज देश में बाकी तमाम जगहों पर सत्ता का उपभोग करने वाले लोगों को भी अपने तौर-तरीके बिना देर किए बदलना चाहिए, ऐसा न होने पर आने वाले वक्त में पार्टियों और नेताओं को कब जनता की हिकारत से कितना बड़ा नुकसान होगा, यह उनको पता भी तब चलेगा जब सादगी के झोंके से सामंती छतें उड़ जाएंगी।

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