20 जनवरी 2014
संपादकीय
अरविंद केजरीवाल पर हम आज फिर से लिखना नहीं चाहते थे, लेकिन कोई दूसरा बड़ा मुद्दा नहीं है, और दिल्ली में केजरीवाल ने केन्द्र सरकार के खिलाफ आज जो धरना दिया है उस पर देश भर की जो प्रतिक्रिया इंटरनेट और टेलीविजन पर अब तक सामने आई है, उसे देखते हुए हम केजरीवाल से जुड़ी कुछ बातों पर लिखना चाहते हैं। इनमें से कुछ बातें हो सकता है महज उन पर ही लागू होती हों, और कुछ बातें हो सकता है कि और लोगों पर भी लागू हों।
पहली बात तो यह कि अपने अलावा हर किसी को बेईमान मानना, अपनी ईमानदारी के पक्ष में कोई सुबूत नहीं होता, कोई तक भी नहीं होता, और यह निहायत बेइंसाफी की बात भी होती है। दिल्ली पुलिस को भ्रष्ट कहना, केन्द्र सरकार के गृहमंत्री को पैसे लेने वाला कहना, अफ्रीकी महिलाओं को पेशा करने वाली कहना, नशे का धंधा करने वाली कहना, सारे राजनीतिक दलों को भ्रष्ट कहना, यह तरीका लोकतांत्रिक नहीं है। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को सत्ता सम्हाले अभी जरा से दिन हुए हैं, उनके नेताओं के खिलाफ जो स्टिंग ऑपरेशन सामने आए थे, उस पर इस पार्टी ने टीवी चैनलों से पूरे का पूरा फुटेज पाए बिना किसी कार्रवाई से इंकार कर दिया था, और बाद में भी उसके आधार पर कोई कार्रवाई करना जरूरी या मुनासिब नहीं समझा। दूसरी तरफ जब दिल्ली जल बोर्ड के कुछ अफसरों के स्टिंग ऑपरेशन सामने आए, तो हाथ में टेप आए बिना भी सबको निलंबित कर दिया गया। और यह अकेला मामला नहीं था। अपने खुद के बारे में बिल्कुल अलग किस्म के नैतिकता के पैमाने बनाकर चलना, और दूसरे हर किसी को चोर कहना, यह लोकतंत्र में नहीं चल सकता।
जहां तक दिल्ली में आज केजरीवाल के प्रदर्शन की बात, तो यह निहायत बेवकूफी और एक नाजायज जिद्द की बात है। जिन अफसरों से वे नाखुश हैं, उनको जांच के भी पहले निलंबित न करने पर वे केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय के सामने गणतंत्र दिवस तक धरने पर बैठकर क्या साबित कर रहे हैं? आम आदमी पार्टी के एक बड़े नेता, देश के एक बड़े वकील प्रशांत भूषण की कानूनी समझ इस बारे में क्या कहती है, कि जांच के पहले ही लोगों को निलंबित कर देना चाहिए? अफ्रीकी महिलाओं के साथ दिल्ली सरकार के आम आदमी मंत्री और उनके साथियों की कथित बदसलूकी को लेकर देश के एक बड़े वकील हरीश साल्वे अदालत तक गए हैं, मौके पर मौजूद दिल्ली पुलिस ने इस कानून मंत्री के बुरे बर्ताव को उजागर करने वाला बयान दर्ज कराया है। अफ्रीकी महिलाओं ने केजरीवाल के कानून मंत्री और उसकी भीड़ की बदसलूकी का बयान दिया है। ऐसे में अपने घर को ठीक करने के बजाय केजरीवाल गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का घर ठीक करने का बयान दे रहे हैं।
लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार अगर इस दर्जे की अराजकता दिखा रही है, तो इसे देखकर भारतीय जनता पार्टी आज सबसे अधिक खुश होगी, कि मोदी का खेल बिगाडऩे का खतरा बनने के पहले ही केजरीवाल नाम का यह धूमकेतु जनता के बीच आसमान से गिरकर मिट्टी में मिल जाएगा। बिना किसी मुद्दे के आज जब केजरीवाल एक सनकी और तानाशाही टकराव यूपीए सरकार से खड़ा कर रहे हैं, तो लोगों के मन में यह जायज शक खड़ा होता है कि क्या वे दिल्ली की सरकार को गिराकर अगले लोकसभा चुनाव में एक मुद्दा बनाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं? जिस तरह कुछ लोग कहानियों में उसी पेड़ की डाल काटते दिखते हैं, जिस पर कि वे बैठे रहते हैं, केजरीवाल उसी तरह हाथ में छेनी-हथौड़ी लेकर चबूतरे पर चढ़ाई गई अपनी ही प्रतिमा को चूर-चूर करते दिख रहे हैं। नारों की जुबान में अपने अलावा हर किसी के लिए उनकी गालियों की कोई जगह प्राकृतिक न्याय में भी नहीं है। ऐसा लगता है कि वे आत्ममुग्ध होकर अपने ही नारों के सैलाब पर चढ़-उतर रहे हैं, और ऐसी सर्फिंग उनको कहा ले जाकर छोड़ेगी, पता नहीं।

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