मनमोहन सिंह की पे्रस कांफे्रंस से बाकी लोगों के लिए नसीहत

5 जनवरी 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल के आखिरी महीने में अधिक से अधिक मजाक का शिकार होते जा रहे हैं। अब खबरें भी इस तरह से बनने लगी हैं, जो उनके साथ कुछ ज्यादती करती दिखती हैं। कल चारों तरफ एक खबर थी कि उनकी पे्रस कांफे्रंस के पहले उनके आसपास के सहयोगियों ने एक रिहर्सल करके सवाल पूछे ताकि प्रधानमंत्री संभावित सवालों के जवाब सोच सकें। हमारी जानकारी में न सिर्फ दुनिया के कोई भी बड़े नेता, बल्कि कोई भी अभिनेता या कारोबारी, जो भी मीडिया के सामने आने का एक बड़ा महत्वपूर्ण मौका पाते हैं, वे सभी ऐसी तैयारी करते होंगे। और अगर वे ऐसा नहीं करते होंगे, तो फिर अपने काम को जिम्मेदारी से न करने की तोहमत भी झेलने के लायक होंगे। 
प्रधानमंत्री की दूसरी आलोचना इस बात के लिए हो रही है कि उन्होंने अपने-आपको कमजोर नेता कहे जाने पर गुजरात दंगों के वक्त के वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ इशारा करते हुए कहा- 'अगर आप अहमदाबाद की गलियों में बेगुनाह लोगों के नरसंहार को प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नापने का पैमाना मानते हैं तो मैं इसमें विश्वास नहीं करता...।Ó 
मनमोहन सिंह पर लगातार यह तोहमत लगती है कि वे चुप रहते हैं। हम भी हमेशा यह लिखते हैं कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को अधिक मौकों पर, अधिक मुद्दों पर, अधिक बोलना चाहिए। अब अगर उन्होंने इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो चुकी इस हकीकत को गिनाया है, तो इसे लेकर उनको कोसना ठीक नहीं है। उन्होंने न तो मोदी को ऐसे मानव संहार का मुजरिम कहा है, और न ही कोई भद्दी जुबान इस्तेमाल की है। उन्होंने गुजरात की इन हत्याओं के वक्त वहां रहे मुख्यमंत्री की क्षमता को लेकर अपनी राय दी है, और उस क्षमता पर अगर कांगे्रस का प्रधानमंत्री अपनी राय भी न दे, तो क्या करे? उनकी पे्रस कांफे्रंस के पहले से जो लोग एक खुर्दबीन लेकर बैठे थे, और उनकी कही एक-एक बात को उनके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए चौकन्ना थे, उनको उस लंबी-चौड़ी पे्रस कांफे्रंस में वही एक लाइन हमले के लायक मिली, क्योंकि मनमोहन सिंह बहुत ही शरीफ जुबान बोलते हैं। 
दरअसल सार्वजनिक जीवन में बहुत से ऐसे मौके होते हैं, जिनमें जीत की कोई गुंजाइश ही नहीं होती। सिर्फ हार जहां तय होती है, वैसी ही एक नौबत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने आज है। इसलिए उनका खुद का यह कहना सही था कि जब इतिहास उनके बारे में लिखेगा तो शायद वह आज के मीडिया के मुकाबले कुछ अधिक रहमदिल होगा। लेकिन लोकतंत्र जहां लोगों को सत्ता पर आने, उसका बेजा इस्तेमाल करने, और फिर भी किसी सजा से बच जाने का लगभग अंतहीन मौका देता है, वहीं पर लोकतंत्र आज के माहौल में एक बेरहम जवाबदेही भी खड़ी कर चुका है। न सिर्फ मनमोहन सिंह के लिए, कांगे्रस या यूपीए के लिए, बल्कि आज सत्ता से जुड़े हर किसी के लिए अपने कामकाज के लिए अधिक जवाबदेही का माहौल है। न सिर्फ परंपरागत और संगठित मीडिया, बल्कि आज इंटरनेट की मेहरबानी से हर की-बोर्ड, हर मोबाइल फोन को एक ऐसी आवाज का दर्जा मिल चुका है, जो दुनिया भर में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकती है। और इसके साथ ही ऐसी आवाज लगातार गूंज भी सकती है, गूंजती ही है। 
मनमोहन सिंह के लिए हमारे पास कोई हमदर्दी इसलिए नहीं है क्योंकि उनके राज में उनके भ्रष्ट सहयोगियों से परे बाकी देश को दर्द ही दर्द मिला है। और दर्द देने वाले के साथ हमदर्दी की कोई वजह हो भी नहीं सकती। लेकिन उनकी पे्रस कांफे्रंस में उन्होंने एक से अधिक बार, शायद कई बार अपने कामकाज के मूल्यांकन के बारे में कहा कि इतिहास उसका मूल्यांकन करेगा। यह एक किस्म की सज्जनता और विनम्रता भी है, और दूसरे किस्म का बचाव भी है। इतिहास तो दस बरस के हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री के बारे में लिखेगा ही, यह तो तय है ही, लेकिन बहुत से सवालों के जवाब में महज इतिहास पर सब छोड़ देना कुछ उसी किस्म का लगता है, जिस तरह कानूनी कटघरे में घिरे नेता जनता की अदालत में जाने की बात करते हैं। अपने ताजा-ताजा आज, और अभी-अभी बीते कल के दस बरसों के बारे में तो मनमोहन सिंह इतिहास की आड़ नहीं लेनी थी, और कुछ अधिक साफ, कुछ अधिक ठोस जवाब देने थे।
कुल मिलाकर आज इस मुद्दे पर लिखने का हमारा मकसद यह है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों को याद दिलाएं, कि कुछ बरस पहले के मुकाबले अब उनकी जवाबदेही बढ़ चुकी है, क्योंकि अब मीडिया का विस्तार आम जनता तक हो चुका है, और उसके पास अपने हमलावर तेवरों के लिए मुफ्त का इंटरनेट-मीडिया आ गया है। मनमोहन सिंह की पे्रस कांफे्रंस काफी नर्मदिल रही, मीडिया के जो लोग वहां मौजूद थे, उन्होंने सबसे तीखे सवालों को छोड़ ही दिया, लेकिन वहां नामौजूद लोगों ने पे्रस कांफे्रंस के चलते-चलते ही ऐसे सारे सवालों को सार्वजनिक इंटरनेट पर उछाल दिया, और जनता के एक हिस्से के बीच वे सवाल पे्रस कांफे्रंस से परे भी उठ ही गए। सार्वजनिक जीवन के लोगों को ऐसी नौबत के लिए तैयार रहना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें