देश के ऐतिहासिक जख्मों और रेत-कागज की कहानी

30 जनवरी 2014
संपादकीय

दिल्ली आज फिर तनाव देख रहा है। राहुल गांधी ने 1984 के दंगों को लेकर कांग्रेस के लोगों की जितनी भी जिम्मेदारी मानी है, उसे लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उपराज्यपाल से मिलकर इन दंगों की हत्याओं पर विशेष जांच दल बनाने की मांग की है, और दिल्ली में रिसते जख्मों वाला सिक्ख समाज आज फिर सड़कों पर है। कांग्रेस मुख्यालय के सामने सिक्खों का प्रदर्शन हो रहा है, और बहुत से नेता बयान दे रहे हैं कि राहुल गांधी जिनको कुसूरवार मानते हैं, उनके नाम बताएं। 
दरअसल राहुल गांधी के टीवी इंटरव्यू के साथ एक दिक्कत यह हो गई कि उनकी तैयारी जवाबों को लेकर नहीं थी। जिन दंगों को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पहले ही माफी मांग चुके हैं, उस माफी का कोई जिक्र भी राहुल गांधी ने कई सवालों, और कई जवाबों के दौरान नहीं किया। किसी भी सार्वजनिक नेता से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती कि वे नाजुक मुद्दों पर अधूरी बात कहें, अहमियत वाली कही जा चुकी बातों का जिक्र न करें, और एक गलत तस्वीर बनने दें। इस इंटरव्यू को लेकर दिल्ली से ऐसी खबरें रिस रही हैं कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं की सहमति और तैयारी के बिना ही, ऊपर-ऊपर विज्ञापन एजेंसियों ने यह अंग्रेजी इंटरव्यू तय किया था। हम इस अंदरुनी बात पर यहां पर कुछ कहना नहीं चाहते, चाहे वह सच हो, चाहे गलत हो, हम सिर्फ जो जाहिर बातें हैं, उन्हीं पर यहां लिखना चाहते हैं। 
यह देश कुछ ऐतिहासिक जख्मों से भरा हुआ है। गांधी की हत्या के पहले से भारत और पाकिस्तान के विभाजन के जख्म, फिर गांधी की हत्या, और फिर बाबरी मस्जिद को गिराना, उसके बाद मुंबई के आतंकी हमलों में सैकड़ों मौतें, स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई, इंदिरा गांधी की हत्या, सिक्ख विरोधी दंगे, गुजरात के दंगे वगैरह। ये सारे जख्म वक्त-वक्त पर रिसने लगते हैं, और अगर ये सूखते दिखते हैं, तो इनको कुरेदकर चुनावी मुद्दा बनाया जाता है। लोकतंत्र ऐसे ऐतिहासिक जख्मों को न तो अनदेखा कर सकता है, और न ही उन्हीं को थामे हुए आगे बढ़ सकता है। अब यहां पर हमारी सोच जवाब दे जाती है, कि कौन से ऐतिहासिक जुर्म, और कौन से ऐतिहासिक मुजरिम, कब तक, किन-किन कटघरों में रहना चाहिए, या फिर किसी एक पन्ने के हिसाब को एक वक्त के बाद चुकता मानकर, आगे की सोचनी चाहिए। हम ऐसी कोई एक रीति-नीति नहीं सोच पा रहे, कि क्या करना चाहिए? और हिन्दुस्तान अकेला ऐसा देश नहीं है जहां पर कि ऐसे ऐतिहासिक जख्म पीढिय़ों तक आगे बढ़ते चलते हैं, और उनका कोई इलाज नहीं हो पाता। 
ऊपर की लिस्ट में हमने कई बातों को शामिल नहीं भी किया है, जो अब लिखते-लिखते याद आ रही हैं, जैसे कि कश्मीर से पंडितों को निकालना। वहां की वादियों से लाखों हिन्दू पंडितों को भगाना, और दशकों के बाद भी आज उनका शरणार्थियों की तरह अपनी जमीन-जायदाद, अपने शहर-प्रदेश से दूर दिल्ली या और दूसरी जगहों पर रहना। अपने ही देश के भीतर अगर कोई इतनी बड़ी बिरादरी सिर्फ धर्म के आधार पर बेदखल कर दी गई है, तो यह किसी तरह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं है, और हिन्दुस्तान ने मानो, कश्मीर और पंडितों से परे के हिन्दुस्तान ने मानो, इस बेदखली के साथ जीना सीख लिया है। आज इस पूरे मुद्दे पर लिखने को सिर्फ दिल्ली के सिक्ख-प्रदर्शनों की वजह से जरूरी नहीं लग रहा है, आज गांधी की हत्या की सालगिरह भी है। और हिन्दुस्तान के इतिहास की इस सबसे बड़ी हत्या के पीछे की सोच आज भी फल-फूल रही है। 
लोकतंत्र के भीतर कब किस जख्म पर मरहम पट्टी करके उससे आगे बढ़ा जाए, यह उस लोकतंत्र के भीतर भी परस्पर विरोधी ताकतें भी तय करती हैं। हिन्दुस्तान में ऐसी राजनीतिक ताकतें हाथ में रेत-कागज लेकर चलती हैं, कि जख्म हल्के से भरते दिखें, तो उनको तुरंत रगड़ दिया जाए। ऐसे में लिखते-लिखते आखिर में एक ही बात सूझती है कि ऐसी तमाम ताकतों को अदालती इंसाफ पर अब तक भरोसा है, और अगर देश की अदालतों ने वक्त पर अपना काम पूरा किया होता, तो शायद हिन्दुस्तानी पीढिय़ां उठकर आगे बढ़ सकती थीं। लेकिन इसके साथ-साथ हिन्दुस्तान की राजनीतिक पार्टियों को देखने पर भी शर्म आती है, कि कहीं पर टाईटलर और सज्जन कुमार की ताजपोशी होती है, तो कहीं पर अमित शाह की। राजनीतिक दल अपनी सोच को जनता के लिए हिंसक बनाकर चलने में कुछ बुरा नहीं मानते। 

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