18 जनवरी 2014
संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली एक शहर भी है, और एक शहरवाला राज्य भी है। यह एक म्युनिसिपल भी है, और यहां पर दिल्ली विकास प्राधिकरण का डीडीए नाम का साम्राज्य भी है। और इन सबसे ऊपर, यहां पर पुलिस केंद्र सरकार की है। ऐसे एक शहरवाले राज्य में आम आदमी पार्टी एक धूमकेतु की तरह आई, और कांगे्रस के खिलाफ जनता की नाराजगी से जो एक भारी-भरकम शून्य पैदा हुआ था, उसको उसने भर दिया। बहुमत न होने पर भी उसकी सरकार बन गई, क्योंकि उससे अधिक सीटों वाली भाजपा भी सरकार बनाने को तैयार नहीं थी। अब इस सरकार के चलते कुछ हफ्ते हो चुके हैं, और इसके बावजूद इस पार्टी के तौर-तरीके सड़क के आंदोलनकारियों वाले बने हुए हैं। इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है, अगर इस पार्टी की समझ परिपक्व होती चले। वैसे तो कहने के लिए इसके साथ योगेन्द्र यादव जैसे अनुभवी और जानकार समाजशास्त्री हैं, लेकिन इसके तौर-तरीके अभी ऐसे बने हुए हैं कि यह पार्टी म्युनिसिपल के एक वार्ड की राजनीति कर रही है, जिसके सामने सिर्फ नाली-पानी, और बिजली जैसे मुद्दे रहते हैं।
आम आदमी पार्टी के बारे में आज यह चर्चा इसलिए करनी पड़ रही है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों को छोड़ भी दें, तो भी राष्ट्रीय मामलों पर भी इस पार्टी की सोच और समझ अब तक सामने नहीं है, जबकि यह पार्टी लोकसभा की चार सौ सीटों पर चुनाव लडऩे की सोच रही है। साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर, क्षेत्रीयता के मुद्दे पर, आर्थिक नीतियों के मुद्दे पर इस पार्टी का रूख आना बचा हुआ है। इससे परे, समलैंगिकता के मुद्दे पर, महिला अधिकार के मुद्दे पर भी अब तक इस पार्टी का कोई घोषित रूख जनता तक नहीं पहुंचा है। दिल्ली के स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहने के साथ-साथ अभी जो ताजा मामला हुआ है उसमें आम आदमी पार्टी के दिल्ली राज्य के कानून मंत्री ने जिस अराजक तरीके से कानून हाथ में लेते हुए अफ्रीका की कुछ महिलाओं के साथ सड़क पर जिस तरह का सुलूक किया है, वह एकदम ही भयानक है। और इस पर केजरीवाल से लेकर योगेंद्र यादव तक की चुप्पी भी भयानक है। इसे लेकर इस पार्टी की सरकार ने केंद्र सरकार के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस पर हमला बोल दिया है, लेकिन ऐसे अराजक तरीके से कोई राज नहीं चलता। और सच तो यह है कि राज से भी परे, विपक्ष भी अराजकता से नहीं चलता, कोई संगठन या कोई आंदोलन भी अराजकता से नहीं चलता।
अरविंद केजरीवाल की पार्टी को वामपंथियों ने तुरंत ही समर्थन तो दे दिया है, लेकिन अन्ना हजारे की सोच से लेकर आज आम आदमी पार्टी के तौर-तरीकों तक लोगों को एक शक हो रहा है कि यह भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर, ईमानदार-सरकार चलाने के नाम पर एक प्रतिक्रियावादी, दकियानूसी पार्टी तो नहीं बन जाएगी, जो कि ईमानदारी के मुद्दे पर समर्थन पाकर सत्ता में आई है। हम अभी आनन-फानन ऐसे किसी शक का साथ देना नहीं चाहते, लेकिन इस पार्टी को कागजी घोषणापत्र से परे अपने तौर-तरीकों से, अपने बयानों और अपनी हरकतों से यह जाहिर और साबित करना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार से परे बाकी के मुद्दों पर इस पार्टी की सोच क्या है। जो भी पार्टी देश भर में जाना चाहती है, और देश भर से होकर संसद में आना चाहती है, उसे तीखे तेवरों, नारों, और आम हुलिए से परे भी जलते हुए मुद्दों पर अपनी राय साफ-साफ सामने रखनी होगी। अगर केजरीवाल और उनके मंत्री-साथी दिल्ली राज्य को एक विपक्षी बागी तेवरों के साथ एक म्युनिसिपल की तरह चलाना चाहते हैं, तो देश भर में समर्थन पाने के सपने उनके सपने ही रह जाएंगे।
आम आदमी पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधारने होंगे, अफ्रीकी महिलाओं के साथ जो बर्ताव इस पार्टी के मंत्री ने किया है, वह बिल्कुल भी बर्दाश्त के लायक नहीं है, और सड़कों पर कानून से परे अपने खुद के कानून को लागू करने का यह तरीका किसी लोकतंत्र में नहीं चलेगा।

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