29 जून 08
लेखक और पत्रकार समय-समय पर इस बात को अपना हक मान लेते हैं कि किसी निजी बातचीत को वे अपने समझे जनहित के हिसाब से या अपनी किताब के अधिक बिकने की संभावना पैदा करने के लिए लिख डालें। कुछ लेखक-पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने देखें दायरे और अपने से हुई किसी की बातचीत का बहुत खुलासे से ब्यौरा देते हैं और उनकी भाषा और लिखने के अंदाज के कारण उनका वह हिस्सा बहुत लोकप्रिय भी हो जाता है। ऐसे दिग्गज लेखकों के लिखने की ऐसी आंखों देखी शैली उनके नाम के साथ जुड़ भी जाती है। पिछले दिनों एक पत्रकार की लिखी एक किताब की चर्चा निकली तो उसे पलट या पढ़ चुके एक पेशेवर पाठक ने मुझसे कहा कि इस किताब की शैली फलां बड़े, नोबल पुरस्कार विजेता लेखक के अंदाज में है लेकिन उसकी उत्कृष्टïता को कहीं छू भी नहीं गई है।
मैंने इस किताब को उधार लेकर इसके कुछ हिस्से पढ़े। इसलिए कि उन हिस्सों में मेरे परिचित कुछ लोगों के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया था।किताब की बाकी जानकारियां तो मोटेतौर पर मेरी अलग-अलग जगहों पर पढ़ी हुई थी और उन्हीं तथ्यों को एक लेखक के बहुत स्पष्टï पूर्वाग्रह के साथ दुबारा पढऩे जितनी दिलचस्पी मुझे नहीं थी। लेकिन मैं अपने परिचित कुछ लोगों का चित्रण उस किताब में देखना चाहता था।
पढ़ते-पढ़ते एक निराशा हुई कि कोई जाना-माना पेशेवर लेखक किस तरह अप्रासंगिक और संदर्भहीन बातों को उन लोगों के खिलाफ लिख सकता है जिन लोगों ने उसे मांगने पर समय दिया और सामान्य शिष्टïाचार का सत्कार भी किया। महत्वहीन बातों पर पन्ने खराब होना मेरे लिए उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था जितना यह खतरनाक बात थी कि किसी लेखक या पत्रकार से बात करने का मतलब अपने खिलाफ उसे लिखने का एक मौका देना है और यह खतरा उठाना है कि कोई व्यक्ति किस तरह आपके शिष्टïाचार का बेजा इस्तेमाल कर सकता है।
मुझे लिखने के पेशे को लेकर यह लगता है कि लेखक या पत्रकार को बहुत सतही और तात्कालिक उपलब्धि के लिए लोगों का भरोसा नहीं तोडऩा चाहिए। इसलिए कि वह लेखक या पत्रकार तो शायद उस नेता या अफसर या अपने हमपेशा से दुबारा न मिले और उसे तो एक अघोषित विश्वास को तोडऩे का नुकसान न झेलना पड़े, लेकिन जब उसके पेशे का कोई दूसरा कलमकार वहां पहुंचेगा तो क्या उसे वैसा सामान्य शिष्टïाचार मिल सकेगा? और शिष्टïाचार से परे, क्या उसे वैसी जानकारी कोई घायल व्यक्ति देना चाहेगा? अपने नफे के लिए, अगर यह सचमुच कोई नफा है तो, पूरे पेशे को नुकसान में डालना किस तरह की ईमानदारी है? आज अगर कोई पत्रकार किसी की बताई ऐसी बात को कहीं लिख मारता है जो उसने आपसी समझ के भरोसे में कही थी तो क्या अगली बार ऐसी किसी आपसी समझ के लिए भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे पत्रकार को ईमानदारी से कोई बात कहेगा?
ऐसा काम करने वाले लेखकों और पत्रकारों, खासकर पत्रकारों, के बीच मैंने यह खतरनाक सोच देखी है कि किसी सूचना के साथ वे सामाजिक हित, जनहित या पेशे के लिए ईमानदारी का निष्कर्ष आनन-फानन निकालकर उसे पन्नों पर परोस देने को बेसब्र रहते हैं। जबकि लेखन या पत्रकारिता जैसे पेशे को नुकसान पहुंचाने वाली बातें व्यापक जनहित में नहीं हो सकतीं। इन दोनों कामों से लोकतंत्र का इतिहास भी जुड़ा हुआ है और भविष्य भी जुड़ा रहेगा। दो-चार कलमें तो आती-जाती रहेंगी लेकिन ये अगर किडनी कांड की तरह डॉक्टरी के पेशे को बदनाम करेंगी तो उससे पूरे पेशे की साख खराब होगी और बिना साख वाला लिखने-छपने का धंधा लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
साहित्य के पाठकों को याद होगा कि तीनेक साल पहले एक लेखक-पत्रकार ने अपनी एक इलाके की यात्रा को ऐसे अंदाज में खुलासे से लिखा था मानो वह सेक्स पर्यटन के लिए कुख्यात किसी देश से लौटकर वहां के अनजान लोगों के साथ अपने देह संबंध के बारे में लिख रहे हों। अपने दायरे के शहर, समय और परिचित लोगों के बारे में खुलकर लिखते हुए जब कोई उन्हें इस कदर नंगा करने पर उतारू हो जाए तो शिष्टïाचार की बात तो अलग रही, इंसान का इंसान पर से ही विश्वास उठ जाता है। न ऐसे लेखक आगे प्रतिष्ठïा पा सकते और न ही इन लेखकों से घायल लोग किसी दूसरे लेखक को अपना वक्त देते और न ही अपनी देह।
सामान्य पाठकों को मेरी इस बात में एक बड़ी खामी लग सकती है। अखबारों में देशभर में प्रचलित और लोकप्रिय अंगे्रजी के एक स्तंभकार खुशवंत सिंह का लिखा चटखारे लेकर पढ़ा जाता है। जितने खुलासे से वे अपने जीवन के नारी पात्रों की शिनाख्त के साथ लिखते हैं उससे उन्होंने विश्वासहीन संबंधों पर आधारित संस्मरण लेखक की एक नई शैली शुरू की है। लोग यह कह सकते हैं कि मेरी तमाम बातें बहुत दकियानूसी और पुराने ख्याल की हैं, क्योंकि खुशवंत सिंह जैसे लोग तो मेनका गांधी के बारे में सेक्स शब्दावली में लिखकर भी चर्चित और सफल हैं और अखबार उन्हें छापने पर उतारू रहते हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि कोई भी गंभीर व्यक्ति कोई ईमानदार राज ऐसे लेखक के साथ कभी नहीं बांटेगा, क्योंकि ऐसा लेखक कब किसके कपड़े उघाड़ दे क्या पता?
यह तो बात हुई खुशवंत सिंह जैसे बूढ़े और तीन पीढ़ी पहले के इंसान की। लेकिन आज तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टेक्नालॉजी ने लोगों के मन में किसी भी आपसी बातचीत के लिए सम्मान पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब खुफिया कैमरा या माइक्रोफोन, या मोबाइल फोन की रिकॉर्डिंग सुविधा ने स्टिंग ऑपरेशनों का सिलसिला चलाकर आपसी समझ या 'ऑफ द रिकॉर्डÓ जैसी पेशेवर बारीकियों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसीलिए आज बहुत से दफ्तरों में, नेताओं-अफसरों के घरों में फोन लेकर घुसना भी बंद करवा दिया गया है। लेकिन इससे भी उन लेखकों के आंख-कान और दिमाग पर रोक तो नहीं लग सकती जो किसी से उन्हें मिले समय का बेवजह का बेजा इस्तेमाल उन्हीं लोगों के खिलाफ करते हुए अपने पेशे का नुकसान भी नहीं समझते।
लेखक और पत्रकार समय-समय पर इस बात को अपना हक मान लेते हैं कि किसी निजी बातचीत को वे अपने समझे जनहित के हिसाब से या अपनी किताब के अधिक बिकने की संभावना पैदा करने के लिए लिख डालें। कुछ लेखक-पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने देखें दायरे और अपने से हुई किसी की बातचीत का बहुत खुलासे से ब्यौरा देते हैं और उनकी भाषा और लिखने के अंदाज के कारण उनका वह हिस्सा बहुत लोकप्रिय भी हो जाता है। ऐसे दिग्गज लेखकों के लिखने की ऐसी आंखों देखी शैली उनके नाम के साथ जुड़ भी जाती है। पिछले दिनों एक पत्रकार की लिखी एक किताब की चर्चा निकली तो उसे पलट या पढ़ चुके एक पेशेवर पाठक ने मुझसे कहा कि इस किताब की शैली फलां बड़े, नोबल पुरस्कार विजेता लेखक के अंदाज में है लेकिन उसकी उत्कृष्टïता को कहीं छू भी नहीं गई है।
मैंने इस किताब को उधार लेकर इसके कुछ हिस्से पढ़े। इसलिए कि उन हिस्सों में मेरे परिचित कुछ लोगों के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया था।किताब की बाकी जानकारियां तो मोटेतौर पर मेरी अलग-अलग जगहों पर पढ़ी हुई थी और उन्हीं तथ्यों को एक लेखक के बहुत स्पष्टï पूर्वाग्रह के साथ दुबारा पढऩे जितनी दिलचस्पी मुझे नहीं थी। लेकिन मैं अपने परिचित कुछ लोगों का चित्रण उस किताब में देखना चाहता था।
पढ़ते-पढ़ते एक निराशा हुई कि कोई जाना-माना पेशेवर लेखक किस तरह अप्रासंगिक और संदर्भहीन बातों को उन लोगों के खिलाफ लिख सकता है जिन लोगों ने उसे मांगने पर समय दिया और सामान्य शिष्टïाचार का सत्कार भी किया। महत्वहीन बातों पर पन्ने खराब होना मेरे लिए उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था जितना यह खतरनाक बात थी कि किसी लेखक या पत्रकार से बात करने का मतलब अपने खिलाफ उसे लिखने का एक मौका देना है और यह खतरा उठाना है कि कोई व्यक्ति किस तरह आपके शिष्टïाचार का बेजा इस्तेमाल कर सकता है।
मुझे लिखने के पेशे को लेकर यह लगता है कि लेखक या पत्रकार को बहुत सतही और तात्कालिक उपलब्धि के लिए लोगों का भरोसा नहीं तोडऩा चाहिए। इसलिए कि वह लेखक या पत्रकार तो शायद उस नेता या अफसर या अपने हमपेशा से दुबारा न मिले और उसे तो एक अघोषित विश्वास को तोडऩे का नुकसान न झेलना पड़े, लेकिन जब उसके पेशे का कोई दूसरा कलमकार वहां पहुंचेगा तो क्या उसे वैसा सामान्य शिष्टïाचार मिल सकेगा? और शिष्टïाचार से परे, क्या उसे वैसी जानकारी कोई घायल व्यक्ति देना चाहेगा? अपने नफे के लिए, अगर यह सचमुच कोई नफा है तो, पूरे पेशे को नुकसान में डालना किस तरह की ईमानदारी है? आज अगर कोई पत्रकार किसी की बताई ऐसी बात को कहीं लिख मारता है जो उसने आपसी समझ के भरोसे में कही थी तो क्या अगली बार ऐसी किसी आपसी समझ के लिए भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे पत्रकार को ईमानदारी से कोई बात कहेगा?
ऐसा काम करने वाले लेखकों और पत्रकारों, खासकर पत्रकारों, के बीच मैंने यह खतरनाक सोच देखी है कि किसी सूचना के साथ वे सामाजिक हित, जनहित या पेशे के लिए ईमानदारी का निष्कर्ष आनन-फानन निकालकर उसे पन्नों पर परोस देने को बेसब्र रहते हैं। जबकि लेखन या पत्रकारिता जैसे पेशे को नुकसान पहुंचाने वाली बातें व्यापक जनहित में नहीं हो सकतीं। इन दोनों कामों से लोकतंत्र का इतिहास भी जुड़ा हुआ है और भविष्य भी जुड़ा रहेगा। दो-चार कलमें तो आती-जाती रहेंगी लेकिन ये अगर किडनी कांड की तरह डॉक्टरी के पेशे को बदनाम करेंगी तो उससे पूरे पेशे की साख खराब होगी और बिना साख वाला लिखने-छपने का धंधा लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
साहित्य के पाठकों को याद होगा कि तीनेक साल पहले एक लेखक-पत्रकार ने अपनी एक इलाके की यात्रा को ऐसे अंदाज में खुलासे से लिखा था मानो वह सेक्स पर्यटन के लिए कुख्यात किसी देश से लौटकर वहां के अनजान लोगों के साथ अपने देह संबंध के बारे में लिख रहे हों। अपने दायरे के शहर, समय और परिचित लोगों के बारे में खुलकर लिखते हुए जब कोई उन्हें इस कदर नंगा करने पर उतारू हो जाए तो शिष्टïाचार की बात तो अलग रही, इंसान का इंसान पर से ही विश्वास उठ जाता है। न ऐसे लेखक आगे प्रतिष्ठïा पा सकते और न ही इन लेखकों से घायल लोग किसी दूसरे लेखक को अपना वक्त देते और न ही अपनी देह।
सामान्य पाठकों को मेरी इस बात में एक बड़ी खामी लग सकती है। अखबारों में देशभर में प्रचलित और लोकप्रिय अंगे्रजी के एक स्तंभकार खुशवंत सिंह का लिखा चटखारे लेकर पढ़ा जाता है। जितने खुलासे से वे अपने जीवन के नारी पात्रों की शिनाख्त के साथ लिखते हैं उससे उन्होंने विश्वासहीन संबंधों पर आधारित संस्मरण लेखक की एक नई शैली शुरू की है। लोग यह कह सकते हैं कि मेरी तमाम बातें बहुत दकियानूसी और पुराने ख्याल की हैं, क्योंकि खुशवंत सिंह जैसे लोग तो मेनका गांधी के बारे में सेक्स शब्दावली में लिखकर भी चर्चित और सफल हैं और अखबार उन्हें छापने पर उतारू रहते हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि कोई भी गंभीर व्यक्ति कोई ईमानदार राज ऐसे लेखक के साथ कभी नहीं बांटेगा, क्योंकि ऐसा लेखक कब किसके कपड़े उघाड़ दे क्या पता?
यह तो बात हुई खुशवंत सिंह जैसे बूढ़े और तीन पीढ़ी पहले के इंसान की। लेकिन आज तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टेक्नालॉजी ने लोगों के मन में किसी भी आपसी बातचीत के लिए सम्मान पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब खुफिया कैमरा या माइक्रोफोन, या मोबाइल फोन की रिकॉर्डिंग सुविधा ने स्टिंग ऑपरेशनों का सिलसिला चलाकर आपसी समझ या 'ऑफ द रिकॉर्डÓ जैसी पेशेवर बारीकियों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसीलिए आज बहुत से दफ्तरों में, नेताओं-अफसरों के घरों में फोन लेकर घुसना भी बंद करवा दिया गया है। लेकिन इससे भी उन लेखकों के आंख-कान और दिमाग पर रोक तो नहीं लग सकती जो किसी से उन्हें मिले समय का बेवजह का बेजा इस्तेमाल उन्हीं लोगों के खिलाफ करते हुए अपने पेशे का नुकसान भी नहीं समझते।
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