मुद्दे के म को कुचलते बाकी चार म

22 जून
मंच पर या नीचे, किसी भी तरफ बैठकर किसी कार्यक्रम की तकलीफ को भुगतना कभी-कभी अपनी पसंद से परे की बात हो जाती है। कुछ स्थितियां ऐसी बनती हैं कि वहां जाना ही पड़ता है। हर महीने औसतन एक बार ऐसे तकलीफ से गुजरते हुए मैं यह सोचते चलता हूं कि देश का कितना समय फि जूल की बातों में खर्च होता है।
पहले तो किसी कार्यक्रम में पहुंचना अपने-आप में घंटे-आधे घंटे की बात होती है। फिर लगभग इतना ही वक्त कार्यक्रम शुरू होने के इंतजार में बर्बाद होता है। इसके बाद फूलों पर अत्याचार का दौर चलता है और लोग एक-दूसरे का लंबा स्वागत करते चलते हैं। इसके बाद बारी आती है एक-दूसरे के बारे में झूठ बोलने की। एक-दूसरे में नामौजूद खूबियों को गढ़कर उनका ऐसा लंबा-चौड़ा बखान होता है कि झूठ से मन अघाकर उबकाई खाने लगता है। लगता है कि कौन किसको बेवकूफ बना रहा है? मंच के लोग, सामने बैठे लोग और उन दोनों तबकों के बीच माला-गुलदस्ता लेकर आते-जाते लोग, हर कोई तो असलियत को जानता है। और जब तमाम लोग सच को जानते हैं तो ऐसे भूले हुए सच की याद भी मंच, माइक और माला के बीच खड़े किए जाते झूठ से एक बार फिर आ जाती है। अगर ऐसा झूठ खड़ा न किया जाए तो इंसानी मिजाज लोगों के सच को भूलने की कोशिश भी करते रहता है। क्योंकि बहुत सच के साथ जीना आसान नहीं होता इसलिए हम सब एक-दूसरे के सच को अनदेखा करने में भी लगे रहते हैं। एक-दूसरे का पूरे का पूरा सच पूरे एहसास के साथ महसूस करने लगे तो फिर केवल अनजान के साथ ही रहना हो पाएगा। लेकिन मंच से या बराबरी की जमीन वाली किसी बैठक में जो झूठ कहा जाता है वह फिर ऐसे एहसास को ताजा करता है और वैसी जगह पर बैठना मेरे लिए भारी पडऩे लगता है।
चूंकि कुछ लोगों को जिंदा रहना होता है, कुछ लोगों को जिंदा करना होता है और कुछ लोगों को आगे अपनी स्मृतियां जिंदा रखने की गारंटी करनी होती है इसलिए कार्यक्रम तो होते ही रहेंगे। लेकिन मैं सोचता हूं कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री या देश के प्रधानमंत्री अगर यह शर्त रख दें कि उनके कार्यक्रम में फूलों से सिर्फ एक स्वागत हो और संबोधन में कोई भी व्यक्ति किसी का भी नाम या पदनाम न गिनाए तो ऐसे कार्यक्रमों का समय शायद आधा ही रह जाएगा। ऐसी मूर्खतापूर्ण परंपरा कब और कैसे शुरू हुई मैं यह सोचते ही रह जाता हूं। जब पूरी तरह से अर्थहीन औपचारिकता मंच पर चलती रहे और वहां बैठे लोग मूर्खों की तरह किसी सार्थक बात के शुरू होने का इंतजार करें तो यह देश की उत्पादकता का नुकसान है।
मंच, माला, माइक और महत्व के नाम पर एक ऐसा फरेब मुझे चारों तरफ दिखता है जिसमें म से शुरू होने वाला एक और शब्द, मुद्दा, खो ही गया है। ऊपर के चारों म के पैरों तले यह पाँचवां, अकेला जरूरी म, बुरी तरह कुचला जाता है। मुद्दे का म ऐसा हो जाता है मानो किसी गरीब बच्चे के मेरिट में आने पर स्कूल के शिक्षक, प्राचार्य, अध्यक्ष-सचिव मिलकर उसके साथ तस्वीर खिंचवाएं और उसमें बच्चे का चेहरा ही गायब हो जाए। ऐसी स्थिति अगर मंच पर हो तो उसमें पता लगे कि माइक पर ऊपर के चारों महानुभाव एक-दूसरे की प्रशंसा करते रह जाएं, एक-दूसरे को माला पहनाते रह जाएं और बच्चे की कोई चर्चा ही न हो।
जिस तरह कुछ लोग अपने जिंदा रहने या अपनी स्मृतियों को जिंदा रखने के लिए इन चार म का इस्तेमाल करते हैं उसी तरह से कुछ ऐसे पेशेवर दर्शक, श्रोता और मेहमान हो गए हैं जो बिना भाड़ा पाए किसी भी कार्यक्रम में दांत निपोरते चले जाते हैं और कार्यक्रम की 'शोभा बढ़ातेÓ हैं। कुल जमा इस तरह के पेशेवर लोगों या ऐसे पेशेवर निरर्थक अंदाज के कार्यक्रमों में देश का इतना बड़ा समय बर्बाद हो रहा है कि कार्यक्रमों के नाम पर उबकाई अधिक आती है।
कुछ आयोजकों से बेतकल्लुफी के चलते मैंने यह भी कहा कि कार्यक्रम के कुल जमा समय का कम से कम आधा हिस्सा तो सार्थक बातों का रखा जाए, लेकिन उन्होंने पूरी कोशिश करके बताया कि इस बार तो सब कुछ तय हो चुका है, अगली बार इसकी कोशिश करेंगे। आज की व्यस्त जिंदगी में लोगों के पास शास्त्रीय संगीत के आलाप की तरह की लंबी शुरूआत का समय हो तो सकता है लेकिन उसका आलाप जैसा मधुर होना भी जरूरी है। कानों और आंखों में कंकड़ की तरह खटकने वाले झूठ, फरेब और मक्कार विशेषणों का आलाप कोई कैसे झेल सकता है यह मेरी समझ से परे है। ऐसे में भड़ास निकलती है वहां गिनाए जा रहे विशेषणों को झूठा साबित करने वाले तथ्यों और तर्कों को पड़ोस के साथ बांटने में। लेकिन ऐसा करते हुए मन में यह आत्मग्लानि भी रहती है कि श्मशान में आकर मुर्दें के बारे में अप्रिय चर्चा करना अच्छी बात नहीं है।
मुझे लगता है कि एक किसी मंच पर, या बैठक में इस बात पर खुली चर्चा होनी चाहिए कि एक सुधारवादी आंदोलन की तरह मंच सुधारो अभियान कैसे चलाया जा सकता है? कैसे ऋण मुक्ति अभियान की तरह झूठ मुक्ति अभियान चल सकता है? कैसे व्यसन मुक्त समाज की तरह विशेषण मुक्त समाज बनाने की मुहिम चलाई जा सकती है। और कैसे मासूम, बेजुबान फूलों पर अत्याचार खत्म किया जा सकता है? मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि मंचों के आर-पार या बैठकों में बहुत से ऐसे लोग आते-जाते हैं जिनके पास बर्बाद करने को इतना वक्त नहीं होता, और न ही झूठ को बर्दाश्त करने की क्षमता होती। ऐसे लोग ही इस बात की पहल करें कि किसी काबिल संपादक की मदद से इन कार्यक्रमों का संपादन कैसे किया जाए और फिर फिजूल को काट-छांटकर बचे कार्यक्रम की शैली को बढ़ावा देने का अभियान चलाया जाए। ऐसे एक सुधारवादी अभियान के बिना देश का समय बर्बाद होना रूकते नहीं दिखता।
कुछ और
कल तक ऊपर का लिखा हुआ लिखकर यह तसल्ली हो गई थी कि हर हफ्ते मेरी वजह से यह पत्रिका लेट होती है क्योंकि मैं भाग-दौड़ के बीच इन दो-तीन पन्नों को लिखने का समय नहीं निकाल पाता, और इस बार यह काम समय पर हो गया। लेकिन आज फिर कुछ खबरों को पढ़कर इसमें कुछ जोडऩे का दिल किया। यह आगे की बात हो सकता है कि पूरी तरह पीछे की बात से जुड़ी हुई न हो।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से इन सात-आठ बरसों में लगातार प्रदेश के इतिहास के कुछ महान लोगों की स्मृतियों को लेकर एक कीर्तन सा चल रहा है। स्मृतियां इतनी संपन्न और सुविधाजनक बनाई जा सकती हैं कि वे जनमान्यताओं से लेकर इतिहास के चुनिंदा तथ्यों तक, कई पसंदीदा बातों पर टिकी हो सकती हैं। आज जब ताजा-ताजा दिवंगत हुए इंसान के लिए स्मृतियों और श्रद्घांजलि के रूप में सर्वविदित असत्य की सुनामी लहरें बहा दी जाती हैं तो फिर इतिहास को लेकर कड़वी बात कोई कैसे कर सकता है। इसलिए रामजन्मभूमि से लेकर रामसेतु तक ईसा मसीह से लेकर घोटुल तक और जिन्ना से लेकर गांधी तक हर किसी के इतिहास को मनमाफिक ढाला जा सकता है। इतिहास जब छांटकर उठाया जाता है तो वह सवाल खड़े नहीं करता, जैसा कि वर्तमान हमेशा ही करता है और भविष्य तो सिर्फ सवाल ही रहता है।
यादों की शहनाईयों की धुन और उनका राग इस कदर लोगों को बांध लेते हैं कि लोग असुविधाजनक वर्तमान को अनदेखा करके, वर्तमान की मांग को अनसुना करके स्मृति-कीर्तन में लगे रह सकते हैं और आने वाले कल के लिए वे इतिहास का उसी तरह से गुणगान करते रह सकते हैं जिस तरह नींव के पत्थरों के बाद दीवारें खड़ी किए बिना कोई सिर्फ छत ढालने की बात करता रहे।
मैं कुछ और साफ-साफ बात करूं तो छत्तीसगढ़ के इतिहास के साहित्यकारों और पत्रकारों की जिंदगी और काम को लेकर उसी तरह का पे्रम यहां पिछले बरसों में चल रहा है जिस तरह का खेलपे्रम खेल के टेलीविजन पर प्रसारण को देखकर जाहिर किया जा सकता है। लेकिन घर के टीवी के सामने बैठे खेल दर्शकों से खेल का जितना भला हो सकता है शायद उतना ही भला छत्तीसगढ़ के स्मृति कीर्तन से यहां के वर्तमान और भविष्य का हो रहा है। आज का वर्तमान सौ-सौ सवाल लेकर खड़ा है। ये तमाम सवाल अगर सौ बरस पहले के किसी महान पत्रकार या साहित्यकार के सामने होते तो क्या वे भी केवल कालिदास-कीर्तन या तुलसीदास-कीर्तन करके खुद महान हो सकते थे, या उनका साहित्य या उनकी पत्रकारिता महान हो सकती थी?
कुछ अधिक कड़वी जुबान में कहूं तो छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व के पहले इन सात-आठ बरसों में स्मृतियां आज की जरूरतों पर, आज की जिम्मेदारियों पर, और भविष्य की चुनौतियों पर कुछ उसी तरह हावी हो गई हैं जिस तरह किसी गरीब के घर पर मृत्यु-भोज की सामाजिक जिम्मेदारी भारी पड़ती है। घर के बच्चों के सालभर के खाने-पीने का सब कुछ एक दिन के सामाजिक डांड में निकल जाता है। किसी तस्वीर से आज की हालत का मुकाबला करें तो राखी के दिन जेलों में पहुंचीं ब्रम्हकुमारियों या लॉयन्स क्लब की महिलाओं की याद आती है जो कैदियों को पहले समारोह पूर्वक राखी बांधते हुए तस्वीरें खींचवाती हैं और दूर-दूर से आईं उन कैदियों की सगी बहनें जेल के अहाते में पेड़ के नीचे अपनी बारी की राह देखती रहती हैं। आज वर्तमान के मुद्दे इसी तरह समारोहों के सभागृह वाले अहाते के पेड़ों तले बैठे रहते हैं और अपने-आपको बुद्घिजीवी, रचनाकार, सरोकार का पैरोकार, समाज का मार्गदर्शक, नीति-निर्धारक, संवेदनशील कहने वाला तबका मंच पर यादों की उस बारात में मस्त रहता है जिसका आज की कड़वी हकीकत से उसी तरह कुछ लेना-देना नहीं है जिस तरह बारातियों का सड़क की बाकी दिक्कतों से कोई लेना-देना नहीं रहता।
यह सोचने की जरूरत है कि इतिहास की ठंडी, सुविधाजनक छाया में बैठकर कब तक आज के समाज का तथाकथित जिम्मेदार तबका वर्तमान को अपना बैनर तानने से रोके रहेगा? क्या यही रूख इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं है कि आज जनता के बीच साहित्यकार, कलाकार, नाटककार और बुद्घिजीवियों के लिए कोई खास सम्मान नहीं रह गया और इन तबकों के कुछ दर्जन या कुछ सौ लोग हर शहर में एक घेरा बनाकर एक-दूसरे की पीठ खुजाते दिखते हैं। क्या भविष्य के इतिहास में किसी युग को इसलिए याद किया जा सकता है कि उस युग ने अपने पिछले युग को महिमामंडित करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी? मूर्ति-पूजा उस दिन महत्वहीन, और शायद गैरजरूरी हो जाती है जिस दिन कुपोषण के शिकार बच्चों की बस्ती में शिवलिंग पर दूध के घड़े पलटे जाते हैं।
कुल जमा मतलब यह कि छत्तीसगढ़ के आज के बहुत कड़वे, बहुत असुविधाजनक मुद्दों को अनदेखा करने वाले इतिहास-कीर्तन से क्या कोई सभागृह खाली बचेगा जिसमें आज के साहित्य, पत्रकारिता, रचनात्मकता, सामाजिक आंदोलन, सामाजिक विसंगतियों, शोषण, भष्टï्राचार, राजनीतिक षडयंत्र, असमानता की यातना भोगने वाले लोग अपनी भी एक छोटी बैठक कर सकें और उस बैठक के लिए कीर्तनियों में से कुछ लोग आ सकें।


-सुनील कुमार
 

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