10 अगस्त 08
कई बरस पहले जब दुनिया में पहली भेड़, डॉली क्लोनिंग से पैदा हुई थी तब विज्ञान कथाएं सच होती लगी थीं। बिना नर और मादा के मेल के सिर्फ मादा के शरीर से ही एक सेल (कोशिका)लेकर क्लोनिंग की तकनीक से प्रयोगशाला में एक एम्ब्रियो तैयार कर लिया जाए और उससे उस मादा को गर्भवती कर दिया जाए तो होने वाला बच्चा पूरी तरह से उस कोशिका वाले इंसान की तरह होगा। इस तकनीक के बारे में पहले कई बार लिखा जा चुका है और दुनिया का विज्ञान और समाज इस बात को लेकर भयभीत भी थे कि अगर कोई तानाशाह क्लोनिंग से अपने ही किस्म की हजारों औलादें बनवा डालेगा तो पता लगेगा कि जॉर्ज बुश के हमशक्ल, लेकिन उम्र में उससे 25-50 बरस छोटे हजारों लोग घूम रहे हैं और घूम-घूमकर सद्दाम हुसैन की हजारों हमशक्ल औलादों को मारने की कोशिश कर रहे हैं। एक तानाशाह और एक महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक का मेल ऐसा कोई भी दिन दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर सकता है। इन दोनों की कोई नैतिकता नहीं होती, विज्ञान एक बेसमझ, बेसरोकार औजार ही बनाता है और तानाशाह का तो कोई सरोकार होता नहीं।
बहुत बरस पहले मैंने क्लोनिंग के खतरों की कल्पना करके लिखा था कि एक दिन ऐसा आ सकता है जब लोग सबसे महान और सबसे सफल लोगों की क्लोनिंग करके वैसी ही औलादें पैदा करने में जुट जाएं। मतलब यह कि आज जिस तरह कोई अरबपति अपनी बेटी की शादी में करोड़ों का दहेज देता है उस तरह कल कोई अरबपति कुछ करोड़ खर्च करके ऐश्वर्या राय के बदन का एक सेल शायद खरीद ले और उससे ऐसी संतान पैदा करवा ले जिसके लिए किसी दहेज को देने की जरूरत भी न पड़े। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो सबसे सफल खिलाडिय़ों की क्लोनिंग करवाकर यह उम्मीद कर सकते हैं कि ओलंपिक में गोल्ड मैडल पाने वाले उनके खिलाडिय़ों के क्लोन आगे भी अपने देशों के लिए गोल्ड मैडल की संभावना बढ़ाते चलेंगे। कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि न्यूटन और आइंस्टीन के क्लोन जब एक साथ एक प्रयोगशाला में काम करेंगे तो विज्ञान कई गुना अधिक रफ्तार से आगे बढ़ेगा। विज्ञान कथाएं जब सच होने लगती हैं तो कल्पना की उड़ान छोटी पडऩे लगती हैं। क्लोनिंग कुछ इसी तरह की नाटकीय और रोमांचक संभावनाओं वाली तकनीक है जिसके चलते हो सकता था कि गांधी और नेहरू के क्लोन अब तक कायम रहते, यह एक और बात है कि इनमें से हो सकता है कोई सांसद खरीदने में लगे रहता और कोई बिकने को शो-केस में खड़ा रहता।
इस मुद्दे पर आज लिखने को दिल इसलिए कर रहा है कि दुनिया में अभी पहली बार पालतू पशुओं की व्यावसायिक क्लोनिंग हुई है। इसके पहले तो वैज्ञानिक जरूरतों के लिए या सरकारी प्रयोग के लिए ऐसा हुआ था लेकिन अभी अमरीका में कैलिफोर्निया में बसीं एक किसान महिला ने अपने कुत्ते के पाँच क्लोन तैयार करवाए, इनकी लागत उसे 50 हजार डॉलर (लगभग 20 लाख रुपए) आई है। उसने यह काम दक्षिण कोरिया की एक प्रयोगशाला में करवाया और वहां उसने राजधानी सियोल में एक प्रेस कांफे्रंस में बहुत खुशी के साथ इसकी घोषणा की। उसका कहना है कि पिट बुल टेरियर नस्ल के उसके कुत्ते, बूगर, के हमशक्ल क्लोन पाना उसके लिए इस दाम पर बहुत सस्ता है। कई बरस पहले वह बूगर को सड़क पर घूमते पाकर एक दूसरे कुत्ते के हमले से बचाकर लाई थी और इस दौरान उस दूसरे कुत्ते के हमले से वह अपना एक हाथ लगभग खो चुकी थी। इस हाथ के ऑपरेशन के बाद बूगर उसके लिए कई तरह के काम करने लगा जिनमें कपड़े निकालकर लाने से लेकर फ्रिज से बोतल निकाला, दरवाजे खोलना और जूते उतारने जैसे काम शामिल थे। उसका कहना है कि वह अपने इस दोस्त को वापिस चाहती थी और जब उसे कैंसर हुआ तो उसने बूगर की चमड़ी के कुछ सेल निकलवाकर सुरक्षित रख लिए थे और सियोल की राष्टï्रीय यूनिवर्सिटी की प्रयोगशाला में इन सेल्स से एम्ब्रियो बनाए जिन्हें अलग-अलग माता कुत्तों में डाला गया और 28 जुलाई को ये बच्चे हुए। कोरियन वैज्ञानिकों का कहना है कि वे इसके पहले कुत्तों के क्लोन बना चुके थे लेकिन वे रिसर्च और सरकारी उपयोग के लिए थे। जैसे कि सरकार के लिए खोजी कुत्ते तैयार करना। इस बार की इस निजी क्लोनिंग की फीस डेढ़ लाख डॉलर से घटाकर एक तिहाई इसलिए की गई क्योंकि जो कंपनी इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहती है उसने प्रचार पाने के लिए यह घाटा उठाया और अब वह पालतू पशुओं की क्लोनिंग की बुकिंग शुरू कर रही है।
कुदरत ने दुनिया को जितनी विविधता वाला बनाया है, क्लोनिंग की तकनीक सैद्घांतिक रूप से उस विविधता को पूरी तरह खत्म करने का खतरा लेकर आई है। इससे सबसे अच्छी नस्ल के पशु-पक्षी, सबसे सफल या होशियार इंसान, सबसे सुंदर, सबसे ऊंचे, सबसे गंठीले लोगों के क्लोन तैयार होने का खतरा बढ़ते चले जाएगा। फिर जो संपन्न और सफल लोग आत्ममुग्ध होंगे वे अपनी संतान के कम सफल या असफल होने का खतरा उठाने के बजाए अपने क्लोन बनवाना अधिक पसंद करेंगे, बच्चे के बच्चे और हमशक्ल होने के साथ-साथ वे क्लोन भी रहेंगे। यह तकनीक इतनी खतरनाक है कि आज दुनिया के तमाम देश मानव-क्लोनिंग के खिलाफ या तो कानून बना चुके हैं या उसके खिलाफ राय जाहिर कर चुके हैं। लेकिन अपनी वैज्ञानिक सफलता के लिए जो लोग रात-दिन लगे रहते हैं और अपनी जिंदगी भर की मेहनत जिन्हें मानव-क्लोनिंग में सफल होते दिखती है वे लोग चुप नहीं बैठेंगे। आज भी चिकित्सा के इस्तेमाल के लिए कुछ देशों में वैज्ञानिकों ने इंसानी कोशिका से एम्ब्रियो तक तो बना लिया है लेकिन उसके आगे कुछ बनाने की बात उन्होंने अभी नहीं मानी है। आज भी दुनिया में इस तकनीक को लेकर जितने नैतिक सवाल उठ रहे हैं उतने सवाल तो कभी भी नहीं उठे थे। फिर जितने किस्म की रोमांचक या भयानक कल्पनाएं इस तकनीक को लेकर हो सकती हैं, उनका पूरा इस्तेमाल विज्ञान कथाओं या भविष्य कथाओं में नहीं हुआ है। भारत चूंकि आज इस तकनीक से दूर है इसलिए यहां पर इसके खतरे मंडराते नहीं दिख रहे हैं। लेकिन यहां के उद्योगपतियों और भ्रष्ट नेताओं में से बहुत से लोग ऐसी कुनबापरस्ती की ओर जा सकते हैं जिसमें उनका आत्ममोह भी पूरा होता है। इंदिरा गांधी के बारे में एक वक्त कहा जाता था कि इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा। क्लोनिंग पर पहले कभी मैंने लिखते समय इसकी कल्पना करते हुए लिखा था कि अगर उस समय क्लोनिंग की तकनीक आ गई होती तो आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी की तरफ से यह नारा कुछ दूसरे किस्म का हो सकता था। तब शायद इसके बारे में कहा जाता- इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मैं।
वे तो चली गईं और उनके बच्चे भी नहीं रहे लेकिन भारत की वंशवादी राजनीति कायम है। आज भी इस चापलूस लोकतंत्र में अगर पार्टी की कुछ बड़ी प्रतिमाओं का क्लोन बनवाने के लिए अरबों रुपए भी खर्च करने पड़े तो उस पार्टी के लोग उसे जुटा लेंगे।
क्या आज कोई-'मेरे बाद मैंÓ के खतरों की कल्पना भारत के धार्मिक, आध्यात्मिक, साम्प्रदायिक और राजनीतिक दायरों में कर सकता है?
मैं तो इस कल्पना से खासा मनोरंजन पाता हूं कि दो हमशक्ल अंबानी भाई जब एक-दूसरे से उलझे होते और दोनों एक ही अंबानी के क्लोन होने के कारण एक से फिंगरप्रिंट वाले भी होते तो क्या होता? जरा सोचकर देखें।
कई बरस पहले जब दुनिया में पहली भेड़, डॉली क्लोनिंग से पैदा हुई थी तब विज्ञान कथाएं सच होती लगी थीं। बिना नर और मादा के मेल के सिर्फ मादा के शरीर से ही एक सेल (कोशिका)लेकर क्लोनिंग की तकनीक से प्रयोगशाला में एक एम्ब्रियो तैयार कर लिया जाए और उससे उस मादा को गर्भवती कर दिया जाए तो होने वाला बच्चा पूरी तरह से उस कोशिका वाले इंसान की तरह होगा। इस तकनीक के बारे में पहले कई बार लिखा जा चुका है और दुनिया का विज्ञान और समाज इस बात को लेकर भयभीत भी थे कि अगर कोई तानाशाह क्लोनिंग से अपने ही किस्म की हजारों औलादें बनवा डालेगा तो पता लगेगा कि जॉर्ज बुश के हमशक्ल, लेकिन उम्र में उससे 25-50 बरस छोटे हजारों लोग घूम रहे हैं और घूम-घूमकर सद्दाम हुसैन की हजारों हमशक्ल औलादों को मारने की कोशिश कर रहे हैं। एक तानाशाह और एक महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक का मेल ऐसा कोई भी दिन दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर सकता है। इन दोनों की कोई नैतिकता नहीं होती, विज्ञान एक बेसमझ, बेसरोकार औजार ही बनाता है और तानाशाह का तो कोई सरोकार होता नहीं।
बहुत बरस पहले मैंने क्लोनिंग के खतरों की कल्पना करके लिखा था कि एक दिन ऐसा आ सकता है जब लोग सबसे महान और सबसे सफल लोगों की क्लोनिंग करके वैसी ही औलादें पैदा करने में जुट जाएं। मतलब यह कि आज जिस तरह कोई अरबपति अपनी बेटी की शादी में करोड़ों का दहेज देता है उस तरह कल कोई अरबपति कुछ करोड़ खर्च करके ऐश्वर्या राय के बदन का एक सेल शायद खरीद ले और उससे ऐसी संतान पैदा करवा ले जिसके लिए किसी दहेज को देने की जरूरत भी न पड़े। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो सबसे सफल खिलाडिय़ों की क्लोनिंग करवाकर यह उम्मीद कर सकते हैं कि ओलंपिक में गोल्ड मैडल पाने वाले उनके खिलाडिय़ों के क्लोन आगे भी अपने देशों के लिए गोल्ड मैडल की संभावना बढ़ाते चलेंगे। कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि न्यूटन और आइंस्टीन के क्लोन जब एक साथ एक प्रयोगशाला में काम करेंगे तो विज्ञान कई गुना अधिक रफ्तार से आगे बढ़ेगा। विज्ञान कथाएं जब सच होने लगती हैं तो कल्पना की उड़ान छोटी पडऩे लगती हैं। क्लोनिंग कुछ इसी तरह की नाटकीय और रोमांचक संभावनाओं वाली तकनीक है जिसके चलते हो सकता था कि गांधी और नेहरू के क्लोन अब तक कायम रहते, यह एक और बात है कि इनमें से हो सकता है कोई सांसद खरीदने में लगे रहता और कोई बिकने को शो-केस में खड़ा रहता।
इस मुद्दे पर आज लिखने को दिल इसलिए कर रहा है कि दुनिया में अभी पहली बार पालतू पशुओं की व्यावसायिक क्लोनिंग हुई है। इसके पहले तो वैज्ञानिक जरूरतों के लिए या सरकारी प्रयोग के लिए ऐसा हुआ था लेकिन अभी अमरीका में कैलिफोर्निया में बसीं एक किसान महिला ने अपने कुत्ते के पाँच क्लोन तैयार करवाए, इनकी लागत उसे 50 हजार डॉलर (लगभग 20 लाख रुपए) आई है। उसने यह काम दक्षिण कोरिया की एक प्रयोगशाला में करवाया और वहां उसने राजधानी सियोल में एक प्रेस कांफे्रंस में बहुत खुशी के साथ इसकी घोषणा की। उसका कहना है कि पिट बुल टेरियर नस्ल के उसके कुत्ते, बूगर, के हमशक्ल क्लोन पाना उसके लिए इस दाम पर बहुत सस्ता है। कई बरस पहले वह बूगर को सड़क पर घूमते पाकर एक दूसरे कुत्ते के हमले से बचाकर लाई थी और इस दौरान उस दूसरे कुत्ते के हमले से वह अपना एक हाथ लगभग खो चुकी थी। इस हाथ के ऑपरेशन के बाद बूगर उसके लिए कई तरह के काम करने लगा जिनमें कपड़े निकालकर लाने से लेकर फ्रिज से बोतल निकाला, दरवाजे खोलना और जूते उतारने जैसे काम शामिल थे। उसका कहना है कि वह अपने इस दोस्त को वापिस चाहती थी और जब उसे कैंसर हुआ तो उसने बूगर की चमड़ी के कुछ सेल निकलवाकर सुरक्षित रख लिए थे और सियोल की राष्टï्रीय यूनिवर्सिटी की प्रयोगशाला में इन सेल्स से एम्ब्रियो बनाए जिन्हें अलग-अलग माता कुत्तों में डाला गया और 28 जुलाई को ये बच्चे हुए। कोरियन वैज्ञानिकों का कहना है कि वे इसके पहले कुत्तों के क्लोन बना चुके थे लेकिन वे रिसर्च और सरकारी उपयोग के लिए थे। जैसे कि सरकार के लिए खोजी कुत्ते तैयार करना। इस बार की इस निजी क्लोनिंग की फीस डेढ़ लाख डॉलर से घटाकर एक तिहाई इसलिए की गई क्योंकि जो कंपनी इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहती है उसने प्रचार पाने के लिए यह घाटा उठाया और अब वह पालतू पशुओं की क्लोनिंग की बुकिंग शुरू कर रही है।
कुदरत ने दुनिया को जितनी विविधता वाला बनाया है, क्लोनिंग की तकनीक सैद्घांतिक रूप से उस विविधता को पूरी तरह खत्म करने का खतरा लेकर आई है। इससे सबसे अच्छी नस्ल के पशु-पक्षी, सबसे सफल या होशियार इंसान, सबसे सुंदर, सबसे ऊंचे, सबसे गंठीले लोगों के क्लोन तैयार होने का खतरा बढ़ते चले जाएगा। फिर जो संपन्न और सफल लोग आत्ममुग्ध होंगे वे अपनी संतान के कम सफल या असफल होने का खतरा उठाने के बजाए अपने क्लोन बनवाना अधिक पसंद करेंगे, बच्चे के बच्चे और हमशक्ल होने के साथ-साथ वे क्लोन भी रहेंगे। यह तकनीक इतनी खतरनाक है कि आज दुनिया के तमाम देश मानव-क्लोनिंग के खिलाफ या तो कानून बना चुके हैं या उसके खिलाफ राय जाहिर कर चुके हैं। लेकिन अपनी वैज्ञानिक सफलता के लिए जो लोग रात-दिन लगे रहते हैं और अपनी जिंदगी भर की मेहनत जिन्हें मानव-क्लोनिंग में सफल होते दिखती है वे लोग चुप नहीं बैठेंगे। आज भी चिकित्सा के इस्तेमाल के लिए कुछ देशों में वैज्ञानिकों ने इंसानी कोशिका से एम्ब्रियो तक तो बना लिया है लेकिन उसके आगे कुछ बनाने की बात उन्होंने अभी नहीं मानी है। आज भी दुनिया में इस तकनीक को लेकर जितने नैतिक सवाल उठ रहे हैं उतने सवाल तो कभी भी नहीं उठे थे। फिर जितने किस्म की रोमांचक या भयानक कल्पनाएं इस तकनीक को लेकर हो सकती हैं, उनका पूरा इस्तेमाल विज्ञान कथाओं या भविष्य कथाओं में नहीं हुआ है। भारत चूंकि आज इस तकनीक से दूर है इसलिए यहां पर इसके खतरे मंडराते नहीं दिख रहे हैं। लेकिन यहां के उद्योगपतियों और भ्रष्ट नेताओं में से बहुत से लोग ऐसी कुनबापरस्ती की ओर जा सकते हैं जिसमें उनका आत्ममोह भी पूरा होता है। इंदिरा गांधी के बारे में एक वक्त कहा जाता था कि इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा। क्लोनिंग पर पहले कभी मैंने लिखते समय इसकी कल्पना करते हुए लिखा था कि अगर उस समय क्लोनिंग की तकनीक आ गई होती तो आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी की तरफ से यह नारा कुछ दूसरे किस्म का हो सकता था। तब शायद इसके बारे में कहा जाता- इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मैं।
वे तो चली गईं और उनके बच्चे भी नहीं रहे लेकिन भारत की वंशवादी राजनीति कायम है। आज भी इस चापलूस लोकतंत्र में अगर पार्टी की कुछ बड़ी प्रतिमाओं का क्लोन बनवाने के लिए अरबों रुपए भी खर्च करने पड़े तो उस पार्टी के लोग उसे जुटा लेंगे।
क्या आज कोई-'मेरे बाद मैंÓ के खतरों की कल्पना भारत के धार्मिक, आध्यात्मिक, साम्प्रदायिक और राजनीतिक दायरों में कर सकता है?
मैं तो इस कल्पना से खासा मनोरंजन पाता हूं कि दो हमशक्ल अंबानी भाई जब एक-दूसरे से उलझे होते और दोनों एक ही अंबानी के क्लोन होने के कारण एक से फिंगरप्रिंट वाले भी होते तो क्या होता? जरा सोचकर देखें।
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