बॉबी जिंदल के बहाने, उनकी-अपनी चार बातें

27 जुलाई 08
अमरीका को उसकी अलोकतांत्रिक आक्रामकता और विस्तारवाद की उसकी नीति के लिए आए दिन कोसने के बावजूद उसकी कुछ खूबियों की चर्चा भी करने को जी चाहता है। ऐसी एक संभावना वहां खड़ी हो रही है राष्टï्रपति चुनाव को लेकर। परंपरागत रूप से राष्टï्रपति पद का प्रत्याशी अपनी पार्टी के साथ मिलकर अपने लिए उपराष्टï्रपति पद का उम्मीदवार छांटता है। और यह माना जाता है कि मतदाताओं और अमरीकी समाज के अलग-अलग तबकों की भावनाओं को ध्यान में रखकर यह जोड़ी बनाई जाती है। भारत के लोकतंत्र में भी पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्टï्रपति, जैसे कई पदों पर मनोनयन या चयन के पहले ऐसे पैमाने ध्यान में रखे जाते हैं। अमरीका में इन दिनों भारतीय मूल के एक नौजवान बॉबी जिंदल का नाम रिपब्लिकन पार्टी की उपराष्टï्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए चल रहा है।
बॉबी जिंदल भारत के पंजाब से अमरीका में जाकर बसे एक व्यापारी के बेटे हैं और अमरीकी संसद से होते हुए वे अब लुईसियाना राज्य के गवर्नर हैं। अमरीकी राज्य के गवर्नर का मतलब भारत के रबर स्टैम्प गवर्नर जैसा नहीं होता, वह राज्य की सरकार का मुखिया होता है और राज्य चलाता है। 37 बरस के बॉबी को अमरीका में तंगख्याल मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक ऐसा नौजवान चेहरा माना जा रहा है जिसे अगर आगे लाया गया तो उससे पार्टी की छवि बदल सकती है। आज अमरीका में इस पार्टी को गोरे बूढ़ों की पार्टी माना जाता है। एक गैर गोरा, एशियाई नस्ल का बिल्कुल नौजवान उम्मीदवार इस पार्टी के आज के राष्टï्रपति पद के प्रत्याशी जॉन मैककेन के लिए मददगार भी साबित हो सकता है। वह विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्टï्रपति पद प्रत्याशी अश्वेत बराक ओबामा से दस बरस छोटा भी है।
भारत की राजनीति को अगर देखें तो मरणासन्न लोग ताबूतनुमा सिंहासनों पर बैठकर भी राज करने को बेताब हैं और जो नई पीढ़ी नई सोच को लेकर, नए ज्ञान से लैस होकर काम करना चाहती है उसे कोई जगह देने को तैयार नहीं है। मुझे अपने बचपन से लेकर अभी तक दिया छाप पर अटल-अडवानी की जोड़ी राम-लक्ष्मण की तरह पेश की हुई याद है। उम्र की आधी सदी गुजर गई लेकिन जनसंघ के सबसे ऊपर के दो लोगों में से एक अडवानी अब तक धनुष लिए मैदान में डटे हैं और रामचंद्र भी वोट डालने संसद के गलियारे तक तो पहुंच ही गए थे। कांगे्रस में इंदिरा गांधी बेमौत नहीं मारी जातीं तो हो सकता है कि आज नब्बे बरस की उम्र में वे प्रधानमंत्री होतीं या जैसा कि कुछ लोगों का अंदाज था कि बेटे को प्रधानमंत्री बनाकर वे राष्ट्रपति बन जाएंगी। वामपंथी दलों में देखें तो सीपीएम में ज्योति बसु को पच्चीस बरस मुख्यमंत्री रहने के बाद भी छुट्टïी नहीं मिल रही थी और हरिकिशन सिंह सुरजीत के बारे में यह लगता था कि ऐतिहासिक भूल आधा दर्जन कर लेने के बाद ही वे बिदा होंगे।
अमरीका की आज की दानवाकार सफलता के बारे में सोचने की जरूरत है। जब यह बात लिखी जा रही है उसी वक्त छत्तीसगढ़ में कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के नाम पर छंटाई चल रही है और इस बार भी यह मुद्दा बन रहा है कि किसी छत्तीगढिय़ा को ही इस पद पर बिठाया जाए। यह बात और भी बहुत से दफ्तरों के लिए नाम तय करते समय उठती है। और सरकार या राजनीति के पद ही नहीं अखबारों में संपादक तय करने के पहले भी काबिलीयत में इसे एक जरूरी हिस्सा माना जाता है कि संपादक पर्याप्त बूढ़ा हो चुका है या नहीं।
तो कोई यह देखे कि मुखिया उसी इलाके का है या नहीं, कोई यह देखे कि वह पर्याप्त बूढ़ा है या नहीं, तो फिर बाकी बातें धरी रह जाती हैं। भारत में एक तरफ तो अमरीका के मुकाबले इस बारे में बहुत विशाल उदारता है कि यहां विदेशी मूल का कोई व्यक्ति भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हो सकता है। दूसरी तरफ अलिखित और अघोषित रिवाज यह चले आ रहा है कि अधेड़ होने के पहले राजनीति में किसी को तभी गंभीरता से लिया जाता है जब उसकी रगों में किसी चुनिंदा राजनीतिक परिवार का खून दौड़ रहा हो। क्या भारत में कोई यह कल्पना कर सकता है कि 37 बरस के एक नौजवान को उपराष्टï्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार बनाकर कोई पार्टी अपना खुद का भविष्य सुधारने का सोच सकती है? और खासकर ऐसा नौजवान जिसके कुनबे से कोई देश में किसी बहुत बड़े पद पर काबिज न रहा हो।
यह बात हम इसलिए कर रहे हैं कि अमरीका ने जिस तरह पूरी दुनिया से वहां पहुंची हर नस्ल के लोगों में से सबसे होनहार और सबसे हुनरमंद लोगों को जिस तरह अपने सिर पर बिठाया और फिर उनकी ताकत से अपने पूरे कद को ऊंचा उठाया, यह सोचने की बात है। हम इस बात पर अमल करने की नसीहत देने की हड़बड़ी नहीं कर रहे लेकिन इसे एक प्रयोग के रूप में तो देखा ही जाना चाहिए कि उसमें बाकी दुनिया के लिए क्या-क्या सबक हैं। अपने पास मौजूद लोगों में से किस-किससे देश के लिए क्या-क्या लिया जा सकता है, इसका ख्याल न करने वाला देश या प्रदेश या समाज कैसे आगे बढ़ सकता है? और यह केवल सरकार की बात नहीं है, किसी निजी दुकान में भी, किसी अखबार में भी जब तक अपने मौजूद लोगों में मौजूद संभावनाओं को नहीं देखा जाएगा तो उसका आगे बढऩा मुश्किल ही रहता है।
अमरीका जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर देश में उपराष्टï्रपति पद का मतलब चार या आठ बरस बाद राष्टï्रपति पद का उम्मीदवार बनना भी होता है। वहां राष्टï्रपति दो बार से अधिक उस पद पर नहीं रह सकता। आज रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद प्रत्याशी को देखें तो जॉन मैककेन की उम्र (72 बरस) इतनी हो चुकी है कि उनसे जीत के बाद भी राष्टï्रपति के एक कार्यकाल से अधिक की उम्मीद कम ही लोग करेंगे। बॉबी जिंदल अगर उपराष्टï्रपति बनते हैं तो उस वक्त वे 41 या 42 बरस के होंगे और कोई ऐसी स्थिति बनती है कि वे राष्टï्रपति बनें तो 50 बरस के होने तक वे दो बार कार्यकाल पूरा करके रिटायर भी हो चुके होंगे।
भारत के राजनीतिक समाज को यह भी सोचना होगा कि अगर इस देश में लोकतंत्र का नेतृत्व हमेशा ही बूढ़ों से लदा हुआ रहेगा तो वह हमेशा ही भविष्य की सोच से 25-50 बरस पीछे भी चलता रहेगा। हर नई पीढ़ी के पास पुरानी पीढ़ी के अनुभव से सीखने का तो काफी कुछ होता है, उसके पास आने वाले दिनों को लेकर बूढ़ों के मुकाबले 25-50 बरस आगे तक की फिक्र और सोच भी रहती है। हिन्दुस्तान में एक दिक्कत यह लगती है कि अनुभव को ही भविष्य मान लेने का दुराग्रह करते बूढ़ी पीढ़ी आखिरी सांस तक सत्ता की आस में लगी रहती है, मानो नींव के पत्थर यह खुशफहमी पाल बैठे हैं कि वे ही छत भी रहेंगे और छत के ऊपर की टंकी भी।
हम एक ही पार्टी और एक ही कुनबे की बात करें तो यह बात साफ है कि कम्प्यूटर और कम्युनिकेशन को जो महत्व राजीव गांधी ने दिया था, और जिसकी वजह से देश में आज एक क्षेत्र में इतनी अधिक तरक्की हो सकी, वह महत्व इंदिरा गांधी नहीं दे सकती थीं। यह हर पीढ़ी के साथ जुड़ी हुई एक दिक्कत है।
लोगों को कुदरत से बहुत कुछ सीखने की जरूरत होती है। पतझड़ में पेड़ पत्तों को गिरा देता है ताकि नए पत्ते के निकलने की गुंजाइश बन सके। फूल तनों की तरह स्थाई नहीं होते और खुद झड़कर वे अपने बीज के आगे बढऩे का रास्ता खोलते हैं। अगर फूल अपनी ही खूबसूरती पर बदगुमां होकर झडऩे से ही इंकार कर देते तो कुदरत ही आगे नहीं बढ़ती। हिन्दुस्तान की लीडरशिप को राजनीति, समाज, व्यापार और बाकी दायरों में भी नई पीढ़ी के लिए जगह बनानी होगी, आज एक बड़ी दिक्कत यह है कि जब तक लोगों की अपनी सांस चलती रहती है तब तक वे नई पीढ़ी की जरूरत महसूस नहीं करते। भारत के लोग रिटायर होना भी सीखें तो शायद नई कोंपलों के साथ पेड़-पौधे अधिक विकसित हो सकेंगे। और आखिरी नसीहत यह कि किसी भी जगह बाहरी से परहेज करके स्थानीय प्रतिभाएं आगे नहीं बढ़ सकतीं।

-सुनील कुमार
(कवर पेज पर बॉबी जिंदल को महान क्रांतिकारी चे गुएरा की तरह दिखाते हुए टी-शर्ट पहनी एक युवती।)

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