24 अगस्त 07
कई दिनों बाद एक करीबी परिचित से मुलाकात हुई जो पिछले दिनों नौ दिन तक पूरी धार्मिक गंभीरता से एक योग शिविर में शामिल रहे इसलिए उनसे बात-मुलाकात काफी दिनों बाद हो पाई और वे इस शिविर के फायदों से लबालब भरे हुए थे। वे एक आस्थावान सज्जन व्यक्ति हैं और मैं एक आस्थाहीन हूं, इसलिए हमारी बातचीत कई बार केवल मेरी जानकारी बढऩे तक सीमित रह जाती है, मैं उनकी बातों का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। लेकिन आस्था से परे की कुछ साधारण बातें इस बार मुझे उनसे ऐसी सुनने मिलीं कि जो तर्कों की कसौटी पर भी, मनोवैज्ञानिक आधार पर भी मुझे फायदे की लगीं।
इस योग शिविर में आए हुए एक व्यक्ति जो धार्मिक या आध्यात्मिक या यौगिक बातों को सिखा पाते हैं उन्होंने कुछ छोटी-छोटी नसीहतें वहां गए लोगों को दीं। इनमें से एक तो यह थी कि लोगों को पूरे समय सकारात्मक बातें सोचनी चाहिए। मिसाल यह कि कोई बीमार अगर पूरे समय अपनी बीमारी की बात ही सोचता रहे तो शायद उसकी बीमारी बढ़ती चलेगी। दूसरी तरफ अगर वह यह सोचता रहे कि उसकी बीमारी कम हो रही है तो वह ठीक होने की तरफ बढ़ते चलेगा। यह लोगों के आत्मबल, आत्मविश्वास पर आधारित एक स्वचिकित्सा भी हो सकती है और मनोविज्ञान तो ऐसे फायदे गिनाता ही है। दूसरी नसीहत इस शिविर से वे लेकर आए थे मन में लोगों के खिलाफ गांठ बांधकर न रखने की। उन्हें वहां पर कहा गया कि जिन लोगों के प्रति मन में नाराजगी या कटुता है उसे निकालने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि यह धीरे-धीरे इक_ïा होकर बड़ी गठरी बन जाती है और उसका बोझ पूरे समय उसी इंसान पर रहता है।
इस तरह की कुछ और बातें भी थीं जो कि उस संन्यासी या योगी के सीधे संपर्क में आए बिना भी शिविर से होकर लौटे इन सज्जन के मार्फत मैं सुन रहा था और समझ रहा था। लेकिन इसके साथ-साथ रोज की जिंदगी में होने वाली कुछ बातें भी मन में उमड़-घुमड़ रही थीं।
होता यह है कि किसी किस्म की नाराजगी या कडुवाहट को भुलाने की तमाम कोशिशें बार-बार नाकामयाब होने के करीब पहुंच जाती हैं जब आपसे मिलने वाले लोग अपनी हमदर्दी जाहिर करने के लिए अकसर इस कोशिश पर उतारू हो जाते हैं कि आपको आपका दर्द याद दिलाएं। आपने कोशिश करके अगर अपने दर्द को भुलाने में सफलता पा ली है तो भी लोग आकर पहले आपके उन सोए पड़े जख्मों को कुरेदते हैं और फिर दर्द पर्याप्त उठ जाने पर अपना लाया मरहम लगाकर आपके करीब आते हैं या आपसे घरोबा साबित करते हैं। मैं यह भी नहीं कहता कि इनमें से हर कोई किसी खास मकसद से ऐसा करता है। हो सकता है कि बहुत से लोग इसलिए ऐसी हमदर्दी को जरूरी समझते हैं कि ऐसा जाहिर न करना सामाजिक शिष्टïाचार के खिलाफ लगेगा। लेकिन आए दिन जब ऐसा शिष्टïाचार बरस-दर-बरस जारी ही रहता है तो मामला गड़बड़ाता है।
मेरे पास आने वाले या कहीं मुझसे मुलाकात के दौरान जब कुछ लोग मेरे कुछ ऐसे जख्मों को कुरेदकर या बिना कुरेदे उन पर अपनी डिब्बी का मरहम लगाने की कोशिश करते हैं, जिन जख्मों से मैं आजाद हो चुका हूं तो हाथ जोड़कर उन्हें मैं कहता हूं कि मैं इस बारे में किसी बात को न सुनना चाहता, न इस बारे में मेरे पास कहने को कुछ है और न ही मैं इस चर्चा में मजा पाता। ऐसा सुनकर कुछ लोग बहुत निराश होते हैं क्योंकि उनका मरहम इस्तेमाल नहीं हो पाया, कुछ लोग बात को तुरंत समझ जाते हैं कि इस बारे में अधिक चर्चा बातचीत को किसी किनारे नहीं ले जा पाएगी और कुछ लोग जो मेरे हिसाब से अधिक समझदार हैं वे अप्रिय चर्चाओं से बचे ही रहते हैं।
मेरा यह मानना है कि पटरी पर पड़ी अपने बीते दिनों की लाशों के करीब रोते बैठने से कोई भी इंसान किसी मंजिल पर नहीं पहुंचता। बीते दिन ही क्यों अपने घर के बुजुर्ग की मौत के बाद भी किसी की दुनिया नहीं रूकती और लोग तेरह दिन पूरे होते न होते इस गम से उबरकर आगे बढऩे की सोचने लगते हैं। व्यापारी तबके से कुछ और अधिक सीखने की जरूरत लगती है जिनमें मौत के बाद दूसरे दिन उठावना करके तीसरे दिन से काम-धंधा शुरू कर दिया जाता है। लेकिन जब कोई बरसों तक आपको आपके बीते दिनों की उस लाश की तस्वीर दिखा-दिखाकर दुखी करे ताकि आपके आंसू बहें और उसका रूमाल काम का साबित हो, तब इन लोगों को कुछ रूखी जुबान में भी समझाना पड़ता है।
मेरे एक करीबी जब बरसों बाद भी इस हरकत से बाज नहीं आए और मेरी रूखी बातें भी उनके उत्साह को सुखा नहीं पाईं तो फिर मैंने उनसे एक दिन कहा कि संजय और गीता चोपड़ा के मां-बाप से हमदर्दी जाहिर करने के लिए अगर इतने बरस बाद भी कोई जाकर रंगा-बिल्ला को कोसेगा और गालियां देगा तो उससे रंगा-बिल्ला का कुछ नहीं बिगड़ेगा, अगर कुछ बिड़ेगा तो वह स्वर्गीय संजय और गीता चोपड़ा के मां-बाप का दिन बिगड़ेगा और मन बिगड़ेगा। मैंने उसने साफ-साफ यह बात भी कही कि अगर कोई शाकाहारी व्यक्ति है तो उसकी मेहमाननवाजी करने के फेर में उसे महंगे-महंगे मांसाहारी पकवान परोसने से कोई फायदा नहीं होता। मेरी इस बात को उनको शुरू में ही समझ लेना था कि मैं शाकाहारी हूं, या रंगा-बिल्ला की यादों की गठरी को मैं ढोना नहीं चाहता।
इस बात को आज यहां लिखना इसलिए सूझा कि कड़वी यादों को लेकर जो नसीहत एक योग शिविर में यहां लोगों को दी गई, मैं उनसे वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से सहमत रहते आया हूं। किसी किस्म के करिश्मे और आलौकिक शक्तियों पर मेरी कोई आस्था नहीं रही है लेकिन किसी के जख्मों के निशान को कुरेदकर फिर वहां के लिए मरहम बेचने के खिलाफ मैं हमेशा से रहते आया हूं। यह बात इसलिए लिखना ठीक और जरूरी लग रहा है कि मेरी तरह के बहुत से लोग होंगे जो अपने जख्मों को या तो भुला चुके होंगे या भुलाने की कोशिश में होंगे और हमदर्द होंगे कि उन्हें याद दिलाने पर उतारू हों। हर समझदार इंसान को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमदर्दी कभी-कभी ऐसे लोगों पर भारी भी पड़ती है जो अपने दर्द से उबर चुके हैं।
भारत में जिस तरह लोग किसी से पहली मुलाकात में ही उसके पारिवारिक जीवन के बारे में पूछने पर उतारू हो जाते हैं, दूसरी मुलाकात में उसकी कमाई या तनख्वाह तक पहुंचते हैं, उसी तरह यहां के अधिकांश प्रदेशों या संस्कृतियों के लोग आनन-फानन दूसरों के अंदरूनी मामलों तक पहुंच जाते हैं। फिर जिस सिलसिले में यह बात चल रही है उसमें दुश्मन के दुश्मन के अपने-आपको आपका स्वाभाविक दोस्त मान लेते हैं। अगर आप मन में दुश्मनी न भी रखना चाहें तो भी ऐसा चाहने वाले लोग कम नहीं रहते जो चाहें कि आप अपने भूतपूर्व दुश्मन को वर्तमान दुश्मन और भावी दुश्मन बनाए रखें क्योंकि इसके बिना वे (दुश्मन के दुश्मन) कैसे आपके दोस्त हो पाएंगे? यह पूरा सिलसिला बहुत नुकसानदेह है और धर्म, आध्यात्म, योग, जिस किसी आधार पर भी कटुता को भुलाने की बात होती हो वह नसीहत सही है।
- सुनील कुमार
कई दिनों बाद एक करीबी परिचित से मुलाकात हुई जो पिछले दिनों नौ दिन तक पूरी धार्मिक गंभीरता से एक योग शिविर में शामिल रहे इसलिए उनसे बात-मुलाकात काफी दिनों बाद हो पाई और वे इस शिविर के फायदों से लबालब भरे हुए थे। वे एक आस्थावान सज्जन व्यक्ति हैं और मैं एक आस्थाहीन हूं, इसलिए हमारी बातचीत कई बार केवल मेरी जानकारी बढऩे तक सीमित रह जाती है, मैं उनकी बातों का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। लेकिन आस्था से परे की कुछ साधारण बातें इस बार मुझे उनसे ऐसी सुनने मिलीं कि जो तर्कों की कसौटी पर भी, मनोवैज्ञानिक आधार पर भी मुझे फायदे की लगीं।
इस योग शिविर में आए हुए एक व्यक्ति जो धार्मिक या आध्यात्मिक या यौगिक बातों को सिखा पाते हैं उन्होंने कुछ छोटी-छोटी नसीहतें वहां गए लोगों को दीं। इनमें से एक तो यह थी कि लोगों को पूरे समय सकारात्मक बातें सोचनी चाहिए। मिसाल यह कि कोई बीमार अगर पूरे समय अपनी बीमारी की बात ही सोचता रहे तो शायद उसकी बीमारी बढ़ती चलेगी। दूसरी तरफ अगर वह यह सोचता रहे कि उसकी बीमारी कम हो रही है तो वह ठीक होने की तरफ बढ़ते चलेगा। यह लोगों के आत्मबल, आत्मविश्वास पर आधारित एक स्वचिकित्सा भी हो सकती है और मनोविज्ञान तो ऐसे फायदे गिनाता ही है। दूसरी नसीहत इस शिविर से वे लेकर आए थे मन में लोगों के खिलाफ गांठ बांधकर न रखने की। उन्हें वहां पर कहा गया कि जिन लोगों के प्रति मन में नाराजगी या कटुता है उसे निकालने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि यह धीरे-धीरे इक_ïा होकर बड़ी गठरी बन जाती है और उसका बोझ पूरे समय उसी इंसान पर रहता है।
इस तरह की कुछ और बातें भी थीं जो कि उस संन्यासी या योगी के सीधे संपर्क में आए बिना भी शिविर से होकर लौटे इन सज्जन के मार्फत मैं सुन रहा था और समझ रहा था। लेकिन इसके साथ-साथ रोज की जिंदगी में होने वाली कुछ बातें भी मन में उमड़-घुमड़ रही थीं।
होता यह है कि किसी किस्म की नाराजगी या कडुवाहट को भुलाने की तमाम कोशिशें बार-बार नाकामयाब होने के करीब पहुंच जाती हैं जब आपसे मिलने वाले लोग अपनी हमदर्दी जाहिर करने के लिए अकसर इस कोशिश पर उतारू हो जाते हैं कि आपको आपका दर्द याद दिलाएं। आपने कोशिश करके अगर अपने दर्द को भुलाने में सफलता पा ली है तो भी लोग आकर पहले आपके उन सोए पड़े जख्मों को कुरेदते हैं और फिर दर्द पर्याप्त उठ जाने पर अपना लाया मरहम लगाकर आपके करीब आते हैं या आपसे घरोबा साबित करते हैं। मैं यह भी नहीं कहता कि इनमें से हर कोई किसी खास मकसद से ऐसा करता है। हो सकता है कि बहुत से लोग इसलिए ऐसी हमदर्दी को जरूरी समझते हैं कि ऐसा जाहिर न करना सामाजिक शिष्टïाचार के खिलाफ लगेगा। लेकिन आए दिन जब ऐसा शिष्टïाचार बरस-दर-बरस जारी ही रहता है तो मामला गड़बड़ाता है।
मेरे पास आने वाले या कहीं मुझसे मुलाकात के दौरान जब कुछ लोग मेरे कुछ ऐसे जख्मों को कुरेदकर या बिना कुरेदे उन पर अपनी डिब्बी का मरहम लगाने की कोशिश करते हैं, जिन जख्मों से मैं आजाद हो चुका हूं तो हाथ जोड़कर उन्हें मैं कहता हूं कि मैं इस बारे में किसी बात को न सुनना चाहता, न इस बारे में मेरे पास कहने को कुछ है और न ही मैं इस चर्चा में मजा पाता। ऐसा सुनकर कुछ लोग बहुत निराश होते हैं क्योंकि उनका मरहम इस्तेमाल नहीं हो पाया, कुछ लोग बात को तुरंत समझ जाते हैं कि इस बारे में अधिक चर्चा बातचीत को किसी किनारे नहीं ले जा पाएगी और कुछ लोग जो मेरे हिसाब से अधिक समझदार हैं वे अप्रिय चर्चाओं से बचे ही रहते हैं।
मेरा यह मानना है कि पटरी पर पड़ी अपने बीते दिनों की लाशों के करीब रोते बैठने से कोई भी इंसान किसी मंजिल पर नहीं पहुंचता। बीते दिन ही क्यों अपने घर के बुजुर्ग की मौत के बाद भी किसी की दुनिया नहीं रूकती और लोग तेरह दिन पूरे होते न होते इस गम से उबरकर आगे बढऩे की सोचने लगते हैं। व्यापारी तबके से कुछ और अधिक सीखने की जरूरत लगती है जिनमें मौत के बाद दूसरे दिन उठावना करके तीसरे दिन से काम-धंधा शुरू कर दिया जाता है। लेकिन जब कोई बरसों तक आपको आपके बीते दिनों की उस लाश की तस्वीर दिखा-दिखाकर दुखी करे ताकि आपके आंसू बहें और उसका रूमाल काम का साबित हो, तब इन लोगों को कुछ रूखी जुबान में भी समझाना पड़ता है।
मेरे एक करीबी जब बरसों बाद भी इस हरकत से बाज नहीं आए और मेरी रूखी बातें भी उनके उत्साह को सुखा नहीं पाईं तो फिर मैंने उनसे एक दिन कहा कि संजय और गीता चोपड़ा के मां-बाप से हमदर्दी जाहिर करने के लिए अगर इतने बरस बाद भी कोई जाकर रंगा-बिल्ला को कोसेगा और गालियां देगा तो उससे रंगा-बिल्ला का कुछ नहीं बिगड़ेगा, अगर कुछ बिड़ेगा तो वह स्वर्गीय संजय और गीता चोपड़ा के मां-बाप का दिन बिगड़ेगा और मन बिगड़ेगा। मैंने उसने साफ-साफ यह बात भी कही कि अगर कोई शाकाहारी व्यक्ति है तो उसकी मेहमाननवाजी करने के फेर में उसे महंगे-महंगे मांसाहारी पकवान परोसने से कोई फायदा नहीं होता। मेरी इस बात को उनको शुरू में ही समझ लेना था कि मैं शाकाहारी हूं, या रंगा-बिल्ला की यादों की गठरी को मैं ढोना नहीं चाहता।
इस बात को आज यहां लिखना इसलिए सूझा कि कड़वी यादों को लेकर जो नसीहत एक योग शिविर में यहां लोगों को दी गई, मैं उनसे वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से सहमत रहते आया हूं। किसी किस्म के करिश्मे और आलौकिक शक्तियों पर मेरी कोई आस्था नहीं रही है लेकिन किसी के जख्मों के निशान को कुरेदकर फिर वहां के लिए मरहम बेचने के खिलाफ मैं हमेशा से रहते आया हूं। यह बात इसलिए लिखना ठीक और जरूरी लग रहा है कि मेरी तरह के बहुत से लोग होंगे जो अपने जख्मों को या तो भुला चुके होंगे या भुलाने की कोशिश में होंगे और हमदर्द होंगे कि उन्हें याद दिलाने पर उतारू हों। हर समझदार इंसान को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमदर्दी कभी-कभी ऐसे लोगों पर भारी भी पड़ती है जो अपने दर्द से उबर चुके हैं।
भारत में जिस तरह लोग किसी से पहली मुलाकात में ही उसके पारिवारिक जीवन के बारे में पूछने पर उतारू हो जाते हैं, दूसरी मुलाकात में उसकी कमाई या तनख्वाह तक पहुंचते हैं, उसी तरह यहां के अधिकांश प्रदेशों या संस्कृतियों के लोग आनन-फानन दूसरों के अंदरूनी मामलों तक पहुंच जाते हैं। फिर जिस सिलसिले में यह बात चल रही है उसमें दुश्मन के दुश्मन के अपने-आपको आपका स्वाभाविक दोस्त मान लेते हैं। अगर आप मन में दुश्मनी न भी रखना चाहें तो भी ऐसा चाहने वाले लोग कम नहीं रहते जो चाहें कि आप अपने भूतपूर्व दुश्मन को वर्तमान दुश्मन और भावी दुश्मन बनाए रखें क्योंकि इसके बिना वे (दुश्मन के दुश्मन) कैसे आपके दोस्त हो पाएंगे? यह पूरा सिलसिला बहुत नुकसानदेह है और धर्म, आध्यात्म, योग, जिस किसी आधार पर भी कटुता को भुलाने की बात होती हो वह नसीहत सही है।
- सुनील कुमार
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