अधिक इंसानों का अधिक भला

20 जुलाई 08
खेल के बारे में मेरी जानकारी नहीं के बराबर रहती है। न कभी कुछ खेला और न अधिक कुछ देखा। ऐसे में इस हफ्ते खेल पर लिखना कुछ दुस्साहस का काम है। लेकिन खेल जिस तरफ बढ़ रहे हैं, जिस तरह बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए यह लगता है कि क्या यह इस धरती के खेल हैं या खिलाडिय़ों के बीच के खेल हैं। मामला कुछ इस तरह का है जैसा कि कुछ बहुत ही जटिल, कठिन, क्लिष्टï या अमूर्त किस्म का लिखने वाले नामी-गिरामी लेखकों के बारे में कहा जाता है कि वे कवियों के कवि हैं या लेखकों के लेखक हैं। मतलब यह कि वे आम लोगों के पढऩे के लायक नहीं रहते। इसी तरह इन दिनों खेल ऐसे होते चले जा रहे हैं कि उन्हें केवल पेशेवर खिलाड़ी खेल सकते हैं और बाकी लोग उन्हें केवल देख सकते हैं।
जिस तरह समाज में साक्षर और निरक्षर के बीच एक गहरी खाई रहती है, जिस तरह कम्प्यूटर सहित और कम्प्यूटर रहित समाज के बीच कभी न पटने वाला जो फासला रहता है उसी तरह शौकिया खिलाडिय़ों और पेशेवर खिलाडिय़ों के बीच एक चौड़ी खाई दिखाई पड़ती है। खेल मानो खिलाडिय़ों के लिए रह गए हैं या फिर रह गए हैं खेल संघों की राजनीति करने वालों के लिए, या फिर टेलीविजन कंपनियों के लिए, या फिर इश्तहार देने वालों के लिए। इन सभी की प्राथमिकताओं को देखें तो उनमें कहीं भी आम खिलाडिय़ों की जगह नहीं है। किसी को भी खेल में आगे बढ़ाना इनकी सोच से बाहर है और जब कोई आसमान पर पहुंच जाता है तब उसे चमकाकर सितारा बनाने के लिए बहुत से बड़े लोग लग जाते हैं।
कुल मिलाकर बात यह कि गरीब देश, गरीब प्रदेश, गरीब स्कूल या कॉलेज, गरीब परिवार के बच्चों के लिए किसी खेल में आगे बढऩा खासा मुश्किल रहता है। गिनाने के लिए इरफान पठान जैसे कुछ उदाहरण जरूर मिल जाएंगे जिनमें गरीबी से उठकर कोई खिलाड़ी आसमान तक पहुंचा। लेकिन ऐसी मिसालें कम ही मिलेंगीं, अधिक मामले ऐसे मिलेंगे जिनमें दुनिया की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को इन खेलों तक पहुंचने का मौका उसी तरह नहीं मिलता जिस तरह गांव की किसी गरीब खूबसूरत लड़की को किसी सौंदर्य स्पर्धा में जाने का मौका नहीं मिलता। लेकिन इसके बाद भी जो लड़कियां सौंदर्य स्पर्धा तक पहुंच पाती हैं उन्हीं में से लड़की अपने देश या दुनिया की सबसे सुंदर लड़की करार दे दी जाती है।
खेलों के बारे में यह बात बड़ी अजीब लगती है कि आज भारी तकनीक और बहुत महंगी ट्रेनिंग से ही कोई अंतरराष्टï्रीय मुकाबले तक पहुंच सकता है। यह खर्च और यह सहूलियत कितने लोगों को मिल पाती है? खासकर भारत जैसे देश में, जहां प्रदेश से लेकर देश तक खेल संघों में बैठे हुए मगरमच्छ मछलियों के हक का सारा दाना खा लेते हैं।
फिर एक बड़ी अजीब सी बात यह है कि अब किसी खेल में ऊंचाई पर पहुंचने वाले खिलाड़ी के पास चौबीसों घंटे बारहों महीने लगातार खेलने या तैयारी करने का ही विकल्प बचता है। मतलब यह कि खेल अब इंसानों के लिए नहीं, खिलाडिय़ों के लिए रह गए हैं और उन खिलाडिय़ों के लिए खेलने के अलावा और कोई काम नहीं रहना चाहिए। यह कमोबेश उस तरह की हालत लगती है जिसमें अगर कोई इंसान चौबीसों घंटे और पूरी जिंदगी अगर केवल खेल में न लगा सके तो खेल के आसमान पर उसकी कोई जगह नहीं है। अगर खेल से परे सोचें तो कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि पढ़ाई के आसमान पर भी चौबीसों घंटे पढ़ाई में लगाने वाले से परे किसी के लिए कोई जगह नहीं है। यही बात हमारे जैसे अखबारनवीसी के धंधे में लगे लोगों के लिए कही जा सकती है कि चौबीसों घंटे अगर यही काम न सूझें तो इस धंधे में आगे बढऩे की गुंजाइश कम है। लेकिन खेल तो एक ऐसा काम है जिसके साथ खेल भावना के जुड़े होने की बात कही जाती है। वैसी बात तो किसी और काम के लिए नहीं कही जाती। जैसे कि डॉक्टरी के अलावा किसी और पेशे को एक पवित्र पेशा नहीं कहा जाता। किसी पत्रकार से कोई यह उम्मीद नहीं करता कि वह खेल भावना से काम करेगा। और पत्रकार भावना तो कुछ होती ही नहीं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अपने किस्म का एक अकेला दायरा जो खेलों का था वह अब पेशेवर होते-होते इतना अधिक पेशेवर हो गया है कि बाकी इंसान दूर से देखकर ताली ही बजा सकते हैं।
इस बहुत ही महीन दिक्कत के बारे में लिखने की एक वजह यह है कि भारत जैसे सौ करोड़ के देश से निकलकर जब लोग ओलंपिक में जाते हैं और बोरियों में भरकर निराशा, हताशा और असफलता वापिस लाते हैं तो यह बात लगती है कि सितारों से नीचे जहां और भी है, और उसकी कोई कदर हिन्दुस्तान में नहीं है। देश का सारा फोकस गिने-चुने खेलों के गिने-चुने दायरों में थोड़े से खिलाडिय़ों पर बना हुआ है। आसमान के स्तर पर पहुंच चुके इन सितारा खिलाडिय़ों से खेल संघों और बाकी तमाम दुकानदारों को उसी तरह का फायदा हो रहा है जिस तरह का फायदा किसी अच्छे भले चलते कारखाने से कारखानेदार को होता है या किसी बेशकीमती खदान से खुदाई करने वाले को होता है। इसलिए नीचे के तमाम दायरों से अपने-आप निकलकर जो भी आ जाए उनमें से बेहतर लोगों को छांटकर उन पर पूरी मेहनत करने और उनसे पूरी कमाई करने का माहौल ही रह गया है। लेकिन इस कारखाने या खदान की कमाई से स्कूल-कॉलेज के स्तर पर खर्च करके नए होनहारों को ढूंढा जाए, उन्हें बढ़ाया जाए ऐसा भारत जैसे देश में नहीं दिखता।
क्रिकेट जैसे खेल में सैकड़ों-हजारों करोड़ की चर्चाओं के बीच जिस तरह के राजसी ठाठ-बाट तमाम पदाधिकारियों को भोगते देखा जाता है वह इस मैदानविहीन, बॉल और बल्लाविहीन, जूता और ड्रेसविहीन देश में बहुत ही अश्लील और हिंसक अपराध लगता है। लेकिन आज इस देश में मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री के पद के दावेदार भी क्रिकेट की दुकान के गल्ले पर बैठने के लिए मारामारी करते दिखते हैं। लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में भी कहीं ओलंपिक की तैयारी में लगे साइकिल चालक के लिए कोई कंपनी करोड़ों रुपए की साइकिल बना रही है तो कोई दूसरी कंपनी किसी खिलाड़ी के लिए कपड़े तैयार करने में दुनिया के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर लगा रही है। ऐसे में पूरी बाजार व्यवस्था की दिलचस्पी गिने-चुने सितारा खिलाडिय़ों के एकाधिकार में उसी तरह की रहती है जिस तरह मुंबई के फिल्म जगत में संघर्ष कर रहीं हजारों लड़कियों के बीच पूरा उद्योग दर्जनभर से भी कम लड़कियों को आसमान पर जगह देना चाहता है।
यह पूरा सिलसिला ऐसा अमानवीय हो गया है कि अब खेल आम इंसानों की जिंदगी से बाहर निकल गए हैं और खेल खेलना अब पूरे वक्त का एक धंधा होकर रह गया है। मगरमच्छों से भरे तालाबों में नई मछलियों के लिए जगह कम ही खेलों में, कम ही जगह निकल सकती है। ऐसे में अभी जब फ्रांस में साइकिल का एक लंबा मुकाबला चल रहा है तब कुछ लोगों ने पेशेवर खेलों से परे बिना मुकाबले वाला एक माहौल बनाने की राय सामने रखी है जिसमें साधारण जूते-कपड़ों और साधारण साइकिल के साथ ही लोग मेहनत कर सकें, बिना किसी महंगी ट्रेनिंग के और बिना अपना दूसरा काम-धंधा बंद किए हुए। शायद सितारों की चकाचौंध के बिना, बिना मुकाबलों और इश्तहारबाजी वाले ऐसे खेल शायद इंसानों का अधिक भला कर पाएं, अधिक इंसानों का अधिक भला।

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