3 जुलाई 08
दुनिया ने अभी चीन को हाथीदांत खरीदने की छूट दी है और इसे लेकर दुनिया के पर्यावरणवादी विरोध में उतर आए हैं। जेनेवा में संयुक्त राष्टï्रसंघ की एक बैठक में कुछ अफ्रीकी देशों ने इसका विरोध किया था लेकिन ब्रिटेन जैसे कुछ देशों ने चीन को हाथीदांत खरीदने की इजाजत दी। यह खरीदी अफ्रीका के चार देशों, दक्षिण अफ्रीका, बोत्सवाना, नामीबिया और जिम्बाब्वे से की जाएगी। अफ्रीका में हर बरस बीस हजार से अधिक हाथियों को गैरकानूनी तरीके से मार डाला जाता है। लेकिन वहां पर हाथियों की बड़ी आबादी होने के कारण हाथीदांत कंकालों से भी निकलता है और अगर उसे दुनिया में बेचने की छूट ही न रहे तो अफ्रीका की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए संयुक्त राष्टï्र की एक कमेटी ऐसी परिस्थितियों की जांच करके कुछ देशों को यह छूट देती है कि वे अफ्रीका से हाथीदांत आयात कर सकें ताकि हाथीदांत पर कारीगरी से कलाकृतियां भी बन सके और अफ्रीकी अर्थव्यवस्था को मदद भी मिले।
इस धंधे के बारे में भारत में बहुत अधिक जानकारी तो नहीं है लेकिन एक बहस पूरी दुनिया में चलती ही रहती है कि वन्य प्राणियों को लेकर क्या एक ही नीति सभी देशों के लिए कारगर हो सकती है? अभी दुनिया के अलग-अलग देशों में कुछ-कुछ जानवरों का चुनिंदा शिकार कानूनी दर्जा पाए हुए है। जहां पर कुछ जानवरों की आबादी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि वे इंसान के लिए खतरा बनने लगते हैं तो उन्हें एक सीमित संख्या में शिकार से मारा जाता है। दरअसल जंगली जानवरों को बचाने की एक जरूरत इसलिए भी पड़ती है कि जंगल कम होने के साथ-साथ कुछ नस्लें खत्म होने की कगार पर हैं और उनके साथ कुदरत का एक पहलू भी खत्म हो जाएगा। लेकिन अफ्रीका जैसे कई देश ऐसे हैं जहां पर जंगल बहुत अधिक हैं और जंगली जानवर भी। ऐसे में वहां जानवरों के सींग, चमड़े, और दांतों से बने हुए कई तरह के सामान बनाए और बेचे जाते हैं और इनको कानूनी मंजूरी भी मिली हुई है।
हम भारत के हिसाब से देखें तो यहां बहुत रफ्तार से जंगल कट रहे हैं, शहर फैल रहे हैं और कारखाने लगते जा रहे हैं। जंगलों के बीच पानी घटते जा रहा है और जानवरों का बहुत रफ्तार से शिकार चलते रहता है। ऐसे में अगर जंगली पशु-पक्षियों को बचाना है तो उसका एक रास्ता यह हो सकता है कि मुर्गीखानों या गौशालाओं की तरह इन जानवरों की भी नियंत्रित नस्लवृद्घि की जाए। इसके लिए मौजूदा वन्यप्राणी अधिनियम में फेरबदल करना पड़ेगा लेकिन आज जिस तरह हर काम-धंधे में निजीकरण बढ़ते जा रहा है तो बहुत सी अंतरराष्टï्रीय कंपनियां ऐसी निकल आएंगी जो अपने खुद के जंगल बनाकर इन पशु-पक्षियों की वंशवृद्घि में पूंजी निवेश करना चाहें। अब यह नीतिगत फैसला सरकार को करना होगा कि इन जानवरों को जैविक विविधता के लिए बचाना और बढ़ाना जरूरी है या फिर इन्हें अनियंत्रित जंगलों में बचने या मरने के लिए छोड़ देना बेहतर है।
इस पर हम एक दूसरी नजर से देखें तो पालतू घरेलू या शहरी जानवरों में और जंगली जानवरों में कुल एक बात का ही तो फर्क है कि जंगली जानवर संख्या में कम हैं और उनका मिजाज काबू के बाहर जंगलों में रहने का है। लेकिन अगर अवैध शिकार से या घटते जंगलों के कारण यह नस्ल खत्म होने का खतरा है तो क्या उसे नियंत्रित कारोबार की तरह बढ़ाना ठीक नहीं है?
जिस तरह मुर्गीखाने या सुअर पालन केंद्र चलते हैं उसी तरह दुनिया के अलग-अलग देशों में कहीं गाय-भैंस को काटने के लिए पाला जाता है तो कहीं पर शुतुरमुर्ग और दूसरे पशु-पक्षी, मछली, कीड़े-मकोड़े पाले और काटे-खाए जाते हैं। मांसाहारी की नजर से देखें तो मुर्गी और शेर को खाने में फर्क क्या है? और जब इन शहरी पालतू पशु-पक्षियों और मछलियों को पालने, बढ़ाने, काटने और खाने में कोई रोक नहीं है तो जंगली जानवरों को पालना रोककर क्या हासिल होता है? अगर लोगों को मांसाहारी ही रहना है तो हो सकता है कि हिरन और शेर को भी पोल्ट्रीफॉर्म की तरह पालकर और बाजार में डिब्बाबंद गोश्त की तरह बेचा जा सके। इससे कम से कम एक बात की गारंटी हो जाएगी कि अंबानी या विजय माल्या या टाटा-बिड़ला के जंगलों में ये जानवर कभी खत्म नहीं होंगे क्योंकि इनकी वजह से उनका कारोबार चलेगा। जहां तक प्राकृतिक वातावरण में इन जानवरों के रहने का सवाल है तो उस वातावरण को इंसान जानवरों से बहुत रफ्तार से छीन रहा है और शिकारी इन जानवरों की खाल के लिए, आसपास के गांव वाले इनके गोश्त के लिए और अंधविश्वासी या आस्थावान इनके दांतों के लिए इनको मार ही रहे हैं। इसके पहले कि इनकी आबादी एकदम खत्म होने को हो और इनकी नस्लों के भीतर जैव विविधता खत्म होने को हो, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि जंगली जानवरों को निजी जंगलों में पालने, उनकी वंशवृद्घि करने और उन्हें काटने-खाने, बेचने की इजाजत दे दी जाए। आज धरती पर गाय-भैंस, बकरी, कुत्ता, मुर्गी, बतख इन सबके खत्म होने का कोई खतरा नहीं है। ये सब लगातार बढ़ते चल रहे हैं और इनके भीतर की जैव विविधता भी काफी हद तक कायम है। लेकिन कौन सी जंगली मुर्गी, कौन सा वन भैंसा कब खत्म हो जाए और जंगल विभाग के भ्रष्टï अफसर कब तक फर्जी और नकली पदचिन्ह बनाकर उनकी गिनती बताते रहें यह अंदाज लगाना असंभव है।
मेरी यह बात हो सकता है कि वन्यप्राणी प्रेमियों को बड़ी नाजायज लगे। लेकिन यह बात तो मैंने सामने रखी इसीलिए है कि इस मामले के अधिक जानकार लोग अलग-अलग जगहों पर इस बारे में सोचें-विचारें। इससे इस बात की गारंटी हो जाएगी कि कारोबारी लोग विज्ञान की नई-नई तकनीके इस्तेमाल करके जानवरों की संख्या बढ़ा पाएंगे और नियंत्रित जंगलों में शायद एक दिन इनकी आबादी इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि प्राकृतिक जंगलों में फिर से इन्हें छोड़ा जा सके। आज तो सरकारी नियंत्रण के चलते जंगलों के भीतर जानवर खत्म होते जा रहे हैं और सरकार एक अधिक इंसानियत के नाम पर एक बड़ी हैवानियत का काम करते दिख रही है। निजीकरण अब इतना बुरा शब्द नहीं रह गया है कि उससे लोगों को परहेज हो। और जंगली जिंदगी को बचाना जब सरकार के लिए पूरी तरह उसके बूते के बाहर की बात हो गई है तो फिर उसे एक नई नजर से इस बारे में सोचना चाहिए।
हालांकि इस बारे में जब इतना लिख लेने के बाद मैंने छत्तीसगढ़ की एक वन्य जीवन जानकार प्रतिभा पाण्डेय से इस बारे में पूछा तो वे इस नियंत्रित ब्रीडिंग के बिल्कुल खिलाफ थीं और उन्होंने कहा कि थाईलैंड जैसी कुछ जगहों पर ऐसे प्रयोग किए गए जो सफल नहीं हुए और नियंत्रित परिस्थितियों में जंगली जानवर तरह-तरह की बीमारियां पा जाते हैं और जब वे बाहर जंगलों में जाते हैं तो वे वहां के खुले वातावरण के जानवरों को भी बीमार करके मार डालते हैं। उनकी यह भी आशंका थी कि लोग ऐसे नियंत्रित कारोबार में भी जंगलों से जानवरों को मारकर उनको खरीदने-बेचने का रास्ता निकाल लेंगे।
-सुनील कुमार
दुनिया ने अभी चीन को हाथीदांत खरीदने की छूट दी है और इसे लेकर दुनिया के पर्यावरणवादी विरोध में उतर आए हैं। जेनेवा में संयुक्त राष्टï्रसंघ की एक बैठक में कुछ अफ्रीकी देशों ने इसका विरोध किया था लेकिन ब्रिटेन जैसे कुछ देशों ने चीन को हाथीदांत खरीदने की इजाजत दी। यह खरीदी अफ्रीका के चार देशों, दक्षिण अफ्रीका, बोत्सवाना, नामीबिया और जिम्बाब्वे से की जाएगी। अफ्रीका में हर बरस बीस हजार से अधिक हाथियों को गैरकानूनी तरीके से मार डाला जाता है। लेकिन वहां पर हाथियों की बड़ी आबादी होने के कारण हाथीदांत कंकालों से भी निकलता है और अगर उसे दुनिया में बेचने की छूट ही न रहे तो अफ्रीका की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए संयुक्त राष्टï्र की एक कमेटी ऐसी परिस्थितियों की जांच करके कुछ देशों को यह छूट देती है कि वे अफ्रीका से हाथीदांत आयात कर सकें ताकि हाथीदांत पर कारीगरी से कलाकृतियां भी बन सके और अफ्रीकी अर्थव्यवस्था को मदद भी मिले।
इस धंधे के बारे में भारत में बहुत अधिक जानकारी तो नहीं है लेकिन एक बहस पूरी दुनिया में चलती ही रहती है कि वन्य प्राणियों को लेकर क्या एक ही नीति सभी देशों के लिए कारगर हो सकती है? अभी दुनिया के अलग-अलग देशों में कुछ-कुछ जानवरों का चुनिंदा शिकार कानूनी दर्जा पाए हुए है। जहां पर कुछ जानवरों की आबादी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि वे इंसान के लिए खतरा बनने लगते हैं तो उन्हें एक सीमित संख्या में शिकार से मारा जाता है। दरअसल जंगली जानवरों को बचाने की एक जरूरत इसलिए भी पड़ती है कि जंगल कम होने के साथ-साथ कुछ नस्लें खत्म होने की कगार पर हैं और उनके साथ कुदरत का एक पहलू भी खत्म हो जाएगा। लेकिन अफ्रीका जैसे कई देश ऐसे हैं जहां पर जंगल बहुत अधिक हैं और जंगली जानवर भी। ऐसे में वहां जानवरों के सींग, चमड़े, और दांतों से बने हुए कई तरह के सामान बनाए और बेचे जाते हैं और इनको कानूनी मंजूरी भी मिली हुई है।
हम भारत के हिसाब से देखें तो यहां बहुत रफ्तार से जंगल कट रहे हैं, शहर फैल रहे हैं और कारखाने लगते जा रहे हैं। जंगलों के बीच पानी घटते जा रहा है और जानवरों का बहुत रफ्तार से शिकार चलते रहता है। ऐसे में अगर जंगली पशु-पक्षियों को बचाना है तो उसका एक रास्ता यह हो सकता है कि मुर्गीखानों या गौशालाओं की तरह इन जानवरों की भी नियंत्रित नस्लवृद्घि की जाए। इसके लिए मौजूदा वन्यप्राणी अधिनियम में फेरबदल करना पड़ेगा लेकिन आज जिस तरह हर काम-धंधे में निजीकरण बढ़ते जा रहा है तो बहुत सी अंतरराष्टï्रीय कंपनियां ऐसी निकल आएंगी जो अपने खुद के जंगल बनाकर इन पशु-पक्षियों की वंशवृद्घि में पूंजी निवेश करना चाहें। अब यह नीतिगत फैसला सरकार को करना होगा कि इन जानवरों को जैविक विविधता के लिए बचाना और बढ़ाना जरूरी है या फिर इन्हें अनियंत्रित जंगलों में बचने या मरने के लिए छोड़ देना बेहतर है।
इस पर हम एक दूसरी नजर से देखें तो पालतू घरेलू या शहरी जानवरों में और जंगली जानवरों में कुल एक बात का ही तो फर्क है कि जंगली जानवर संख्या में कम हैं और उनका मिजाज काबू के बाहर जंगलों में रहने का है। लेकिन अगर अवैध शिकार से या घटते जंगलों के कारण यह नस्ल खत्म होने का खतरा है तो क्या उसे नियंत्रित कारोबार की तरह बढ़ाना ठीक नहीं है?
जिस तरह मुर्गीखाने या सुअर पालन केंद्र चलते हैं उसी तरह दुनिया के अलग-अलग देशों में कहीं गाय-भैंस को काटने के लिए पाला जाता है तो कहीं पर शुतुरमुर्ग और दूसरे पशु-पक्षी, मछली, कीड़े-मकोड़े पाले और काटे-खाए जाते हैं। मांसाहारी की नजर से देखें तो मुर्गी और शेर को खाने में फर्क क्या है? और जब इन शहरी पालतू पशु-पक्षियों और मछलियों को पालने, बढ़ाने, काटने और खाने में कोई रोक नहीं है तो जंगली जानवरों को पालना रोककर क्या हासिल होता है? अगर लोगों को मांसाहारी ही रहना है तो हो सकता है कि हिरन और शेर को भी पोल्ट्रीफॉर्म की तरह पालकर और बाजार में डिब्बाबंद गोश्त की तरह बेचा जा सके। इससे कम से कम एक बात की गारंटी हो जाएगी कि अंबानी या विजय माल्या या टाटा-बिड़ला के जंगलों में ये जानवर कभी खत्म नहीं होंगे क्योंकि इनकी वजह से उनका कारोबार चलेगा। जहां तक प्राकृतिक वातावरण में इन जानवरों के रहने का सवाल है तो उस वातावरण को इंसान जानवरों से बहुत रफ्तार से छीन रहा है और शिकारी इन जानवरों की खाल के लिए, आसपास के गांव वाले इनके गोश्त के लिए और अंधविश्वासी या आस्थावान इनके दांतों के लिए इनको मार ही रहे हैं। इसके पहले कि इनकी आबादी एकदम खत्म होने को हो और इनकी नस्लों के भीतर जैव विविधता खत्म होने को हो, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि जंगली जानवरों को निजी जंगलों में पालने, उनकी वंशवृद्घि करने और उन्हें काटने-खाने, बेचने की इजाजत दे दी जाए। आज धरती पर गाय-भैंस, बकरी, कुत्ता, मुर्गी, बतख इन सबके खत्म होने का कोई खतरा नहीं है। ये सब लगातार बढ़ते चल रहे हैं और इनके भीतर की जैव विविधता भी काफी हद तक कायम है। लेकिन कौन सी जंगली मुर्गी, कौन सा वन भैंसा कब खत्म हो जाए और जंगल विभाग के भ्रष्टï अफसर कब तक फर्जी और नकली पदचिन्ह बनाकर उनकी गिनती बताते रहें यह अंदाज लगाना असंभव है।
मेरी यह बात हो सकता है कि वन्यप्राणी प्रेमियों को बड़ी नाजायज लगे। लेकिन यह बात तो मैंने सामने रखी इसीलिए है कि इस मामले के अधिक जानकार लोग अलग-अलग जगहों पर इस बारे में सोचें-विचारें। इससे इस बात की गारंटी हो जाएगी कि कारोबारी लोग विज्ञान की नई-नई तकनीके इस्तेमाल करके जानवरों की संख्या बढ़ा पाएंगे और नियंत्रित जंगलों में शायद एक दिन इनकी आबादी इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि प्राकृतिक जंगलों में फिर से इन्हें छोड़ा जा सके। आज तो सरकारी नियंत्रण के चलते जंगलों के भीतर जानवर खत्म होते जा रहे हैं और सरकार एक अधिक इंसानियत के नाम पर एक बड़ी हैवानियत का काम करते दिख रही है। निजीकरण अब इतना बुरा शब्द नहीं रह गया है कि उससे लोगों को परहेज हो। और जंगली जिंदगी को बचाना जब सरकार के लिए पूरी तरह उसके बूते के बाहर की बात हो गई है तो फिर उसे एक नई नजर से इस बारे में सोचना चाहिए।
हालांकि इस बारे में जब इतना लिख लेने के बाद मैंने छत्तीसगढ़ की एक वन्य जीवन जानकार प्रतिभा पाण्डेय से इस बारे में पूछा तो वे इस नियंत्रित ब्रीडिंग के बिल्कुल खिलाफ थीं और उन्होंने कहा कि थाईलैंड जैसी कुछ जगहों पर ऐसे प्रयोग किए गए जो सफल नहीं हुए और नियंत्रित परिस्थितियों में जंगली जानवर तरह-तरह की बीमारियां पा जाते हैं और जब वे बाहर जंगलों में जाते हैं तो वे वहां के खुले वातावरण के जानवरों को भी बीमार करके मार डालते हैं। उनकी यह भी आशंका थी कि लोग ऐसे नियंत्रित कारोबार में भी जंगलों से जानवरों को मारकर उनको खरीदने-बेचने का रास्ता निकाल लेंगे।
-सुनील कुमार
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