13 जुलाई
दस एक दिन पहले एक खबर देश-विदेश के बड़े-बड़े अखबारों में बड़ी प्रमुखता से छपी कि गोवा में हिटलर की नाजी सेना का एक ऐसा फरार अफसर पकड़ाया जो 50 बरस पहले हजारों यहूदियों को मारने का जिम्मेदार था। इस फरार युद्घ अपराधी को तलाशने में इजराइल के यहूदियों का एक संगठन शामिल था और इसे गोवा-कर्नाटक सीमा से गिरफ्तार करके जर्मनी ले जाया गया है। कई बड़े अखबारों के इंटरनेट संस्करण पर यह खबर देखकर हमने भी 'छत्तीसगढ़Ó के संपादकीय में इसका जिक्र किया कि गलत काम करने वाला 50 बरस की फरारी के बाद भी पकड़ा जाता है इसलिए लोगों को भला इंसान बने रहना चाहिए।
अब यह बात सामने आई कि गोवा में सालभर पहले शुरू हुए एक इंटरनेट ब्लॉग में मीडिया की बेईमानी, उसकी मूर्खता और उसकी लापरवाही को उजागर करने के लिए यह झूठी खबर एक जर्मन पे्रस नोट की तरह देश-विदेश के सभी प्रमुख अखबारों को भेजी गई और उन अखबारों ने उस खबर में किस-किस तरह की नमक-मिर्च लगाकर उसे छापा, कैसे अपनी कल्पनाशीलता से इस खबर को कुछ का कुछ बना दिया। यह ब्लॉग मोटेतौर पर गोवा के अखबारों को लेकर बेईमानी उजागर करता है। उसमें इसे चलाने वालों के बारे में ऐसा अंदाज लगता है कि ये वहीं के कुछ सुधारवादी पत्रकार हैं या ऐसे लोग हैं जो पत्रकारिता में बेहतरी चाहते हैं। इनके नाम ब्लॉग में नहीं लिखे हैं लेकिन इन्होंने गोवा और गोवा के बाहर के बहुत से अखबारों के पेशेवर दीवालियापन का भांडाफोड़ किया है।
यह साबित करने के लिए कि अखबार किस कदर लापरवाह हैं पेनप्रिक्सडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम नामक इस ब्लॉग ने जर्मनी का एक ईमेल एड्रेस गढ़ा और उससे भारत के बड़े अखबारों को, गोवा के अखबारों को प्रेस नोट भेजा। यहां पर उन तमाम अखबारों के अलग-अलग नाम देकर उनकी नमक-मिर्च या उनकी लापरवाही का जिक्र ठीक नहीं है, और यहां यह लिखना भी ठीक होगा कि कुछ किस्म की लापरवाही कभी-कभी हमसे भी होती है, लेकिन नमक-मिर्च लगाना और झूठी बातें जोड़ देना तो एक भयानक स्थिति है। गोवा के इन ब्लॉगर्स ने द्वितीय विश्वयुद्घ के वक्त के नाजी युद्घ अपराधी की छवि गढऩे के लिए इंटरनेट से एक बूढ़े जर्मन की तस्वीर भी छांट ली जो 88 बरस का दिखे और फिर एक कहानी गढ़ी कि किस तरह हिटलर का यह अफसर आकर गोवा में बसा हुआ था और जब उसने गोवा के अखबारों में अपना एक पुराना पियानो बेचने का इश्तहार निकलवाया तो उसे यहूदी संगठन चौकन्ना हुआ। इस पे्रस नोट के हिसाब से इस किस्म का पियानो का मॉडल हिटलर के वक्त जर्मनी के एक संग्रहालय से गायब हुआ था और उसके अब बिक्री के लिए सामने आने का मतलब हिटलर के किसी अफसर से रिश्ता हो सकता था। इंटरनेट पर गोवा के अखबार में इश्तहार देखकर नाजी युद्घ अपराधी तलाशने वाला यहूदी संगठन सक्रिय हुआ और ढूंढते हुए पता लगा कि यह जर्मन हिटलर की सेना में कर्नल रहा हुआ है और एक किसी यहूदी कैंप का इंचार्ज था जिसमें शायद 12 हजार लोगों को मारा गया था।
यह पे्रस नोट पाने के बाद भारत के बड़े-बड़े अखबारों ने कर्नाटक और गोवा की पुलिस, जर्मन दूतावास, और केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों से संपर्क किया, जिनमें से किसी ने भी इस खबर की पुष्टिï नहीं की। कुछ अखबारों ने तो उन तमाम देशों के नाम अपने मन से जोड़ दिए जहां से होते हुए यह जर्मन गोवा तक पहुंचा था। गोवा के एक अखबार ने पूरी खबर को छापने के बाद इस काल्पनिक जर्मन प्रेस नोट भेजने वाले से ईमेल से पत्र व्यवहार भी किया कि उन्होंने पूरी खबर छापी है और आगे की क्या जानकारी है।
देश के एक प्रमुख अखबार 'हिन्दूÓ ने वहां के एक वरिष्ठï पत्रकार ने कुछ दिनों बाद इस पूरे फर्जी मामले के बारे में और गोवा के इस ब्लॉग के बारे में लिखा। मीडिया के काम करने के लापरवाह, सनसनीखेज, और बदनीयत से भरे तरीके कोई नए नहीं हैं। मीडिया के बहुत बड़े हिस्से की सुर्खियों को देखकर ही उसके अपने रूख का अंदाज लगाया जा सकता है। भाषा को थोड़ा सा देखा जाए तो समझ आ जाता है कि अखबार या टीवी की अपनी हसरत क्या है। चुनावों की रिपोर्टिंग तो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के मीडिया में जिस कीमत पर होती है उसका अंदाज लगाने के लिए समझदार रिपोर्टर मोर्चे पर निकलने के पहले मालिक, मैनेजर, या अगर मायने रखने वाला हो तो संपादक, से पूछ लेता है कि किस पार्टी या प्रत्याशी को कितनी अधिक लीड दिलवानी है।
एक बात यह लगती है कि पूरी दुनिया के बारे में लिखने वाले मीडिया के बारे में एक तो बहुत कम लिखा जाता है, दूसरा मीडिया की ऐसी पत्रिकाओं में लिखा जाता है जिन्हें साधारण पाठक कभी नहीं पढ़ता। हम कभी-कभार टीवी-समाचार चैनलों की बहुत अधिक ज्यादती होने पर उनके बारे में लिखते हैं और अपने खुद के दायरे के मीडिया के बारे में मोटी-मोटी बातें अपने संपादकीय या कालम में लिखते हैं। लेकिन हिचकते-झिझकते हुए लिखना एक अलग बात होती है। अपने धंधे के लोगों के बारे में, या मीडिया के बारे में लिखना कभी ऐसा भी लगता है कि बाजार के मुकाबले को इस तरह चुकाया जा रहा है।
ऐसे में मीडिया पर नजर रखने के लिए अगर एक स्वतंत्र संगठन ऐसा बने जो इंटरनेट के मुफ्त माध्यम का इस्तेमाल करके मीडिया की व्याख्या करे तो शायद मीडिया का कुछ भला हो और अंतत: लोकतंत्र का भी। गोवा में जिस तरह की यह शुरूआत हुई है वैसी शुरूआत छत्तीसगढ़ के भी कुछ पत्रकार, या मीडिया की समझ रखने वाले लोग कर सकते हैं। हो सकता है कि काफी हद तक वे अपनी पहचान भी छुपाए रख सकें। भारत के साइबर कानून अभी बहुत मजबूत नहीं हैं इसलिए गुमनामी में भी बहुत सा काम रखा जा सकता है।
और केवल मीडिया की बात क्यों करें, राजनीति, उद्योग-व्यापार, सामाजिक संगठन, सरकार, नेता-अफसर-ठेकेदार जैसे बहुत से तबके हैं जिनके बारे में कई बातें मीडिया अपनी विज्ञापनों की कमाई के कारण नहीं लिख पाता, या नहीं लिखता, या विज्ञापनों से परे भी कमाई का कोई रास्ता निकाल लेता है। ऐसी तमाम बातें कोई ऐसा व्यक्ति बेहतर तरीके से उजागर कर सकता है जिसे बहुत किस्म के दबावों की फिक्र न हो। जो लोग इंटरनेट पर बैठते हैं वे इस ब्लॉग द्धह्लह्लश्च://222.श्चद्गठ्ठश्चह्म्द्बष्द्मह्य.ड्ढद्यशद्दह्यश्चशह्ल.ष्शद्व/ को देखकर अंदाज लगा सकते हैं कि ऐसी कोई कोशिश देश के दूसरे हिस्सों में भी वहां के पत्रकारों, मीडिया मैनेजरों और मालिकों को सावधान कर सकती है। आज तो मीडिया का लिखा या कहा बिना किसी चुनौती के बाजार में खप जाता है और जब तक इसके खिलाफ कोई बात उठे मीडिया कोई नई गलती या लापरवाही करने में जुट जाता है। नीचे मैं 'हिन्दूÓ में सिद्घार्थ वरदराजन का लिखा लेख भी दे रहा हूं जो गोवा की इस खबर-मजाक और भारत के मीडिया के हाल पर अधिक विस्तार से जानकारी देता है।
दस एक दिन पहले एक खबर देश-विदेश के बड़े-बड़े अखबारों में बड़ी प्रमुखता से छपी कि गोवा में हिटलर की नाजी सेना का एक ऐसा फरार अफसर पकड़ाया जो 50 बरस पहले हजारों यहूदियों को मारने का जिम्मेदार था। इस फरार युद्घ अपराधी को तलाशने में इजराइल के यहूदियों का एक संगठन शामिल था और इसे गोवा-कर्नाटक सीमा से गिरफ्तार करके जर्मनी ले जाया गया है। कई बड़े अखबारों के इंटरनेट संस्करण पर यह खबर देखकर हमने भी 'छत्तीसगढ़Ó के संपादकीय में इसका जिक्र किया कि गलत काम करने वाला 50 बरस की फरारी के बाद भी पकड़ा जाता है इसलिए लोगों को भला इंसान बने रहना चाहिए।
अब यह बात सामने आई कि गोवा में सालभर पहले शुरू हुए एक इंटरनेट ब्लॉग में मीडिया की बेईमानी, उसकी मूर्खता और उसकी लापरवाही को उजागर करने के लिए यह झूठी खबर एक जर्मन पे्रस नोट की तरह देश-विदेश के सभी प्रमुख अखबारों को भेजी गई और उन अखबारों ने उस खबर में किस-किस तरह की नमक-मिर्च लगाकर उसे छापा, कैसे अपनी कल्पनाशीलता से इस खबर को कुछ का कुछ बना दिया। यह ब्लॉग मोटेतौर पर गोवा के अखबारों को लेकर बेईमानी उजागर करता है। उसमें इसे चलाने वालों के बारे में ऐसा अंदाज लगता है कि ये वहीं के कुछ सुधारवादी पत्रकार हैं या ऐसे लोग हैं जो पत्रकारिता में बेहतरी चाहते हैं। इनके नाम ब्लॉग में नहीं लिखे हैं लेकिन इन्होंने गोवा और गोवा के बाहर के बहुत से अखबारों के पेशेवर दीवालियापन का भांडाफोड़ किया है।
यह साबित करने के लिए कि अखबार किस कदर लापरवाह हैं पेनप्रिक्सडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम नामक इस ब्लॉग ने जर्मनी का एक ईमेल एड्रेस गढ़ा और उससे भारत के बड़े अखबारों को, गोवा के अखबारों को प्रेस नोट भेजा। यहां पर उन तमाम अखबारों के अलग-अलग नाम देकर उनकी नमक-मिर्च या उनकी लापरवाही का जिक्र ठीक नहीं है, और यहां यह लिखना भी ठीक होगा कि कुछ किस्म की लापरवाही कभी-कभी हमसे भी होती है, लेकिन नमक-मिर्च लगाना और झूठी बातें जोड़ देना तो एक भयानक स्थिति है। गोवा के इन ब्लॉगर्स ने द्वितीय विश्वयुद्घ के वक्त के नाजी युद्घ अपराधी की छवि गढऩे के लिए इंटरनेट से एक बूढ़े जर्मन की तस्वीर भी छांट ली जो 88 बरस का दिखे और फिर एक कहानी गढ़ी कि किस तरह हिटलर का यह अफसर आकर गोवा में बसा हुआ था और जब उसने गोवा के अखबारों में अपना एक पुराना पियानो बेचने का इश्तहार निकलवाया तो उसे यहूदी संगठन चौकन्ना हुआ। इस पे्रस नोट के हिसाब से इस किस्म का पियानो का मॉडल हिटलर के वक्त जर्मनी के एक संग्रहालय से गायब हुआ था और उसके अब बिक्री के लिए सामने आने का मतलब हिटलर के किसी अफसर से रिश्ता हो सकता था। इंटरनेट पर गोवा के अखबार में इश्तहार देखकर नाजी युद्घ अपराधी तलाशने वाला यहूदी संगठन सक्रिय हुआ और ढूंढते हुए पता लगा कि यह जर्मन हिटलर की सेना में कर्नल रहा हुआ है और एक किसी यहूदी कैंप का इंचार्ज था जिसमें शायद 12 हजार लोगों को मारा गया था।
यह पे्रस नोट पाने के बाद भारत के बड़े-बड़े अखबारों ने कर्नाटक और गोवा की पुलिस, जर्मन दूतावास, और केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों से संपर्क किया, जिनमें से किसी ने भी इस खबर की पुष्टिï नहीं की। कुछ अखबारों ने तो उन तमाम देशों के नाम अपने मन से जोड़ दिए जहां से होते हुए यह जर्मन गोवा तक पहुंचा था। गोवा के एक अखबार ने पूरी खबर को छापने के बाद इस काल्पनिक जर्मन प्रेस नोट भेजने वाले से ईमेल से पत्र व्यवहार भी किया कि उन्होंने पूरी खबर छापी है और आगे की क्या जानकारी है।
देश के एक प्रमुख अखबार 'हिन्दूÓ ने वहां के एक वरिष्ठï पत्रकार ने कुछ दिनों बाद इस पूरे फर्जी मामले के बारे में और गोवा के इस ब्लॉग के बारे में लिखा। मीडिया के काम करने के लापरवाह, सनसनीखेज, और बदनीयत से भरे तरीके कोई नए नहीं हैं। मीडिया के बहुत बड़े हिस्से की सुर्खियों को देखकर ही उसके अपने रूख का अंदाज लगाया जा सकता है। भाषा को थोड़ा सा देखा जाए तो समझ आ जाता है कि अखबार या टीवी की अपनी हसरत क्या है। चुनावों की रिपोर्टिंग तो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के मीडिया में जिस कीमत पर होती है उसका अंदाज लगाने के लिए समझदार रिपोर्टर मोर्चे पर निकलने के पहले मालिक, मैनेजर, या अगर मायने रखने वाला हो तो संपादक, से पूछ लेता है कि किस पार्टी या प्रत्याशी को कितनी अधिक लीड दिलवानी है।
एक बात यह लगती है कि पूरी दुनिया के बारे में लिखने वाले मीडिया के बारे में एक तो बहुत कम लिखा जाता है, दूसरा मीडिया की ऐसी पत्रिकाओं में लिखा जाता है जिन्हें साधारण पाठक कभी नहीं पढ़ता। हम कभी-कभार टीवी-समाचार चैनलों की बहुत अधिक ज्यादती होने पर उनके बारे में लिखते हैं और अपने खुद के दायरे के मीडिया के बारे में मोटी-मोटी बातें अपने संपादकीय या कालम में लिखते हैं। लेकिन हिचकते-झिझकते हुए लिखना एक अलग बात होती है। अपने धंधे के लोगों के बारे में, या मीडिया के बारे में लिखना कभी ऐसा भी लगता है कि बाजार के मुकाबले को इस तरह चुकाया जा रहा है।
ऐसे में मीडिया पर नजर रखने के लिए अगर एक स्वतंत्र संगठन ऐसा बने जो इंटरनेट के मुफ्त माध्यम का इस्तेमाल करके मीडिया की व्याख्या करे तो शायद मीडिया का कुछ भला हो और अंतत: लोकतंत्र का भी। गोवा में जिस तरह की यह शुरूआत हुई है वैसी शुरूआत छत्तीसगढ़ के भी कुछ पत्रकार, या मीडिया की समझ रखने वाले लोग कर सकते हैं। हो सकता है कि काफी हद तक वे अपनी पहचान भी छुपाए रख सकें। भारत के साइबर कानून अभी बहुत मजबूत नहीं हैं इसलिए गुमनामी में भी बहुत सा काम रखा जा सकता है।
और केवल मीडिया की बात क्यों करें, राजनीति, उद्योग-व्यापार, सामाजिक संगठन, सरकार, नेता-अफसर-ठेकेदार जैसे बहुत से तबके हैं जिनके बारे में कई बातें मीडिया अपनी विज्ञापनों की कमाई के कारण नहीं लिख पाता, या नहीं लिखता, या विज्ञापनों से परे भी कमाई का कोई रास्ता निकाल लेता है। ऐसी तमाम बातें कोई ऐसा व्यक्ति बेहतर तरीके से उजागर कर सकता है जिसे बहुत किस्म के दबावों की फिक्र न हो। जो लोग इंटरनेट पर बैठते हैं वे इस ब्लॉग द्धह्लह्लश्च://222.श्चद्गठ्ठश्चह्म्द्बष्द्मह्य.ड्ढद्यशद्दह्यश्चशह्ल.ष्शद्व/ को देखकर अंदाज लगा सकते हैं कि ऐसी कोई कोशिश देश के दूसरे हिस्सों में भी वहां के पत्रकारों, मीडिया मैनेजरों और मालिकों को सावधान कर सकती है। आज तो मीडिया का लिखा या कहा बिना किसी चुनौती के बाजार में खप जाता है और जब तक इसके खिलाफ कोई बात उठे मीडिया कोई नई गलती या लापरवाही करने में जुट जाता है। नीचे मैं 'हिन्दूÓ में सिद्घार्थ वरदराजन का लिखा लेख भी दे रहा हूं जो गोवा की इस खबर-मजाक और भारत के मीडिया के हाल पर अधिक विस्तार से जानकारी देता है।
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