बेहतर और बदतर के बीच

6 जुलाई 08
टेक्नालॉजी को देखें तो सामानों का आकार छोटा होते जा रहा है। पहले एक बड़े गोदाम से अधिक क्षमता का कम्प्यूटर अब जेब में आ जाता है। मोटर सायकिलें पहले से आधे वजन की हो गई हैं। टेलीविजन की मोटाईं पहले से बीसवां हिस्सा रह गई है ओर उसकी क्वालिटी पहले से हजार गुना बेहतर हो गई है। बिजली के बल्ब पहले के मुकाबले पचीसवां हिस्सा भी बिजली नहीं खाते और रौशनी सौ गुना देते हैं। कुल मिलाकर देखें तो तीस से साठ बरस के लोगों के मुकाबिले अब पांचवीं से कम से बच्चे अधिक तेज हो गए हैं। यह साबित करने में बड़े-बड़े लोगों को पसीना आ जाता है कि वे पांचवीं के बच्चों के मुकाबिले थोड़ा-बहुत तो जानते हैं।
टे्रनें तेज हो रही हैं, टेलीफोन छोटे और बेहतर हो रहे हैं, कॉल्स सस्ती हो रही हैं, खेतों की उपज बढ़ रही है, मुर्गीखानों में अंडे बढ़ रहे हैं, फूलों का आकार बढ़ रहा है और उनके रंग बेहतर किए जा रहे हैं। लेकिन यह सब तो विज्ञान और टेक्नालॉजी की बात है। इंसान अपने-आपको क्या बेहतरी की इस रफ्तार के मुकाबिले कुछ बेहतर भी बना रहा है?
लोगों के बीच फर्क बहुत है, बहुत से लोग अपने को बेहतर बना रहे हैं लेकिन बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने बेहतरी का जिम्मा पूरे का पूरा सिर्फ मशीनों पर छोड़ दिया है। मशीनें कुछ लोगों के हाथों में हथियारों की तरह हो गई हैं और उनका इस्तेमाल करने वे और लोगों को गुलाम बनाकर कबीलाई सरदार की तरह राज कर रहे हैं। वे जंगली अंदाज में अपनी ताकत बढ़ाकर दूसरों के बल पर अपनी जिंदगी बेहतर बना रहे हैं, खुद को बेहतर बनाकर नहीं।
लेकिन ऐसी जंगली ताकत से परे बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें केवल अपने बूते जीना रहता है, जो परजीवी नहीं हैं, लेकिन ऐसे लोग भी अपने-आपको बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। यह बेहतरी जिंदगी के मूल्यों से लेकर हुनर तक और हुनर से सुधार तक, कई किस्म की हो सकती है। यह अमरीकियों की तरह बेहतर कम्प्यूटर प्रोग्राम भी हो सकता है या चीनियों की तरह सामान को सस्ती बनाने का हुनर। यह जापानियों की तरह उपभोक्ता उपकरणों को बेहतर बनाना भी हो सकता है या पंजाबियों की तरह दुनिया भर में लाकर काम करने का हुनर।
लोगों के बीच उत्कृष्टïता बढ़ाने का मतलब सिर्फ बाजारू मुकाबिले में अधिक कामयाब होना नहीं है, उत्कृष्टïता तो इंसानियत में भी हो सकती है, जहां मदर टेरेसा दुनिया के दूसरे कोने से आकर भातर के अनाथ बच्चों को जिंदगी देने का काम करती है या छत्तीसगढ़ की मितानिन जिस तरह नवजात शिशुओं और मौत के बीच ढाल बनकर खड़ी हो जाती है।
लोगों को बदले वक्त के मुताबिक सोचना होगा कि अपने बोलने, सोचने, काम करने और विचलित होने में वे कैसी किफायत वाली कटौती कर सकते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि हर हफ्ते दस के करीब लेख या  संपादकीय या कॉलम लिखते-लिखते कहीं मैं अपने सीमित हुनर के साथ ज्यादती तो नहीं कर रहा हूँ? लेकिन जब इस नौबत से अपने को बचाने के लिए मैं फिजूल की गपबाजी में बैठना भी बंद करता हूँ। जब अपने पढऩे, टीवी देखने, रेडियो सुनने, और लोगों से मिलने को लेकर चौकन्ना हो जाता हूँ, तो लगता है कि उन दिनों को सोचना कुछ बेहतर होता है। जिस दिन भी किसी अनचाही बहस में घंटे-दो घंटे खराब होते हैं, तो सोचना-विचारना तक बिगडऩे लगता है। उसका सीधा असर बहुत सतही या औसत किस्म के लिखने की शक्ल में सामने आता है।
रोज की जिंदगी में छोटी-छोटी फिजूलखर्ची को काटकर जब तक किफायत नहीं करती जाएगी, बेहतरी आएगी कहां से? आज ही मैं एक दोस्त से बातचीत में कह रहा था कि कुदरत ने इंसानी जिस्म को ऐसा बनाया है कि जब शरीर के जिस हिस्से को अनुभव करना हो, तभी दिमाग वहां से आते संकेतों को दर्ज करता है। रात में सोते हुए कानों में आवाज तो पड़ती ही है लेकिन दिमाग उनको लगभग पूरी तरह नकार देता है। कोई जोर की आवाज हो, तो ही सुनाई पड़ती है, तभी नींद खुलती है। बदन से स्पर्श, गंध, आवाज दिखाने, और चखने के सारे संकेत अगर सारे समय दिमाग में दर्ज होंगे, तो दिमाग काम का कोई काम कर ही नहीं सकेगा।
इसलिए जरूरत यह रहती है कि हम तमाम वार्ता में से गैरजरूरी हिस्सों का संपादन करते चलें और वक्त को कुद खाली रखें। खाली वक्त के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन से भी कई किस्म के सुधार होते हैं। आज जिस जिंदगी को सामाजिक दायरा माना जाता है, वह दायरा अधिकांश मामलों में उत्पादकता विरोधी, उत्कृष्टïता विरोधी होते चल रहा है। सामाजिक प्राणी होने की अपनी परिभाषा पर खरा उतरने के लिए इंसान अमूमन ऐसे सामाजिक होते चल रहा है कि उससे समाज की वक्त बरबादी ही हो रही है।
पिछले कुछ महीनों में मैंने कुछ अधिक चुप रहने कुछ कम मिलने, कुछ अनसुना करने, कुछ अनदेखा करने और कुछ मामलों में मन की बात मन में रखने के फायदे देखें हैं। इनसे समझ आया कि बहुत से लोग मौन व्रत लेकर, ध्यान करके, एकांतवास करके किस तरह अपने आपको बेहतर समझ पाते हैं।
अखबार के धंधे में तो पूरी जिंदगी ही संपादन करते गुजर गई, लेकिन, बोलने-सुनने-मिलने पर संपादन करने का फायदा मैंने अभी-अभी इतने जाहिर तरीके से देखा। मैं यह तो नहीं कहता कि इससे मेरी जिंदगी में सब कुछ बेहतर हो गया, लेकिन यह जरूर कह सकता हूँ कि कई बातें बदतर होने से बच गईं।
-सुनील कुमार

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