हर किसी की जिंदगी में चीनी चीजें मौजूद, जासूसी का खतरा भी उतना ही...

10 अगस्त 2026  

 

ब्रिटेन की खबर है कि वहां नौसेना के ड्रोन अपनी हलचल की जानकारी चीन को भेज रहे थे। इनमें लगे हुए कैमरों में ऐसे चीनी पुर्जे थे, जो कि ब्रिटेन के हथियार ठेकेदार को किसी और पार्टी ने सप्लाई किए थे, और अभी खुफिया जांच में पता लगा कि वे पुर्जे चीन में मौजूद एक आईपी एड्रेस पर जानकारी भेज रहे थे। इसके बाद ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने इन कैमरों का इंटरनेट संपर्क हटा दिया है। ये ड्रोन वहां की नौसेना में मार्च के महीने से इस्तेमाल हो रहे थे, और अब ब्रिटेन पर यह फिक्र मंडराने लगी है कि इनका इस्तेमाल तो तमाम संवेदनशील जगहों पर होते आ रहा था, अब तक कितनी नाजुक जानकारी चीन जा चुकी होगी। एक खतरा यह भी दिख रहा है कि ड्रोन के इन कैमरों के ट्रांसमिटर क्या उस वक्त भी काम कर रहे थे जब ड्रोन का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था? अब इस देश में यह फिक्र खड़ी हो गई है कि इन ड्रोन को ब्रिटेन की नौसेना की भविष्य की योजनाओं में भी रखा गया था, और अब यह सब खतरे में पड़ गया है। 

यह पहला मौका नहीं है जब चीन के तरह-तरह के उपकरणों को लेकर यह बात सामने आई है कि उनमें ऐसे खुफिया उपकरण या पुर्जे छुपे हो सकते हैं जो कि जानकारी चीन को भेजते रहें। आज दिक्कत यह है कि घरों की रसोई के भी दर्जनभर उपकरण इंटरनेट से जुड़े रहते हैं, और स्पीकर से चलने वाले कंट्रोल से घर-बाहर के बहुत से काम होते हैं। आज दुनिया में ऐसे ही उपकरण अधिक हैं जो या तो सीधे-सीधे चीन के बने हुए हैं, या कम से कम उनमें चीनी पुर्जे तो हैं ही। लोगों को याद होगा कि भारत में कई बरस पहले बंद किए जा चुके टिक-टॉक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर अमरीका में लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि इस चीनी कंपनी के चीन में बसे हुए कम्प्यूटरों पर अमरीकी लोगों के वीडियो, उनकी लोकेशन, और उनके संबंधों की जानकारी दर्ज होती है, और उनका बेजा इस्तेमाल चीन कर सकता है। दरअसल चीन का कानून ऐसा है कि वहां काम करने वाली हर कंपनी को सुरक्षा का हवाला देकर सरकार उनकी सारी जानकारी ले सकती है। अमरीका में ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद अब टिक-टॉक कंपनी के मालिकाना हक में अमरीकी हिस्सेदारी को जोड़ा जा रहा है, और यह शर्त भी जोड़ी जा रही है कि टिक-टॉक की जानकारी अमरीका में बसे हुए कम्प्यूटरों पर ही रहेगी। लेकिन इसके अलावा चीन की कई और ऐसी कंपनियां हैं जो संचार उपकरण बनाती हैं, और जिन्हें अमरीका या योरप के देशों में काली सूची में डालकर रखा गया है। अब जब ड्रोन के कैमरे के किसी पुर्जे का ऐसा खुफिया इस्तेमाल हो रहा है कि उसकी जानकारी चीन जा रही है, तो चीनी सामान इस्तेमाल करने वाले हर देश को अपने सुरक्षा इंतजाम तौल लेना चाहिए। इसमें फौजी और खुफिया संस्थानों को तो अधिक सावधान रहना ही चाहिए, उनके अलावा दुनिया भर में कारोबारी-जासूसी करने में भी चीन बहुत माहिर और आगे है। चीन अपने कारोबारियों की मदद करने के लिए दुनिया भर के व्यापारियों, और कारखानेदारों पर नजर रखता है। जहां-जहां चीन से मुकाबले में कोई आगे बढ़ते दिखे, या चीनी एकाधिकार को खत्म करते भी दिखे, तो उनकी हर तरह की जासूसी की जाती है। 

भारत में कुछ बरस पहले के सरहदी टकराव के बाद चीन से व्यापार घटाने की बातें तो बहुत हुई थीं, लेकिन असल में तो चीन से खरीदी बढ़ती चली गई है। आज भारत में कई तरह के उपकरण अगर लोगों की खरीदी-सीमा के भीतर हैं, तो वे चीन से आने वाले सस्ते सामान हैं, या चीनी पुर्जों से भारत में बनने वाले सामान हैं। नौबत यह है कि अगर चीन से कच्चा माल, पुर्जे, या बने हुए सामान लेना भारत बंद कर दे, तो भारत का अपना निर्यात जमीन पर औंधेमुंह गिर पड़ेगा। भारत में बनने वाली दवाइयों, और दूसरे कई किस्म के सामानों का कच्चा माल चीन से ही आता है। चीन से परे अपनी आत्मनिर्भरता विकसित करना, दुनिया के शायद ही किसी देश के बस में हो। आज तो हालत यह है कि अलग-अलग धर्मों की पूजा की मालाओं की सप्लाई भी चीन से होती है, और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी वहीं से बनकर आती हैं। अमरीका जैसा देश जहां पर ट्रम्प जैसा आत्ममुग्ध तानाशाह मेक अमरीका ग्रेट अगेन का नारा लगा रहा है, तो ऐसे नारे वाले कैप और टी-शर्ट भी चीन से बनकर आते हैं, और अमरीकी झंडे, या झंडों के निशान वाले बाकी सौ तरह के सामान भी चीन से ही आते हैं। आज हालत यह है कि अगर अमरीका कोई सामान बनाने भी लगे, और उस पर मेड इन अमरीका का स्टिकर लगाना हो, तो वह स्टिकर भी चीन से बनकर पहुंचेगा। 

आज दुनिया भर के देशों में होने वाले शोधकार्य, वहां की जासूसी, और फौजी गतिविधियां, वहां उद्योग-व्यापार की जानकारी, नेताओं और बड़े अफसरों, बड़े कारोबारियों की निजी जानकारियां कहीं न कहीं चीन में बने हुए सामानों से जुड़ी हुई हैं। भारत में खेतों पर दवा छिडक़ने वाले ड्रोन चीन के बने हुए हैं, मोबाइल फोन या ब्लूटूथ चीनी हैं, कारों में बहुत से पुर्जे चीन के हैं, और कम्प्यूटर-लैपटॉप, वाईफाई जैसे सीधे-सीधे संचार उपकरण चीनी हैं, उनमें चीनी पुर्जे तो हैं ही, चाहे वे भारत में ही असेंबल क्यों न किए गए हों। इस तरह चीनी ड्रैगन के चंगुल में आज पूरी दुनिया जकड़ी हुई है। भारत में बेरोजगार, और फटेहाल हिन्दुस्तानी नौजवानों को मोबाइल ऐप के जरिए आसान कर्ज दे देने वाली कितनी ही चीनी कंपनियों पर भारत में रोक लगाई जाती है, और फिर ऐसे एप्लीकेशन किसी और नाम से सामने आ जाते हैं। लोगों की निजी जानकारियां, मोबाइल फोन पर पूरा कब्जा, उनके फोनबुक के सारे नाम-नंबर लेकर कर्ज देने वाली कंपनियां ब्लैकमेलिंग और उगाही का बहुत बड़ा रैकेट चलाती हैं, और इन सबके पीछे बहुत से मामलों में चीनी कंपनियां, एप्लीकेशन, या उपकरण रहते हैं। 

भारत में सरकार, कारोबार, और परिवार, इन सभी को ऐसी सुरक्षा ऑडिट की जरूरत है कि उनकी कौन-कौन सी संवेदनशील जानकारी किसी न किसी चीनी उपकरण से जुड़ी हुई है? आज चीन के बिना भारत में न दीवाली पर सस्ती रौशनी हो सकती, न सस्ते और रंग-बिरंगे फटाखे आ सकते, न होली पर सस्ती पिचकारियां आ सकतीं, रंग आ सकते, और न ही पतंग के मौसम में चीनी मांजे के बिना पतंगें उड़ सकतीं। देश चाहे चीन को दुश्मन माने, लेकिन हिन्दुस्तानी जनता की जिंदगी में कई चीजें खरीदने की ताकत चीनी सामानों की वजह से ही आती है। चूंकि निजी, सरकारी, या कारोबारी हर तरह की जिंदगी उपकरणों से जुड़ी हुई है, इंटरनेट, फोन, या कम्प्यूटर से जुड़ी हुई है, इसलिए चीनी खतरा सभी जगह है। खुफिया सॉफ्टवेयर सरहद पर वर्दी पहनकर नहीं आता, वह चुपचाप अपना काम करते रहता है। हमने इजराइल के पेगासस नाम के एक सॉफ्टवेयर की पूरी दुनिया में खुफिया घुसपैठ झेली हुई है। चीनी घुसपैठ के विकराल आकार का अभी दुनिया को पूरा अंदाज भी नहीं है। एक प्रयोग के लिए लोग अपनी रोज की जिंदगी के सामानों को देख सकते हैं, और एक-एक सामान की लिस्ट बनाकर यह जांच-परख सकते हैं, जानकारी तलाश सकते हैं कि उनमें चीन का कुछ लगा हुआ है या नहीं?

(Daily Chhattisgarh)   

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