12 अगस्त 2026
अभी अमरीका के कुछ प्रमुख अखबारों से निकलकर यह सनसनीखेज खबर आई है कि अंकारा में नाटो की मीटिंग से निकलने के बाद जब ट्रम्प तुर्की से ब्रिटेन के लिए रवाना हो रहे थे, तो उन्होंने गोपनीय तरीके से अपना विमान बदल लिया। इन अखबारों में छपी हुई खबर का ट्रम्प भी खंडन नहीं कर पाए, और उन्होंने यह माना कि अमरीकी खुफिया अफसरों, और फौज ने उनसे कहा था कि वे दूसरे विमान से रवाना हों, और उन्होंने उनकी बात मान ली। विमान बदलने का यह सिलसिला किसी फिल्म से भी अधिक नाटकीय था। 8 जुलाई को ट्रम्प अमरीकी राष्ट्रपति के निर्धारित विमान, एयरफोर्स-1 में सवार हुए, और बिदाई देने वाले लोगों, और टीवी कैमरों की तरफ हाथ हिलाकर भीतर चले गए। इसके कुछ देर बाद यह विमान उड़ा, लेकिन ट्रम्प इसमें नहीं थे। उन्हें विमान के पीछे के एक दरवाजे से निकाला गया, और खाना चढ़ाने वाली क्रेन पर जो फूड-कंटेनर रहता है, उसमें ट्रम्प को घुसाकर एक दूसरे फौजी विमान तक ले जाया गया, और वहां फिर उस विमान के दरवाजे से कंटेनर को सटाकर ट्रम्प को उसमें भीतर घुसाया गया। किसी भी बाहरी नजर से परे का यह ट्रांसफर इसलिए किया गया कि शायद इजराइल ने यह खुफिया जानकारी दी थी कि ट्रम्प की जान लेने के लिए उनके विमान पर ईरान हमला कर सकता है। इसलिए ट्रम्प घुसे तो एक विमान में, लेकिन उड़े दूसरे विमान से। फिर जब ब्रिटेन में उतरे, तो इसी तरह फूड-कंटेनर से उन्हें एयरफोर्स-1 में पीछे से घुसाया गया, और वे सामने के दरवाजे से हाथ हिलाते हुए सीढिय़ों से उतरे, मानो कुछ हुआ ही नहीं।
अब राष्ट्रपति को बचाने की इस कार्रवाई के बारे में राष्ट्रपति के विमान में चलने वाले सौ के करीब लोगों को कुछ भी नहीं बताया गया। उसमें एयरफोर्स-1 के पायलट और बाकी कर्मचारी थे, चिकित्सा कर्मचारी थे, फौजी थे, राष्ट्रपति भवन के कर्मचारी थे, और पत्रकार भी थे। इस विशेष विमान की साधारण सीटों पर बैठने वाले इन सारे लोगों से उड़ान भरने के पहले कहा गया था कि वे खिड़कियां बंद रखें। खबरों में एक आशंका यह सामने आई है कि शायद कोई ईरानी या कोई दूसरे हमलावर कंधे पर रखकर मिसाइल-लॉंचर से हमला कर सकते थे। इसलिए ट्रम्प का प्लेन बदलकर उन्हें एक दूसरे प्लेन में पहले रवाना किया गया, और उसके बाद राष्ट्रपति के प्लेन को बाकी लोगों के साथ उड़ाया गया।
सवाल यह उठता है कि जब राष्ट्रपति को बचाने के लिए उसे छुपाकर गोपनीय तरीके से अलग प्लेन में रवाना कर ही दिया गया था, तो फिर उनके पहचाने गए प्लेन में बाकी सौ लोगों की जिंदगी क्यों खतरे में डाली गई? खुफिया एजेंटों, और सुरक्षा कर्मचारियों की यह प्राथमिकता तो समझ में आती है, कि अगर राष्ट्रपति और साधारण नागरिकों में से किसी एक की जान बचानी है, तो वे पहले राष्ट्रपति की जान बचाएंगे। लेकिन जब राष्ट्रपति को बचाने का काम अलग विमान से हो चुका था, तो फिर एक संभावित दुश्मन को झांसा देने के लिए एयरफोर्स-1 को दिखावे के लिए क्यों इस्तेमाल किया गया? अगर इसमें राष्ट्रपति को मौजूद मानकर कोई हमला किया जाता, तो राष्ट्रपति तो इसमें नहीं रहते, बाकी सौ लोग जरूर मारे जाते। तो इस दिखावे का मकसद राष्ट्रपति को बचाना नहीं हो सकता था, क्योंकि वे तो अलग से निकल ही गए थे। और बाद में इस सरकारी विमान में सवार लोगों को उतारकर उन्हें किसी हमले की आशंका से बचाने का काम हो सकता था। ऐसा करने के बजाय इसे भी उड़ाना, और खुफिया जानकारी में बताए गए खतरे के सामने इस विमान को पेश करना, एक निहायत ही नाजायज खतरा था, जिसमें बेकसूर, अनजान, और राष्ट्रपति की सुरक्षा से परे के लोगों को खतरे में डाला गया था।
हो सकता है कि ट्रम्प को आपाधापी में पूरी जानकारी समझ में नहीं आई हो, लेकिन क्या वे इस पूरी शिफ्टिंग के बीच अपने खुफिया अफसरों से यह भी नहीं पूछ सकते थे कि एयरफोर्स-1 का क्या होगा? यह एक बहुत बड़ा नैतिक सवाल है कि ब्रिटेन में ट्रम्प के उतरने के वक्त इस दिखावा-विमान की जरूरत सिर्फ उन्हें इसमें से उतरते दिखाने के लिए थी, वरना ब्रिटेन में तो वे सुरक्षित थे ही, और वे वहां एक दूसरे विमान से भी उतर सकते थे। इससे कुछ सनसनी फैलती, कुछ खबरें निकलतीं, लेकिन कोई खतरा तो नहीं रहता, किसी पर भी नहीं रहता, न ट्रम्प पर, न ही दूसरे विमान, एयरफोर्स-1 में सफर करने वाले दूसरे लोगों पर। सिर्फ अपने दिखावे के लिए एयरफोर्स-1 को खतरे में झोंक देना एक पूरी तरह से अनैतिक फैसला था, और ट्रम्प चाहे इसमें हिस्सेदार रहे हों, या न रहे हों, वे पूछताछ की नौबत में भी थे, यह भी कह सकते थे कि उनका विमान उड़ जाने के बाद एयरफोर्स-1 की उड़ान को टाल दिया जाए, उस पर सवार लोगों को खतरे में न डाला जाए।
अब तक इस पूरी घटना की जितनी जानकारी एकदम पुख्ता सरकारी जानकारी और अखबारों से सामने आ चुकी है, उसका पर्याप्त विश्लेषण करने के बाद हमें यह समझ आ रहा है कि सौ के करीब बेकसूर लोगों को, बिना कोई जानकारी दिए, निहायत गैरजरूरी वजह से खतरे में डाला गया। ट्रम्प अपने आपको महाबली दिखाना चाहते हैं, और उन्हें शायद यह शर्मिंदगी बर्खास्त नहीं होती कि वे प्लेन बदलकर ब्रिटेन पहुंचे हैं, इसलिए उन्होंने उडऩे की जगह, और उतरने की जगह, दोनों देशों में एयरफोर्स-1 को दिखावे की तरह इस्तेमाल किया। किसी भी लोकतांत्रिक नेता को, या उसकी टीम को बिना जरूरत, और कोई जरूरत रहने पर भी सौ लोगों की जिंदगी इस तरह खतरे में नहीं डालनी चाहिए। हम ट्रम्प से तो किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं करते, और न ही अपने बॉस की सेवा करने वाले लोगों से भी, लेकिन दुनिया को यह नैतिक सवाल जरूर उठाना चाहिए कि जब इन सौ लोगों की जिंदगी राष्ट्रपति की जिंदगी को बचाने के लिए जरूरी नहीं रह गई थी, राष्ट्रपति की जिंदगी तो अलग विमान में अलग से उड़ चुकी थी, तब फिर जान के खतरे वाले इस विमान को बाद में उड़ाया ही क्यों गया? दुनिया की कोई भी जिंदगी इतनी कीमती नहीं हो सकती कि कैमरों के सामने एक दिखावा पेश करने के लिए उनको चारा बनाकर किसी दुश्मन के सामने पेश कर दिया जाए। असली नेता तो वो होते हैं जो दूसरों के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डालते हैं, न कि वे लोग जो दूसरों की जिंदगी अपने नाटक के लिए इस तरह खतरे में डालें। अभी तो खबरें इस नाटकीय ट्रांसफर पर केन्द्रित हैं, लेकिन फूड-कंटेनर में छुपकर आवाजाही की सनसनी जब कम होगी, तब गंभीर लोगों को ट्रम्प से यह सवाल जरूर करना चाहिए कि करीब सौ अमरीकी जिंदगियों को सीढिय़ों के अपने दिखावे के लिए उन्होंने क्यों झोंका?
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