1 मई 2014
विशेष संपादकीय
-सुनील कुमार
चुनाव की खबरों से थके हुए, और चटपटी खबरों की चाह में भूखे-प्यासे बैठे हिन्दुस्तान को कल एकदम से भरपेट खाना मिला जब भाजपा के पिछले राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने दिग्विजय सिंह की एक महिला मित्र के साथ की अंतरंग तस्वीरें इंटरनेट पर पोस्ट कीं। ये तस्वीरें दिग्विजय और उनकी टीवी पत्रकार दोस्त अमृता राय की हैं, जिनके रिश्तों के बारे में पिछले कई महीनों से सुगबुगाहट बनी हुई थी। कल की इन तस्वीरों के बारे में अमृता राय ने ट्विटर पर लिखा कि उनके कम्प्यूटर और ई-मेल को हैक कर लिया गया, और उनकी निजी तस्वीरों का ऐसा इस्तेमाल किया गया है। हैकिंग और जुर्म से हासिल निजी तस्वीरों का सार्वजनिक इस्तेमाल एक मुद्दा है, और दूसरा मुद्दा है दो लोगों की निजी जिंदगी के तलाक या शादी के फैसले का।
अभी दो दिन पहले ही हमने नीरा राडिया के मामले में लिखा था कि निजी जिंदगी की निजता एक बुनियादी हक है, और उसमें दखल सिर्फ देश के हित में, सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून के तहत औपचारिकता पूरी करने के बाद ही किया जाना चाहिए, न कि कारोबारी निगरानी के लिए, या राजनीतिक हंगामों के लिए। वही बात हम दिग्विजय सिंह की निजी जिंदगी को लेकर दुहराना चाहेंगे कि दो वयस्क लोग अपनी जिंदगी का क्या करते हैं, इससे औरों को लेना-देना नहीं होना चाहिए। दिग्विजय और अमृता राय ने, और अमृता राय से बरसों से अलग रह रहे, और आपसी सहमति के तलाक के मुकदमे से गुजर रहे अमृता के पति ने जो बातें सार्वजनिक रूप से ट्वीट की हैं, उनसे यही तस्वीर बनती है कि इन संबंधों में न कोई बात गैरकानूनी है, और न, हमारे हिसाब से, अनैतिक ही है। लेकिन दिग्विजय सिंह इस चर्चा से बच इसलिए नहीं सकते क्योंकि उन्होंने पिछले एक बरस में अनगिनत बार नरेन्द्र मोदी की पत्नी को लेकर इतने किस्म के गैरजरूरी सवालों को, उनकी पत्नी के लिए एक हैरतअंगेज हमदर्दी के साथ उछाला था, कि उन्होंने निजी जिंदगी के सार्वजनिककरण का सिलसिला खुद ही शुरू किया था। इसलिए आज जब उनको लेकर कुछ कड़वे सवाल खड़े किए जा रहे हैं, और कुछ तस्वीरें हवा में तैर रही हैं, तो इन तस्वीरों की गोपनीयता के खिलाफ की जा रही हरकत को तो हम गलत मानते हैं, लेकिन दिग्विजय से पूछे जा रहे सवाल नरेन्द्र मोदी पर उन्हीं के किए हुए हमलों का एक बहुत जायज जवाब है।
अब लगे हाथों इस मामले जैसे कई दूसरे मामलों के बारे में देखें, तो याद पड़ता है कि अलग-अलग बहुत से राजनीतिक दलों में समय-समय पर ऐसे नेता रहते आए हैं जिन्होंने अपनी निजी जिंदगी को देश और काल के उस वक्त के सामाजिक तकाजों से परे ले जाकर अपनी मर्जी से जिया था, और नाम या बदनाम जो भी होना था, उसे झेला था। जवाहर लाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन की मोहब्बत किताबों और खतों में दर्ज है, और उसी तरह भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी की निजी जिंदगी से लेकर उनकी दत्तक पुत्री और दत्तक दामाद को उनके प्रधानमंत्रित्व काल में दिए गए सरकारी और कूटनीतिक दर्जे की बात सबके सामने है। भाजपा के कई लोग आज दिग्विजय सिंह पर हल्ला बोल रहे हैं कि अपनी पत्नी के बीमार रहते हुए उन्होंने एक शादीशुदा महिला से संबंध बनाए। लेकिन दूसरी तरफ देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी की जिस महिला मित्र की बात अनगिनत जगह दर्ज है, वे भी एक शादीशुदा महिला थीं, और अटल बिहारी वाजपेयी तो उस परिवार में मेहमान के तौर पर रहने गए थे, और फिर उसी परिवार के होकर रह गए। यह बात उस शादीशुदा जोड़े और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच की थी, और ठीक उसी तरह दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र का मामला है, इन दोनों परिवारों के बीच जब तक कोई शिकायत न उठे, तब तक किसी को इस रिश्ते के बारे में बोलने का क्या हक है?
दरअसल हिन्दुस्तान ही नहीं, दुनिया के बड़े-बड़े उदार समाज माने जाने वाले देशों में भी लोगों के पैमाने अपने नेताओं के लिए बहुत अलग हो जाते हैं। बहुत से देशों में शादीशुदा जिंदगी से परे के रिश्तों को लेकर लोगों को सरकारी कुर्सियां छोडऩी पड़ी हैं, मुकदमे झेलने पड़े हैं। लेकिन हमारी सोच इस बारे में बिल्कुल साफ है। जब तक किसी कुर्सी के असर के तहत, उसके इस्तेमाल से किसी का शोषण न हो, तब तक हम दो वयस्क लोगों के बीच किसी भी तरह के संबंधों को गलत नहीं मानते। हर किसी को अपनी निजी जिंदगी को अपनी तरह से जीने का हक होना चाहिए। हिन्दुस्तान में ही कानून के तहत तमाम लोगों को एक से अधिक शादी का भी हक है, बशर्ते उनके जीवन-साथी को इससे शिकायत न हो। सरकारी कर्मचारियों के लिए ऐसी नौबत आने पर कुछ औपचारिकताओं की जरूरत रहती है, लेकिन जीवन-साथी को मंजूर होने पर वे भी दूसरी शादी कर सकते हैं।
दिग्विजय सिंह की यह बात आज खबरों में भी शायद नहीं आती अगर चुराई गई उनकी निजी तस्वीरों को इंटरनेट पर फैलाया नहीं गया होता। उन्होंने इस पर साफ-साफ जवाब देकर एक सही काम किया है, और जिन लोगों को यह लग रहा है कि वे अपनी बेटी की उम्र की महिला से शादी करने जा रहे हैं, वे यह बात भूल जाते हैं कि अपने से पचीस बरस कम उम्र की महिला से शादी करने वाले न वे पहले नेता होंगे, और न ही अकेले। एक पत्नी के जीते जी, दूसरी शादियां करने वाले भी बहुत से नेता मौजूद हैं। और भाजपा के जो लोग यह सवाल उठा रहे हैं, क्या वे आन्ध्र के एन.टी. रामाराव के दामाद चन्द्राबाबू नायडू से उनके ससुर की दूसरी-तीसरी शादी के बारे में इसी जुबान में बात करना चाहेंगे? या तमिलनाडू में डीएमके से समर्थन मांगते हुए भाजपा के नेता करुणानिधि से पत्नियों की गिनती पूछेंगे? अभी-अभी जिस रामविलास पासवान का साथ भाजपा ने हासिल किया है, उनके बारे में क्या भाजपाई यह पूछेंगे कि उन्होंने चुनाव घोषणा पत्र में कितनी पत्नियों का नाम लिखा है, और पहली कम पढ़ी-लिखी देहाती पत्नी कहां है?
हिन्दुस्तानियों को बेहूदी बातों से बचना सीखना चाहिए। दूसरों के बारे में जब चटपटी बात करने का मौका मिलता है तो यहां के लोग इस तरह टूट पड़ते हैं कि मानो उनके कुनबे में न कभी ऐसा चटपटा कुछ हुआ हो, और न कभी आगे चलकर होगा। ओछी बकवास की यह लुभावनी परंपरा आगे बढ़ाते हुए लोगों को याद रखना चाहिए कि उनके परिवार के लोगों के बारे में भी ऐसी बात की नौबत आ सकती है, और अगर कम्प्यूटर और ई-मेल बॉक्स में सेंधमारी करके उसकी जानकारी का इस्तेमाल जायज है, तो फिर ऐसा इस्तेमाल हर पांच-दस जिंदगियों में से एक को तबाह कर सकता है। गैरजरूरी और गैरमुनासिब सवाल न तो मोदी से दिग्विजय को करने थे, और न ही आज दिग्विजय से किसी और को करने चाहिए। एक वक्त था जब नेहरू से लेकर अटल बिहारी तक की निजी जिंदगी गंदे सवालों से परे रखी गई थी, और निजी जिंदगी की वैसी ही इज्जत आज भी की जानी चाहिए।

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