बच्चों की खुशी को एक अलग ऊंचाई तक ले जाने की जरूरत

15 जुलाई 2026  

 

भारत में पेंसिल का एक इश्तहार चल रहा है जिसमें पेंसिल पर बच्चे का नाम छपकर आया है। ऐसा नाम छापकर सामान देना डायरी, पेन, पेनस्टैंड जैसे कई सामानों में होते आया था, अब यह बच्चों की पेंसिल तक पहुंच गया है। इश्तहार में बच्चे के मां-बाप यह कहते हुए सुनाई पड़ते हैं कि अपने नाम की पेंसिल देखकर वह इतना खुश हो गया कि मानो वह मेरिट में आया हो। अब तक बच्चों को ऐसे टी-शर्ट पहनते देखा था जिसमें उन्हें नानी का लाड़ला, या दादा की लाड़ली जैसे शब्द छपे रहते थे। अब स्कूल में इस्तेमाल होने वाली पेंसिल उनके नाम सहित आने लगी। इसमें दिक्कत कुछ नहीं है, कंपनियां मुफ्त में, या बहुत मामूली से भुगतान पर यह काम कर देती होंगी, लेकिन बच्चों की खुशी पेंसिल पर अपना नाम देखकर है। इसमें भी वैसे तो कोई बुराई नहीं है क्योंकि बड़े लोग अपने मोबाइल फोन पर घर के छोटे बच्चों की फोटो स्क्रीन पर लगा रखते हैं, कारों के पीछे बच्चों के नाम लिखवा लेते हैं। लेकिन एक छोटी सी बात यह खटकती है कि बच्चों को खुशी किस तरह की सिखाई जाती है? क्या किसी सामान पर उनका नाम लिखा होने से उनका खुश हो जाना काफी है, या फिर इससे अधिक भी, इससे बेहतर भी कुछ ऐसा होना चाहिए कि जिससे उनकी खुशी जुड़ी हुई हो। 

जापान की बात अक्सर सुनाई और दिखाई पड़ती है कि वहां के स्कूलों में बच्चों को शुरुआत में पढऩा-लिखना तो सिखाया ही नहीं जाता है, अपनी क्लास की सफाई, और बच्चों के साथ काम करना, स्कूल के कर्मचारियों के प्रति सम्मान रखना, किसी से भी मिली मदद के एवज में शुक्रगुजार होना उन्हें सिखाया जाता है। भारत के बच्चों को जिन बातों के लिए घर, स्कूल, या दूसरी जगहों पर कर्मचारियों की सेवा हासिल रहती है, और उनसे यह उम्मीद भी नहीं की जाती कि वे धन्यवाद, या शुक्रिया जैसा एक शब्द कहें, या थैंक्स कह दें। विनम्रता, कृतज्ञता का शिक्षण-प्रशिक्षण कम ही दिखता है। इंटरनेट पर ऐसे बहुत से वीडियो दिखते हैं जिनमें जापानी बच्चे ट्रैफिक सिग्नल की इजाजत मिलने पर भी जब जेब्रा लाईन पर चलते हुए सडक़ पार करते हैं, तो वे दोनों तरफ रूकी हुई गाडिय़ों की तरफ झुककर उनका शुक्रिया भी अदा करते हैं। जापानी संस्कृति को देखें तो लोग बात-बात में झुककर एक-दूसरी से कभी माफी मांगते दिखते हैं, तो कभी अहसान का शुक्रिया जताते। जापानी रेलवे स्टेशनों पर अगर ट्रेन कुछ सेकेंड लेट हो जाती है, तो रेल कर्मचारी मुसाफिरों से माफी मांगते दिखते हैं। 

अभी ऐसी कई तस्वीरें देखने मिलीं जिनमें जापान के किसी कारखाने से कोई मशीन अपनी जिंदगी पूरी करके अब बिदा हो रही है। और उस मशीन के सामने सारे कर्मचारी झुककर उसका आभार मान रहे हैं कि उसने इतने बरस कारखाने की सेवा की, साथ में काम करने वाले लोगों का काम आसान किया। और सम्मान के साथ उस मशीन को बिदा किया जाता है जो कि हो सकता है सीधे कबाड़ी के पास जा रही हो, या किसी कारखाने में उसे पिघलाया जाने वाला हो। वैसे तो एक बड़ी संभावना यह भी रहती है कि जापान जैसे विकसित देश में अपनी पूरी जिंदगी काम कर चुकी मशीन भारत जैसे देश में आकर और दस-बीस बरस इस्तेमाल हो जाए, लेकिन भारत में आने पर ऐसी मशीन का स्वागत तो हो जाएगा, लेकिन यहां के कारखानों से बिदा होने वाली किसी मशीन का उपकार माना जाए, उसके सामने झुककर सम्मान से उसकी बिदाई की जाए, ऐसी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। 

अपनी संस्कृति पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन और अधिक गर्व करने के लिए संस्कृति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, यह सोचना और भी अच्छी बात हो सकती है। अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं में लोगों की सोच भी अलग-अलग रहती है, और दूसरों के साथ व्यवहार भी अलग-अलग किस्म का रहता है। अंग्रेजी बोलते हुए लोग किसी व्यक्ति से बात शुरू करने पर जिस तरह एक्सक्यूज मी कहकर ध्यान खींचते हैं, उर्दू बोलने वाले लोग माफ कीजिएगा कहकर सिलसिला शुरू करते हैं, वह हिन्दी जैसी खड़ी बोली में है ही नहीं। जो अंग्रेजी या उर्दू बोलते हैं, वे लोग अगर हिन्दी भी बोलते हैं, तो उनमें से कुछ लोग दूसरी भाषाओं से सीखा हुआ धन्यवाद हिन्दी में बोल सकते हैं, लेकिन सिर्फ हिन्दी बोलने वाले लोगों के बीच शिष्टाचार, और कृतज्ञता के ऐसे शब्दों का चलन कुछ कम है। भारत की कुछ दूसरी भाषाओं में अगर नरमी कुछ अधिक होगी, तो अच्छी बात होगी, हमारी समझ की सीमित भाषाओं में हिन्दी शिष्टाचार के लिए बाकी दो भाषाओं के मुकाबले कुछ विपन्न लगती है। 

भाषा से परे भी बच्चों को एक बेहतर सोच देने की जरूरत है। उनके नाम की पेंसिल ठीक है, लेकिन क्या उन्हें यह सिखाने की कोशिश होती है कि आसपास के दूसरे बच्चों के पास अगर पेंसिल नहीं है, तो उन्हें अपनी पेंसिल उन्हें देना चाहिए? इसी तरह आसपास के कामगारों का सम्मान करना, उनके किए गए काम के लिए उनके अहसानमंद होना, ऐसी बुनियादी बातें सिखाना पेंसिल पर नाम के बजाय बहुत अधिक जरूरी है। खासकर संपन्न बच्चों को विनम्र बनाने के लिए जो मेहनत की जानी चाहिए, उससे तो उनके मां-बाप भी अनजान लगते हैं। हमने शायद कुछ ही दिन पहले बच्चों के सामने इस्तेमाल की जाने वाली भाषा के बारे में लिखा था। अब अगर मां-बाप और परिवार के बड़े लोगों में ही प्रकृति, मददगार-कामगारों के प्रति कृतज्ञता की जरूरत नहीं दिखेगी, तो बच्चे तो अपने नाम की पेंसिल पाकर खुश रहेंगे। 

कुछ स्कूली बच्चों के बीच अंग्रेजी का एक वाक्य सुनने मिला, शेयरिंग इज केयरिंग। मतलब यह कि अपने सामान को दूसरों के साथ बांटना ही दूसरों की फिक्र करना होता है। बात अच्छी है, लेकिन किसके साथ शेयर किया जाए, किसकी केयर की जाए, यह दायरा बच्चों को समझाना उससे कहीं अधिक जरूरी है। बिना सामाजिक चेतना दिए, बच्चों को यह लग सकता है कि सिर्फ अपने भाई-बहनों के साथ किसी चीज को शेयर करना काफी है। इतनी सामाजिक जागरूकता सिखाना भी जरूरी है कि अपनी नजरों में जो जरूरतमंद दिखते हैं उनसे कोई रिश्ता हुए बिना भी उनके साथ अपनी चीजों, और अपनी सहूलियतों को बांटना। 

भारत में लोगों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने बच्चों को अधिक से अधिक सहूलियतें देकर उन्हें खुश रखना काफी मानते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसमें गर्व की भी कोई बात नहीं है। गर्व की शुरूआत वहां से हो सकती है जहां से बच्चे दूसरों का सम्मान, दूसरों की मदद, दूसरों का अहसान करना और मानना शुरू करें। अनजान लोग, अनजान ट्रैफिक, अनजान मशीन का भी सम्मान करने की सोच जब विकसित होती है, तब जाकर लोग बेहतर इंसान बनते हैं। भारत के लोगों को जापान की मिसालें तो देखनी ही चाहिए, यह भी देखना चाहिए कि योरप के, खासकर स्केंडेनेवियन कहे जाने वाले देशों से क्या सीखा जाए। फिनलैंड, डेनमार्क, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन जैसे देशों में बच्चों को बेहतर इंसान बनाने, उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ बनाने, उन्हें विनम्र और दरियादिल बनाने की जो कोशिशें होती हैं, वे भारत के कम सुविधाओं वाले स्कूलों में चाहे न हो सकें, वे परिवारों में तो हो ही सकती हैं। पशु-पक्षियों, प्रकृति, और अपने से परे के भी लोगों के प्रति दया सिखाना आसान तो नहीं है, लेकिन उसी से ही लोग अपनी अगली पीढ़ी को बेहतर बना सकते हैं। स्कूलों के इम्तिहानों का एक सीमित महत्व रहता है, उन्हें ही सब कुछ मानकर, अच्छे नंबर लाने को ही कामयाब और अच्छा इंसान मान लेना एक सीमित सोच और तंग नजरिए की बात होगी। बच्चों को कामयाब बनाने से कहीं अधिक जरूरी उन्हें दयालु बनाना है। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, और मां-बाप के लिए पढ़ाई में बच्चों को अव्वल लाने के मुकाबले अधिक बड़ी चुनौती भी हो सकती है।

(Daily Chhattisgarh)   

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