गार्ड का कत्ल करके भाग निकले नाबालिगों को देख अधिक फिक्र की जरूरत..

13 जुलाई 2026  

 

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कल एक भयानक घटना हुई। जुर्म के मामलों में बंद किए गए नाबालिगों के बाल संप्रेक्षण गृह में गार्ड का कत्ल करके चार लडक़े भाग निकले। ये चारों गंभीर अपराधों में यहां बंद थे, और चूंकि ये बालिग नहीं थे, इसलिए साधारण जेल में उन्हें नहीं रखा गया था, और बाल संप्रेक्षण गृह में उनके सुधार की उम्मीद की जा रही थी। यहां बंद बहुत से लडक़े बलात्कार और हत्या जैसे मामलों में शामिल रहे हैं, इनकी अदालत भी अलग होती है, और सजा भी बालिग लोगों के मुकाबले अलग रहती है। छत्तीसगढ़ में जगह-जगह बाल संप्रेक्षण गृह से फरारी होती ही रहती है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही एक जिले से खिडक़ी तोडक़र 11 लडक़े भाग निकले थे। लेकिन बिलासपुर, जहां पर कि छत्तीसगढ़ का हाईकोर्ट भी है, वहां शहर के भीतर के बाल संप्रेक्षण गृह में हत्या करके फरार हो जाना एक भयानक हालत का संकेत है। आमतौर पर हाईकोर्ट वाले शहर में सभी विभागों के अफसर कुछ अधिक चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि जजों को स्थानीय खबरों में जो गंभीर खामियां पढऩे मिलती हैं, उन पर कई बार हाईकोर्ट के नोटिस जारी हो जाते हैं। इसके बाद भी इस केन्द्र में यह गंभीर जुर्म होना कुछ हक्का-बक्का भी करता है। 

बाल संप्रेक्षण गृहों के साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि वहां रखे गए नाबालिग कोई सजा नहीं पाते रहते, उन्हें वहां बस रखा जाता है, और कागजों पर यह उम्मीद की जाती है कि उनके सुधार की कोशिश की जाएगी। बालिग लोगों की जेल में तो बहुत से लोगों को सश्रम कारावास दिया जाता है, जिसमें उनसे मेहनत भी करवाई जाती है। लेकिन बाल सुधार गृह, या बाल संप्रेक्षण गृह की सीमा सिर्फ सुधार तक सीमित रहती है, लेकिन आमतौर पर ऐसी जगहों का जो हाल सुनाई देता है, वह यहां रखे गए बच्चों के, नाबालिगों के अधिक गंभीर मुजरिम होकर निकलने का दिखता है। हर बरस आधा-एक दर्जन जिलों के बाल सुधार गृहों में ऐसी वारदात सुनाई पड़ती है जिससे पता लगता है कि वहां रखे गए लडक़ों (लड़कियों के लिए अलग इंतजाम होगा, वहां की ऐसी खबरें नहीं आती हैं) के बीच हिंसा, और फरारी होती रहती है। जब सरकारी और कानूनी इंतजाम के तहत ऐसा होता है, तो यह जाहिर है कि उनका सुधार इस इंतजाम में नहीं हो सकता। वहां पर आम जेलों की तरह जो उम्र में बड़े, बदन से अधिक ताकतवर, और अधिक बड़ा जुर्म करके आए लडक़ों की धाक चलती होगी, और उसके चलते किसी सुधार की संभावना तो हो नहीं सकती। नाबालिग से बालिग होने के बीच का यह दौर अगर जुर्म और हिंसा के ऐसे माहौल में कैद होकर गुजरना है, तो बाल सुधार गृह की पूरी सोच पर एक बार फिर विचार करने की जरूरत है। उम्र का यह नाजुक दौर अगर अधिक गंभीर जुर्म की तरफ ले जा रहा है, तो यह समाज को किसी हिंसा या जुर्म से मुक्त कराने के बजाय किसी के गहरे खतरे में धकेलने का इंतजाम है। 

जो बच्चे कानून के साथ टकराव करते हुए पाए जाते हैं, वे पहले से घर-बार से बेकाबू, पढ़ाई-लिखाई से अक्सर छूटे हुए, और महत्वाकांक्षाविहीन बच्चे रहते हैं। वे जुर्म की संगत में आकर गंभीर जुर्म करने लगते हैं, या कर बैठते हैं। आज तो देश में सुप्रीम कोर्ट से लेकर अलग-अलग कई हाईकोर्ट तक इस बात पर गौर किया जा रहा है कि बलात्कार और हत्या जैसे संगीन जुर्म में शामिल नाबालिगों पर बालिगों की तरह मुकदमा चलाया जाए, या मौजूदा रियायत जारी रखी जाए। निर्भयाकांड से लेकर दूसरे बहुत से मामलों तक यह देखने में आया है कि गैंगरेप के कई ऐसे मामले रहे हैं जिनमें सबसे भयानक हिंसा किसी नाबालिग ने की है। जुर्म के मनोविज्ञान को समझने वाले लोग इस बात को बेहतर बता सकते हैं कि बालिग मुजरिमों के साथ जुर्म में शामिल नाबालिग उनसे भी अधिक हिंसक क्यों होते हैं? क्या उन पर अपने से बड़ों से बड़ा होकर दिखाने का एक मानसिक दबाव रहता है, गिरोह के दूसरे लोगों की कोई चुनौती रहती है, या फिर अपने को बड़ा ताकतवर मुजरिम साबित करने का अहंकार रहता है? भारत में इस पूरे सिलसिले को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। समाज और सरकार के पास दूसरी प्राथमिकताएं और चुनौतियां हैं। इन दोनों में से किसी की यह परवाह नहीं रहती कि नाबालिग बच्चों की पढ़ाई-लिखाई छूट जाने के बाद वे क्या कर रहे हैं, उनकी संभावनाओं का क्या हो रहा है? समाज इनके अस्तित्व को उसी समय देखता है जब ये किसी संगीन जुर्म में फंस जाते हैं, और इनका नाम खबरों में न लेकर, इन्हें अपचारी बालक, नाबालिग आरोपी, कानून से टकराव ले रहे लडक़े जैसी भाषा में लिया जाता है। मानो कानून की यह रियायत, कि इनकी शिनाख्त छुपाई जाए, यही समाज का उन पर उपकार है, और कानून ने इन्हें यही छूट दी है। लेकिन शिनाख्त उजागर न होने के अलावा क्या आज की सरकारी और कानूनी व्यवस्था में ऐसी नाबालिग पीढ़ी का कुछ भला भी होता है? 

जहां पर सुधारगृहों में रखे गए नाबालिग वहां से तरह-तरह से फरार होने में लगे रहते हैं, तरह-तरह की हिंसा करते हैं, और अभी कल का यह कत्ल तो और भी भयानक है, ऐसे नाबालिगों को कहने के लिए कोई सजा नहीं दी जाती है, सिर्फ वहां रखकर उनके सुधार की कोशिश की जाती है, लेकिन सच तो यह है कि उस माहौल में किसी सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। जब देश की बड़ी-बड़ी चर्चित जेलों में बड़े-बड़े नामी-गिरामी मुजरिमों के कत्ल हो जाते हैं, तो उससे यही साबित होता है कि देश की सुधार-व्यवस्था बेअसर है। बालिगों की जेल से भी बहुत से लोग अधिक बड़े मुजरिम होकर निकलते हैं, और कल-परसों ही पॉक्सो एक्ट में बच्चे से बलात्कार के एक आरोपी ने जमानत मिलने पर जेल से छूटते ही उस शिकायतकर्ता लडक़ी के परिवार, और अपने खुद के परिवार के 6 लोगों को मार डाला। जेल किसी को सुधार कर बाहर निकालता हो, ऐसा लगता नहीं है। और इससे भी खराब हालत बच्चों की ‘जेल’ या कानूनी जुबान में सुधारगृह, या संप्रेक्षण गृह का रहता है। 

यह शायद सही समय है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट अपने साये में हुई इस घटना पर राज्य सरकार से जवाब मांगे कि बीते बरसों में इन सुधारगृहों की क्या हालत रही है, वहां कैसी-कैसी घटनाएं, और वारदात हुई हैं, क्या सरकार ने किसी बाहरी स्वतंत्र संस्था से यह ऑडिट करवाया है कि ऐसे संप्रेक्षण गृह बच्चों को सुधारने, बेहतर बनाने, और जुर्म से दूर ले जाने के लायक बने हैं, या फिर सरकार और समाज अपनी बला टालने के लिए कानून से टकराने वाले बच्चों को कुछ साल यहां बंद करके अपनी आंखों से दूर कर देना चाहते हैं? समाज और सरकार को यह समझ लेना होगा कि इन बरसों के बाद अगर ये बच्चे अधिक खूंखार, या अधिक बड़े मुजरिम बनकर निकलेंगे, तो वे समाज के लिए बालिग मुजरिमों के मुकाबले भी कुछ अधिक बड़ी समस्या रहेंगे। इसलिए समाज को अगर महफूज रहना है, तो जुर्म की राह पर चल निकले बच्चों और बाकी नाबालिगों के सुधारगृहों को बेहतर और असरदार बनाना होगा। इस काम को खर्चीला मानना गलत होगा, यह समाज की भविष्य की सुरक्षा की बीमा पॉलिसी का प्रीमियम ही रहेगा। यहां पर कटौती और अनदेखी भविष्य को खतरे में डालने के अलावा, और कुछ नहीं होंगी।

(Daily Chhattisgarh)   

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