जंतर-मंतर की लड़कियों से गैंगरेप सुझाने वाला विचारक!

28 जुलाई 2026  

 

ठीक जिस समय आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत समलैंगिकों के प्रति सहनशीलता रखने की बात कर रहे थे, और यह मान रहे थे कि एलजीबीटीक्यू लोगों में से कुछ को प्रकृति ने ही वैसे बनाए हैं, ठीक उसी समय केरल के आरएसएस के एक बड़े पुराने, बुजुर्ग, और प्रमुख विचारक टी.जी.मोहनदास कह रहे थे कि उनके काबू में होता, तो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर गोलियां चला देते, और वे जब मर जाते, तो उन्हें अस्पताल पहुंचा देते। यही नहीं उन्होंने इस आंदोलन में शामिल लड़कियों और महिलाओं के लिए कहा कि इस प्रदर्शन में आने वाली महिलाओं को गैंगरेप से भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ये लोग बलात्कार पसंद करती हैं। उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट करके ये बातें कहीं, और कहा कि वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाली ये आंदोलनकारी महिलाएं बलात्कार पसंद करती हैं। इस बयान से आरएसएस ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वह ऐसे बयानों की कड़ी निंदा करता है। संघ ने यह भी कहा कि मोहनदास अभी संघ में किसी जिम्मेदारी के पद पर नहीं है। लेकिन इसके पहले का मोहनदास का परिचय बताता है कि वे आरएसएस के कई संगठनों में अलग-अलग पदों पर रह चुके हैं, और भाजपा के भी बौद्धिक प्रकोष्ठ के केरल राज्य संयोजक थे। वे इसके पहले भी हिन्दुत्व के मुद्दों को लेकर अदालती लड़ाई भी लड़ते रहे हैं। वे लगातार लिखते हैं, और उनके लेख संघ परिवार के प्रकाशनों में छपते रहते हैं। 

ये बुजुर्ग विचारक तो इन बातों को कैमरे के सामने यूट्यूब पर बोलकर उजागर हो गए हैं, लेकिन लोग तरह-तरह से आंदोलनकारियों के खिलाफ हिंसक बातें कर रहे हैं। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले वीडियो में आंदोलनकारियों को शांत कर रहे हैं, दूसरे वीडियो में उनका आभार मान रहे हैं, सरकार के बड़े-बड़े मंत्री आंदोलनकारियों से बातें कर रहे हैं, उनका अनशन खत्म करवा रहे हैं, उनकी मांग पूरी करते हुए अपने मंत्री का इस्तीफा ले रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, या उसके हमखयाल लोगों की प्रतिक्रिया अब तक बहुत ही अश्लील और हिंसक तरीके से जारी है। एक तरफ तो इतने बड़े आंदोलन के सामने सरकार को, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो झुकना पड़ा, और परदे के पीछे की कोई नूरा कुश्ती रही होगी, तो हम अभी परदा हटाकर देख नहीं सकते, दूसरी तरफ सरकार के साथी या हिमायती माने जाने वाले लोग आंदोलनकारियों के बारे में जिस जुबान में बातें कर रहे हैं, उनसे सरकार का ही बड़ा नुकसान हो रहा है। अगर ये लोग गोलियों से मार डालने लायक थे, अगर इस आंदोलन की लड़कियां और महिलाएं सामूहिक बलात्कार के लायक थीं, अगर ये लोग देशद्रोही हैं, गद्दार हैं, पाकिस्तानी एजेंट हैं, तो फिर सरकार ने इनसे बात क्यों की थी? एक तरफ तो सरकार ने वक्त रहते इस आंदोलन को सुलझाने की, लचीलापन दिखाने की वाहवाही पाई है। दूसरी तरफ इस आंदोलन की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं है कि लुके-छिपे अंदाज में ये खबरें आ रही हैं कि दिल्ली और बिहार में आंदोलनकारियों पर कितने किस्म के जुर्म दर्ज किए जा रहे हैं। सरकारी एजेंडे पर सार्वजनिक रूप से बोलने वाले अश्लील और हिंसक बातें कर रहे हैं। इससे सरकार ही कमजोर साबित हो रही है कि अगर आंदोलनकारी इतने ही बुरे और घटिया थे, तो सरकार उनसे बात करके उनकी मांगों पर झुकी क्यों? और मंत्रियों से इस्तीफा न लेने की अपनी परंपरा को छोड़ा क्यों? अभी तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का वह वीडियो चारों तरफ तैर ही रहा है जिसमें वे कहते दिख रहे हैं कि यह यूपीए सरकार नहीं है, इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते। 

अब सरकार की फजीहत, और आंदोलनकारियों को अपमानित करके उकसाने से परे की बात अगर हम करें, तो केरल के इस हिन्दुत्व-आंदोलनकारी बुजुर्ग के बारे में भी सोचने की जरूरत है। यह लगातार संघ के संगठनों के ओहदों पर रहा, संघ के प्रकाशनों में लिखता रहा, और उम्र के इस पड़ाव पर आकर अगर वह ऐसी हिंसक और अश्लील बातें कर रहा है, तो इस विचारधारा के लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि सारी उम्र इसमें गुजार देने के बाद भी इस आदमी की सोच ऐसी है, तो दिक्कत कहां पर है? किसी भी संस्था, संगठन, या विचारधारा के लिए यह परले दर्जे की शर्मिंदगी की बात रहती है कि उसे अपने एक सबसे ही सक्रिय बुजुर्ग को धिक्कारना पड़े, उसकी कड़ी निंदा करनी पड़े। ऐसा संगठन के या विचारधारा के कोई नए लोग करें, तो भी समझ पड़ता है। जब संगठन के अपने इलाके के भीष्म पितामह ऐसा करने लगें, तो सारे कुल का अपमान होता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हर कुछ हफ्तों-महीनों में उदारता की कोई एक बात कहकर खबरों में रहते हैं, लेकिन इस दर्जे की अलोकतांत्रिक और हिंसक बात कहने वाले उनके अपने पुराने स्तंभों की सोच पर संगठन को कुछ और विचार भी करना चाहिए। जिस भारत में देश की प्रतीक ही भारतमाता कही जाती है, जहां पर देवियों की प्रतिमाओं की पूजा की परंपरा देश भर में है, वहां पर जीती-जागती छात्राओं को सामूहिक बलात्कार का मजा लेने वाली कहना सिर्फ निंदा और धिक्कार से दब जाने वाली बात नहीं है। इस बारे में केरल के किसी पदाधिकारी से ऊपर भी संघ के किसी को कुछ, कुछ अधिक कहना चाहिए। 

देश में जिस पार्टी, संगठन, या विचारधारा के समर्थक या अनुयायी लोकतंत्र के खिलाफ, देश के संविधान के खिलाफ, मानवता के खिलाफ बातें करते हैं, उनके खिलाफ धिक्कार उनके घर से निकलना चाहिए। ऐसे लोगों की निंदा बाकी समाज को करनी पड़े, और ये लोग खुद चुप बैठे रहें, तो इस चुप्पी से इनका सम्मान नहीं बढ़ता। अभी जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी नौजवानों में से कुछ के पोस्टर लोगों को बहुत बुरे लगे कि उनमें प्रधानमंत्री या दूसरे नेताओं के लिए अलग-अलग किस्म की गालियां इस्तेमाल की गई थीं। हजारों लोगों ने गालियों की इस जुबान को जमकर कोसा, और उसके जवाब में उससे भी गंदी गालियां भी दे डालीं। लेकिन इसी मौके पर कई लोगों ने यह भी याद दिलाया कि लोकसभा के भीतर भाजपा का एक सांसद जब एक दूसरे मुस्लिम सांसद को देशद्रोही और आतंकी कह रहा था, उसके धर्म का नाम लेकर गंदी, अश्लील, और हिंसक गालियां बक रहा था, तब हर्षवर्धन, और रविशंकर प्रसाद नाम के दो भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री उसके अगल-बगल बैठे मजा ले रहे थे, जोर-जोर से हँस रहे थे। अब जंतर-मंतर के नौजवानों ने इतनी गालियां कहां से सीखीं, तो इसके जवाब में लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि लोकसभा में भाजपा के सांसद रमेश विधुड़ी की दी हुई गालियां सुनकर नौजवानों ने भी अपनी गालियों को संसदीय माना। 

गंदी मिसालें किसी संगठन, संस्था, विचारधारा का सम्मान नहीं बढ़ातीं, बल्कि विरोधियों के लिए एक मिसाल छोड़ जाती हैं, और देश की जनता में जो सभ्य हिस्सा है, उसके बीच सम्मान खत्म करवा देती हैं। जो विचारधारा अपने आपको महान बताए, उसे तो अपने लोगों पर बेहतर काबू रखना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में गंदगी का सिलसिला खत्म करना चाहिए। अगर किसी को यह लगता है कि ताजा आंदोलनकारी पीढ़ी, जेन-जी किसी की दी हुई गंदी गालियों को सुनकर चुप रह जाएगी, तो उन्हें इस खुशफहमी से बाहर आ जाना चाहिए। यह पीढ़ी इस मोहनदास की बुढ़ापे की इज्जत को ठिकाने लगाने की ताकत अपनी चुटकियों पर रखती है। इस आदमी को लड़कियों के गैंगरेप की बात करने के पहले इतना तो सोचना था कि इसके माँ-बाप ने इसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी की तरह मोहनदास रखा था, किसी और बात की, अपने संगठन की इज्जत न भी रखनी होती, तो भी कम से कम गांधी के नाम की इज्जत तो रखनी थी। हालांकि सब कुछ जानते हुए हमें यह उम्मीद करनी नहीं चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

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