एक जिम्मेदार लोकतंत्र असहमति के बाद भी आंदोलनों से सीखता है

24 जुलाई 2026  

 

जंतर-मंतर अपने नाम से ही कुछ रहस्यमय किस्म की चीज या जगह लगती है। ऐसा लगता है कि किसी मंत्र पढऩे की जगह होगी। आज वहां बीते एक दशक से अधिक वक्त का सबसे बड़ा मंत्र पढ़ा जा रहा है। छात्र, नौजवान, बेरोजगार तो वहां पर तिलचट्टे बनकर दसियों हजार की संख्या में इकट्ठे हैं, या पहुंचते जा रहे हैं, आ-जा रहे हैं। उनसे परे भी उनके परिवारों के लोग, और दूसरे बहुत से ऐसे बुजुर्ग लोग भी वहां पहुंच रहे हैं जो इस धारणा से सहमत हैं कि इस देश में छात्रों और बेरोजगारों के साथ बेइंसाफी और बेइमानी हो रही है। एक अपार, अभूतपूर्व, और असाधारण जनसमर्थन का सैलाब इन आंदोलनकारियों के पक्ष में जुट गया है। यह पूरा जनसैलाब अब न तो बीती रात आधी रात तक अनशन कर रहे लद्दाखी सामाजिक आंदोलनकारी सोनम वांगचुक का मोहताज रह गया, और न ही कॉकरोच जनता पार्टी लाँच करने वाले अभिजीत दीपके का। कॉकरोच जनता पार्टी वैसे भी कोई पार्टी नहीं थी, वह तो भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ नौजवानों का व्यंग्यात्मक विद्रोह था जो कि आज पिछले एक दशक के सबसे बड़े आंदोलन की शक्ल लेते दिख रहा है। दिल्ली सरहद पर किसानों का आंदोलन संगठित, गठा हुआ, एक जगह सीमित आंदोलन था, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन अपने नाम और मिजाज के मुताबिक देश की हर नाली-गली तक पहुंच गया है। कई प्रदेशों में दर्जनों शहरों में तिलचट्टा-आंदोलन का विस्तार हो रहा है, और कल मुम्बई में एक पुलिस लॉरी जो कि शायद आंदोलनकारियों को ले जा रही थी, उसे सामने खड़े होकर बलपूर्वक रोकती हुई एक आधुनिक मॉडल युवती की जो तस्वीर सामने आई है, वह चीन में थ्यानमान चौक पर टैंकों के सामने खड़े एक युवक की याद दिलाता है। और कल से सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर इस युवती का यह फोटो ट्रेंड कर रहा है। हम इस आंदोलन पर पिछले हफ्ते में दो-चार लिख और बोल चुके हैं, इसलिए आज इसके पीछे की वजहों, इस आंदोलन के वक्त देश की लोकतांत्रिक स्थितियों, और किसी भी जिम्मेदार लोकतंत्र में ऐसी नौबत के समाधान को लेकर बात करना चाहते हैं।

बीते कई महीनों से देश में नीट इम्तिहान, और दूसरे दाखिला या नौकरी इम्तिहानों के भ्रष्टाचार को लेकर छात्र और नौजवान पीढ़ी, और बहुत हद तक उनके लिए जिम्मेदार उनके माँ-बाप भी बहुत विचलित चले आ रहे थे। लेकिन केन्द्र सरकार की कार्रवाई बहुत ही सीमित थी, और ऐसा लगता है कि सरकार को अभी कुछ हफ्ते पहले तक यह लगा ही नहीं था कि निराश और नाराज छात्रों की कोई ऐसी एकजुटता हो सकती है। यही वजह रही कि सरकार के लोग, सत्तारूढ़ पार्टी के लोग, और उनके दरबारी चारण और भाट लगातार छात्र-छात्राओं को गद्दार, देशद्रोही, विदेशी फंड पाने वाले, और टुकड़े-टुकड़े गैंग करार देते रहे। अभी दो दिन पहले एक राजकीय गीतकार ने भी कुछ ऐसी ही जुबान में आंदोलनकारियों के खिलाफ पोस्ट किया है। एक तरफ तो सरकार एक बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती झेल रही है, दूसरी तरफ उसकी तरफ से बोलने वाले लोग आज भी मौके की नजाकत को समझ नहीं पा रहे हैं। बीती आधी रात के करीब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छात्रों से कुछ अपील का एक सेल्फी वीडियो जारी किया जो कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अपने किस्म की पहली कार्रवाई थी। आज देश भर में कई शहरों में कॉकरोच-आंदोलन की घोषणा की गई है, संसद के भीतर और बाहर, सडक़ और प्रधानमंत्री निवास पर विपक्ष ने राहुल गांधी की अगुवाई में एक असाधारण विरोध-प्रदर्शन किया है, और सरकार को बुरी तरह से घेरा है। ऐसा लगता है कि सरकार ने देश की बेचैन होती जनभावनाओं को समझने में महीनों की देर कर दी, और इसीलिए आधी रात की रील की जरूरत पड़ रही है। फिर भी हम सरकार के लिए कोई असुविधा पैदा करने की, या कि मौजूदा असुविधा को बढ़ाने की नीयत नहीं रखते। हमारा मानना है कि सरकार हो, विपक्ष, या कोई और आंदोलनकारी, लोकतंत्र में हर किसी को अपनी गलतियां सुधारने का मौका मिलना चाहिए, और आज शायद मोदी सरकार उसी का इस्तेमाल कर रही है। फिर भी इस मौके पर हमें दुनिया के बहुत से महान लोगों की अलग-अलग वक्त पर कही गई कई बातें याद पड़ती हैं, जो हमारे विचारों के मुकाबले भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण और वजनदार हैं, इसलिए हम उन्हें यहां पर लिख रहे हैं, ताकि यह बात सनद रहे, और भारतीय लोकतंत्र के लिए सबक रहे। 

20वीं सदी के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दार्शनिक हन्ना अरेन्ट ने लिखा था कि नागरिक अवज्ञा तब जन्म लेती है, जब बड़ी संख्या में नागरिक यह मानने लगते हैं कि बदलाव के सामान्य रास्ते काम नहीं कर रहे हैं, और उनकी शिकायतें न तो सुनी जाएंगी, न उन पर कार्रवाई होगी। गांधी ने लिखा था असहयोग अनुशासन और त्याग का उपाय है, और यह विरोधी विचारों के सम्मान की भी मांग करता है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर की विख्यात लाईन है- दंगा उन लोगों की भाषा है जिन्हें सुना नहीं गया। जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा था- लोकतंत्र की परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती, उस दिन होती है जब उसके खिलाफ नारे लग रहे हों। नेल्सन मंडेला ने लिखा था- किसी समाज का चरित्र इस बात से पहचाना जाता है कि वह अपने सबसे कमजोर, और सबसे असहमत नागरिकों के साथ कैसा बर्ताव करता है। एक बात को बहुत से अलग-अलग विचारकों ने लिखा और कहा है- अहिंसक विरोध लोकतंत्र की विफलता नहीं, बल्कि उसकी एक अनिवार्य विशेषज्ञता है। कुछ ्और लोगों ने लिखा है- लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यही नहीं है कि सरकारें हर बार सही होती हैं। उसका सबसे बड़ा सौंदर्य यह है कि नागरिक बिना डर के यह कह सकते हैं कि सरकार गलत है। किसी और ने लिखा है- जब हजारों नौजवान सडक़ों पर उतर आएं, तो जिम्मेदार लोकतंत्र का पहला कर्तव्य उन्हें हराना नहीं, उन्हें सुनना होता है। अमरीका के एक शुरूआती राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने लिखा था- कभी-कभार होने वाला विरोध किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। गांधी, मार्टिन लूथर किंग, और नेल्सन मंडेला, इन तीनों ने हेनरी डेविड थोरो से कई तरह की प्रेरणा ली थी। थोरो ने लिखा था- जिस सरकार में किसी बेकसूर को जेल जाना पड़े, वहां एक इंसाफपसंद इंसान की जगह भी जेल ही है। गांधी ने लिखा था- जब समय बोलने की मांग करे, तब चुप रहना कायरता है। जॉन एफ केनेडी ने लिखा था- जो लोग शांतिपूर्ण परिवर्तन को असंभव बना देते हैं, वे हिंसक परिवर्तन को अनिवार्य बना देते हैं। एक चेक राष्ट्रपति की एक किताब का सार था कि आम लोगों की सामूहिक नैतिक शक्ति राज्य की संस्थागत शक्ति से बड़ी हो सकती है। अमत्र्य सेन ने लिखा था- लोकतंत्र सिर्फ मतदान नहीं है, वह सामाजिक तर्क-वितर्क भी है। राममनोहर लोहिया ने लिखा था- जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं। जस्टिस डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने लिखा था- कि असहमति ही लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है। (कुकर का सेफ्टी वॉल्व प्रेशर बढऩे पर कुकर को फटने से बचाता है)। 

इसलिए हम इन तमाम बातों को गिनाते हुए यह कहना चाहेंगे कि एक जिम्मेदार लोकतंत्र अपने नौजवानों को हराने की कोशिश नहीं करता, वह उन्हें सुनता है, उनसे बहस करता है, उनसे असहमत भी होता है, लेकिन कभी-कभी उनसे सीखता भी है।

(Daily Chhattisgarh)   

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