27 जुलाई 2026
जंतर-मंतर के छात्र और नौजवान आंदोलन की वजह से एक बार फिर इस देश में गालियों, अश्लील टिप्पणियों, या उनके जवाब में हिंसक धमकियों, अश्लील बातों का सैलाब आया हुआ है। हमें तो अखबार के धंधे की वजह से खबरों को लगातार पढऩा पड़ता है, बहुत से वीडियो भी देखने पड़ते हैं, खासकर ऐसे जो कि टीवी की मिलावट से परे के, सोशल मीडिया के खालिस वीडियो रहते हैं। इन सबको देखते महीना हो रहा है, और अब दिमाग कुछ भारी होने लगा है, मन उचटने लगा है। ऐसा लगने लगा है कि चाहे कितना ही जमीनी मुद्दों का आंदोलन क्यों न हो, उसे लेकर नकारात्मकता कितनी झेली जा सकती है? यह तो आंदोलन में कई सकारात्मक बातें थीं, इसलिए उसे लगातार देखते चलने की दिलचस्पी भी थी, लेकिन आंदोलन पर हमला करने वाले लोग इसे साम्प्रदायिकता की हद तक ले जा रहे थे, वह नकारात्मकता बहुत भारी पड़ रही थी। इसलिए आज किसी भी एक आंदोलन से परे, किसी भी आंदोलन से परे, बात असल जिंदगी में सकारात्मकता, और नकारात्मकता की।
आज लोग अगर जरा सी भी ऑनलाइन जिंदगी जीते हैं, तो वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने, या कम से कम उसे देखते चलने के लिए मजबूर रहते हैं। जो लोग सोशल मीडिया पर मौजूद नहीं रहते, वे एक किस्म से अपने दायरे और तबके के लिए असामाजिक प्राणी हो जाते हैं। ऐसे में लोगों के दायरे में जो लोग रहते हैं, उन्हीं का लिखा हुआ, पोस्ट किया हुआ, या मैसेंजरों पर फारवर्ड किया हुआ अधिक पढऩे और देखने में आता है। नतीजा यह है कि असल जिंदगी में जो स्थितियां आती हैं, उनमें सकारात्मक और नकारात्मक का जो अनुपात रहता है, उससे बिल्कुल अलग अनुपात लोगों की ऑनलाइन जिंदगी में हो सकता है, होता है। असल जिंदगी में अधिकतर लोगों की अब तक की पूरी जिंदगी में जिन लोगों से नफरत करने की कोई वजह नहीं रहती, ऑनलाइन यह लगने लगता है कि ये लोग तो नफरत के लायक हैं! और ऑनलाइन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जब मैसेंजर सर्विसों के साथ मिलकर एक मिला-जुला औजार बनकर लोगों के हाथ लग जाते हैं, तो फिर लोग उसका मनमर्जी इस्तेमाल करने लगते हैं। दुनिया में स्विस आर्मी चाकू बड़ा मशहूर है। एक ही चाकू में दर्जन-दो दर्जन किस्म के अलग-अलग जरूरी औजार रहते हैं, जो कि एक किस्म की मिनी टूल किट रहते हैं। सोशल मीडिया और मैसेंजर मिलकर लोगों के हाथ कुछ इसी तरह का स्विस आर्मी नाइफ बन जाते हैं, एक ही साथ कई किस्म के औजार, और कई किस्म के हथियार भी।
ऐसे में हमें लगता है कि लोगों को अपनी असल जिंदगी की असल घटनाओं के अनुपात के साथ-साथ ऑनलाइन जिंदगी, या संदेशों पर भी सकारात्मक और नकारात्मक का एक अनुपात बनाए रखना चाहिए। इन दिनों बड़े तो बड़े, छोटे-छोटे बच्चे भी सडक़ों पर जिस तरह की हिंसक और नफरती बातें करते दिखते हैं, वह उन पर सोशल मीडिया, और मैसेंजरों से प्रभावित बड़े लोगों का असर भी दिखता है, और अब तक भारत में नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कोई रोक तो लगी नहीं है, इसलिए बच्चे खुद भी सोशल मीडिया और मैसेंजरों की नकारात्मकता से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। हम सिर्फ हिंसक, अश्लील, या साम्प्रदायिक बातों की बात नहीं कर रहे, इनसे कम प्रभावित होने पर भी लोगों के दिल-दिमाग पर एक निरंतर-नकारात्मकता का जो असर होता है, उसके खतरे भी समझना जरूरी है। हमने दुनिया के कुछ मनोवैज्ञानिकों की इस बारे में कही और लिखी गई बातों से समझने की कोशिश की। उनका कहना है कि भावनाएं भी संक्रामक होती हैं, जैसे हँसी फैलती है, वैसी ही गुस्सा, भय, नफरत, और निराशा भी फैलती हैं। लगातार क्रोध, अपमान, और षडय़ंत्र की भाषा सुनने-पढऩे वाले लोग भी धीरे-धीरे उसी भावनात्मक वातावरण में जीने लगते हैं। दूसरी बात मानव मनोविज्ञान के साथ यह है कि लोगों के मन में एक नकारात्मकता-पूर्वाग्रह रहता है, यानी इंसानी दिमाग बुरी खबरों पर अच्छी खबरों के मुकाबले अधिक तेजी से प्रतिक्रिया देता है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर गुस्से, अपमान, डर, और नफरत वाली पोस्ट अधिक ध्यान खींचती है, दिमाग उन्हें अधिक देर तक याद रखता है। फिर एक और मनोवैज्ञानिक तथ्य यह है कि इंसानी दिमाग एक प्रतिध्वनि-कक्ष भी रहता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपनी तरह सोचने वाले लोगों को पढ़ते, और सुनते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें लगने लगता है कि पूरी दुनिया उन्हीं की तरह सोचती है, और इससे उनकी असहमति सहने की क्षमता कम होती जाती है। सामाजिक मनोविज्ञान का एक और बहुत मजबूत सिद्धांत समूह-ध्रुवीकरण है। जब समान विचार वाले लोग बार-बार एक-दूसरे से बातचीत करते हैं, तो वे अपनी धारणाओं और मान्यताओं के लिए पहले से अधिक कट्टर हो जाते हैं, मानो करेला नीमचढ़ा भी हो गया। मनोविज्ञान कहता है कि ऐसे दस लोग हल्की नाराजगी लेकर भी बैठे हों, तो लगातार एक-दूसरे की बात सुनते-सुनते वे गुस्से की पराकाष्ठा तक पहुंच सकते हैं। मनोविज्ञान का एक और सिद्धांत कहता है कि यदि कोई व्यक्ति पूरे वक्त सिर्फ जुर्म, हिंसा, धर्म, साजिश, और नफरत की पोस्ट पढ़ते हैं, तो उन्हें लगता है कि पूरी दुनिया सिर्फ इन्हीं चीजों से भरी हुई है। वास्तविकता नहीं बदलती, लेकिन लोगों की मानसिक सोच उसके बारे में बदल जाती है। फिर इसके बाद एक खतरनाक चीज और बाकी है। आज सोशल मीडिया के भीतर जो एल्गोरिद्म काम करता है, वह लोगों की दिलचस्पी देखकर उसी किस्म के कंटेंट और दिखाता है। अगर किसी ने दस नफरती वीडियो देखे, तो प्लेटफॉर्म आपको ग्यारहवां भी वैसा ही दिखाएगा, और इस तरह कोई व्यक्ति एक मानसिक सुरंग में पहुंच सकते हैं, जिसमें चारों तरफ और कुछ नहीं दिखता, सुरंग के अलावा।
ये मनोवैज्ञानिक सिद्धांत ढूंढते-ढूंढते अंत में एआई, चैटजीपीटी ही हमें सुझा रहा है कि आपके संपादकीय के लिए, या साप्ताहिक कॉलम के लिए यह लाईन अच्छी रहेगी- ‘मनुष्य केवल अपने खानपान से नहीं बनते, वे अपने पढऩे, सुनने, और साथ रहने वालों से भी बनते हैं। यदि कोई रोज नफरत खाते हैं, तो एक दिन उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे कभी इंसानियत भी खाया करते थे। शरीर का डीएनए माता-पिता से मिलता है, लेकिन दिमाग का डीएनए बहुत हद तक उन लोगों से बनता है जिन्हें हम हर दिन पढ़ते हैं, सुनते हैं, और अपना मानते हैं।’ एआई ने एक दिन पहले के हमारे अखबार की सामग्री को देखकर भी ये बातें सुझाई हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि इस अखबार की सोच क्या है। जब कृत्रिमबुद्धि पर भी हमारी लगातार बातचीत का ऐसा असर होता है, तो मानवबुद्धि पर भी ऐसा ही असर होता होगा। हममें से हर किसी को बड़ा सावधान रहना होगा कि अपनी मानसिक सेहत को किस तरह ठीक रखें, किस तरह नकारात्मकता से दूर रहें। आज सोशल मीडिया, मैसेंजर, और एआई के जमाने में यह पहले के मुकाबले अधिक मुश्किल भी है कि नकारात्मकता से दूर रहा जाए। इसके लिए लगातार कोशिश करनी होगी, और सिर्फ सकारात्मक चीजों को देखते चलने से आपका सोशल मीडिया अकाउंट आपको धीरे-धीरे अधिक सकारात्मक चीजें दिखाने भी लगेगा। हम कभी-कभी लोगों के दिल-दिमाग की तुलना एक स्पंज से करते हैं, जो कि कहीं बिखरे हुए पानी को सोखने के लिए भी इस्तेमाल होता है। इंसानी दिल-दिमाग भी एक स्पंज जैसा है, वह अगर अपनी पूरी क्षमता का सोख चुका रहता है, तो फिर वह और कुछ नहीं समा सकता। इसलिए अगर हमारे दिल-दिमाग नकारात्मकता से लबालब हो जाएंगे, तो फिर सकारात्मकता के लिए उसमें जगह भी नहीं बचेगी। ऐसे में इस स्पंज को दबाकर पूरी तरह निचोड़ देना जरूरी है, ताकि नकारात्मकता निकल जाए, और सकारात्मकता के लिए कुछ जगह खड़ी हो। एक वक्त कहा जाता था कि लोगों को बुरी संगत से बचना चाहिए, आज टेक्नॉलॉजी के इस जमाने में असल जिंदगी की संगत तो सबकी घट गई है, लेकिन आभासी दुनिया में सोशल मीडिया, और ऑनलाइन की संगत बढ़ गई है, उसे भी देख-समझकर सावधानी से छांटने की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी पेड़ के ठीक विकास के लिए उसकी गैरजरूरी डालियों को काटा जाता है।
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