07 जुलाई 2026
अमरीका के उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस ने पिछले महीने इजराइल को अमरीका और राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की आलोचना करने से बचने की सलाह दी थी। उस वक्त इजराइल अमरीका की इस चेतावनी को अनसुना कर रहा था कि ईरान के साथ चल रही अमरीका की वार्ता के दौरान उसे लेबनान पर हमले नहीं करना चाहिए। लेकिन जब इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने यह बात नहीं मानी, तो जे.डी.वेंस ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि पूरी दुनिया में सिर्फ डॉनल्ड ट्रम्प ही इकलौते नेता हैं जो इजराइल के प्रति सहानुभूति और समर्थन दिखा रहे हैं, साथ ही वह दुनिया के सबसे ताकतवर देश के नेता भी हैं। इसका जवाब देते हुए नेतन्याहू ने अभी कुछ दिन गुजर जाने पर कहा है कि अमरीका ही नहीं बल्कि हमारे दूसरे दोस्त भी हैं, जैसे भारत। उन्होंने कहा-140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में हमें बहुत ज्यादा समर्थन हासिल है। फेसबुक पर, सोशल मीडिया पर मुझे भारत से मिले अपार समर्थन के लगातार मैसेज आते रहते हैं। इस मुद्दे से बिल्कुल परे आज की एक दूसरी खबर बताती है कि ट्रम्प ने अमरीकी राष्ट्रपति भवन में प्रेस से बात करते हुए एक बार फिर, शायद सौंवी बार, यह बात दुहराई- मैंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष रूकवाया। इन दोनों के बीच यह मामला बहुत खतरनाक हो सकता था, परमाणु युद्ध का खतरा था, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के मुताबिक उसमें चार करोड़ लोगों की जान जा सकती थी, शायद पांच करोड़ लोग भी मारे जा सकते थे, दोनों ने एक-दूसरे के 11 विमान गिरा दिए थे, स्थिति लगातार बिगड़ रही थी, चार दिन तनाव बना रहा, और फिर मैंने उसे रूकवाया।
इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भारत के एक मुखर तबके की सोशल मीडिया पर सक्रियता को भारत के अपने साथ खड़े रहने जैसा मान लिया है। सच तो यह है कि गांधी-नेहरू के वक्त से, इंदिरा और अटल बिहारी के वक्त तक भारत जिस मजबूती के साथ फिलीस्तीन के साथ खड़ा हुआ था, वह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। आज दुनिया के देशों के रिश्ते नैतिकता के पैमानों से हटकर कारोबारी और फौजी रणनीति के रिश्तों में बदल गए हैं, इसलिए भारत की सरकार का एक ऐसा रूख इजराइल को दिख रहा होगा, जो भारत की जनता का रूख नहीं भी हो सकता है। इसलिए ऐसे बयान देकर ट्रम्प और नेतन्याहू दुनिया के उन देशों की फजीहत करते हैं जो आज ट्रम्प को झेलने पर मजबूर हैं, और नेतन्याहू के साथ कारोबारी रिश्ते निभा रहे हैं।
इन दोनों के इस एक बयान से परे की एक बात पर जाएं, तो आज ईरान में वहां के सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार के बीच ट्रम्प ने यह बयान दिया कि आज वे सब (ईरान के सबसे बड़े नेता) एक ही जगह मौजूद हैं, हम एक ही वार में उन सबको खत्म कर सकते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि फिर बातचीत करने के लिए हमारे पास कोई बचेगा ही नहीं। इस बयान पर ईरान ने अपनी गमी के दौर के बीच भी कहा कि यह धमकी अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, और अपने नेताओं की हत्या की इस तरह की खुली बात उसे मंजूर नहीं है। इस बात को ट्रम्प की आम बकवास मानना इसलिए ठीक नहीं होगा क्योंकि आज अमरीका और ईरान के बीच कूटनीतिक स्तर पर शांतिवार्ता चल रही है, और ऐसे में एक किसी स्वतंत्र देश के शीर्ष नेतृत्व को एक साथ निशाना बनाने की अपनी फौजी ताकत का इस तरह से नंगा खुला दावा करना अपने आपमें एक अंतरराष्ट्रीय जुर्म सरीखा है। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि अप्रैल के महीने में इसी ट्रम्प ने ईरान को धमकी देते हुए कहा था कि अगर उसने अमरीका की शर्तें नहीं मानी तो ‘आज रात एक पूरी सभ्यता मर जाएगी’। इन शब्दों का बड़ा साफ-साफ मतलब यही था कि पूरे के पूरे ईरान को खत्म कर दिया जाएगा, जिसका एक बहुत छोटा हिस्सा ही सरकार और फौज हैं, बाकी तो निहत्थे नागरिक ही हैं। ईरान ने संयुक्त राष्ट्र में इस बयान पर कहा था कि ईरानी सभ्यता को बमबारी से नष्ट नहीं किया जा सकता, यह सभ्यता हजारों साल पुरानी है।
ट्रम्प के उस बयान को लेकर दुनिया के जिम्मेदार और समझदार लोगों ने इसे जनसंहार की धमकी माना था, और इसकी जमकर आलोचना खुद अमरीका के भीतर हुई थी। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन केन्द्र ने इस प्रकाशित एक टिप्पणी का शीर्षक लिखा था- आज रात एक पूरी सभ्यता की मौत कहने का मतलब कि इस दिन अमरीकी राष्ट्रपति ने जनसंहार की धमकी दी। अमरीका के बहुत से सांसदों ने इसे युद्ध अपराध की भाषा कहा था, एक सांसद ने कहा था कि ऐसे राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाना चाहिए। अमरीका से बाहर भी वेटिकन से पोप लियो ने इस बयान को पूरी तरह अस्वीकार्य करार दिया था, जबकि पोप राजनीतिक बयानों की एक-एक लाईन पर आमतौर पर इस तरह प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। एक अमरीकी सांसद ने ट्विटर पर लिखा था- ट्रम्प को पद से हटाया जाना चाहिए, वे न केवल एक अवैध युद्ध छेड़ रहे हैं, बल्कि युद्ध अपराध करने की धमकी भी दे रहे हैं। संसद को महाभियोग लाना चाहिए, और ऐसे राष्ट्रपति को हटाना चाहिए। कई और सांसदों ने भी इसे युद्ध अपराध करार दिया था, और ट्रम्प को महाभियोग चलाकर हटाने की बात कही थी। एक सांसद सारा जैकब ने कहा था कि राष्ट्रपति ने अभी-अभी जनसंहार की धमकी दी है, ट्रम्प को रोकने के लिए महाभियोग सहित सभी विकल्पों पर विचार करना होगा। एक और सांसद जूली जॉनसन ने कहा था कि ट्रम्प बेहद लापरवाही से काम कर रहे हैं, अब 25वें संशोधन को लागू करने का वक्त आ गया है।
अब ईरान के अंतिम संस्कार में एक साथ आए वहां के बड़े नेताओं, और फौजी अफसरों को लेकर अगर गमी के बीच ट्रम्प यह धमकी दे रहा है कि वह अगर चाहे तो सबको एक साथ, एक वार से खत्म कर सकता है, तो इससे बड़ी नीचता की और क्या बात हो सकती है? आज ऐसे ही किसी अमरीकी या इजराइली हमले की आशंका से वहां के मौजूदा सुप्रीम लीडर अपने ही पिता के अंतिम संस्कार में सामने नहीं आ पा रहे हैं। लेकिन जिस तरह राजधानी तेहरान में गमजदा ईरानियों का समंदर सा दिख रहा है, वह भी ट्रम्प को हक्का-बक्का कर रहा है। लोगों को याद होगा कि खुमैनी को मार डालने के बाद ट्रम्प ने ईरान के लोगों से खुला सार्वजनिक आव्हान किया था कि वे सत्ता को पलट दें। ईरानी जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ था, और आज जो लोग ईरान में इस अंतिम संस्कार को देख रहे हैं, उनका मानना है कि धरती पर इसके पहले इतना बड़ा कोई अंतिम संस्कार नहीं हुआ था।
हम ईरान, पाकिस्तान और भारत को लेकर ट्रम्प और नेतन्याहू के, अमरीकी उपराष्ट्रपति के बयानों को देखते हैं, तो हमें लगता है कि भारत सरकार को अमरीका-इजराइल से अपने रिश्तों में बड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। आज ट्रम्प जिस तरह अपने आपको भारत और पाकिस्तान दोनों के ऊपर दबदबे वाला बार-बार करार दे रहा है, शायद सौंवी बार करार दे रहा है, वह भारत जैसे किसी भी स्वतंत्र देश के स्वाभिमान के खिलाफ बात है। इसी तरह जब जनसंहार का दुनिया का आज का सबसे बड़ा मुजरिम इजराइल और उसका प्रधानमंत्री नेतन्याहू जब भारतीयों को अपना दोस्त कहते हैं, तो यह बात भी भारत को परेशान करने वाली होनी चाहिए। सिर्फ इसलिए कि इजराइल के निशाने पर फिलीस्तीनी मुस्लिम हैं, भारत के भीतर के मुस्लिम-विरोधी लोगों का इजराइल-प्रेम भारत का रूख नहीं गिना जा सकता। मुखर तबके की बातों को छोड़ दें, तो आज भी भारत का अधिकतर हिस्सा शांतिप्रिय है, और उसकी यादों में, उसके दिल में गांधी अब भी बसे हुए हैं। इसलिए ट्रम्प और नेतन्याहू के बयानों से भारत की शान बढ़ नहीं रही है। दाऊद जैसा मुजरिम, या बिल्ला-रंगा जैसे बलात्कारी किसी को अपना दोस्त कहें, तो वह फख्र की बात नहीं होती है। दुनिया के इतिहास में जर्मनी के हिटलर की तरह नेतन्याहू का नाम भी अच्छी तरह दर्ज हो चुका है, और किसी भी स्वाभिमानी-लोकतांत्रिक देश को नेतन्याहू के ऐसे दावे पर शर्मिंदगी ही हो सकती है, हो रही होगी। इन दोनों नेताओं से दुश्मनी चाहे भली न हो, इन दोनों से दोस्ती भी कोई भली बात नहीं है। दुनिया का इतिहास कुछ चुनावों के नफे-नुकसान से बहुत परे, सदियों को दर्ज करता है, और वैसे में ट्रम्प, नेतन्याहू, और उनके दोस्त भी, अच्छी तरह दर्ज हो रहे हैं। हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तानियों को इस कालिख से बचना चाहिए।
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