तीजन के जाने के मौके पर उनके बहाने लोककला और शास्त्रीय कला पर कुछ चर्चा

 06 जुलाई 2026  

 

छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी की सबसे बड़ी गायिका, पद्मविभूषण तीजन बाई के गुजरने पर उनके बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। कल से आज तक ही हमारे ही अखबार में इतना छपा है कि यहां उनके बारे में कुछ और लिखना गैरजरूरी दुहराव होगा। इसलिए आज हम इस मौके पर लोककला के एक व्यापक मुद्दे पर लिखना चाहते हैं। छत्तीसगढ़ आदिवासी, और गैरआदिवासी दोनों तरह की लोककलाओं से संपन्न प्रदेश है। और दिल्ली जैसे एक शहर के महानगरीय राज्य को छोड़ दें, तो भला भारत का कौन सा ऐसा प्रदेश है जिसमें दर्जनों लोककलाएं न हों? देश भर में हजारों किस्म की लोककला, लोक चित्रकला, लोक मूर्तिकला, और लोक संगीत सभी कुछ कुदरत की विविधता की तरह हर सौ-पचास किलोमीटर पर अलग-अलग रूपों में सामने आती हैं।

अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से इस विशाल राज्य में लोककलाओं, आदिवासी कलाओं, और शास्त्रीय कलाओं, इन सबको भरपूर महत्व मिलता रहा, और राजधानी भोपाल इन सारी गतिविधियों का एक बड़ा केन्द्र रहा। प्रदेश के आदिवासी कलाकारों की कलाकृतियां भोपाल के संग्रहालयों में सजी रहीं, और वहां पर ध्रुपद गायन की गुरू-शिष्य परंपरा को भी राज्याश्रय मिला। ग्वालियर जैसा शास्त्रीय संगीत का केन्द्र उस अविभाजित मध्यप्रदेश में था, और पुराने बड़े राजपाट की वजह से शास्त्रीय संगीत के संरक्षण और विकास के लिए जरूरी राज्याश्रय मिलते रहा। दूसरी तरफ लोककलाओं के लिए राज्याश्रय कुछ काम का जरूर हो सकता है, लेकिन उसके बिना भी लोककलाएं जिंदा रहना जानती हैं क्योंकि वे दरबारी-कुलीनता वाली शास्त्रीय कलाओं के लिए जरूरी कड़े नियमों से मुक्त रहती हैं, और वे आम लोगों की जिंदगी में पली-बढ़ी रहती हैं। इसलिए बिना राज्याश्रय भी लोककलाएं जिंदा रह लेती हैं, लेकिन शास्त्रीय संगीत सरकारी मदद के बिना शायद ही जिंदा रह सके। लोककलाओं को तो आम लोगों की जिंदगी में किसी त्यौहार के मौके पर भागीदारी से मिले बढ़ावे से भी जिंदा रहना आता है, लेकिन भारी अनुशासन से बंधी हुई शास्त्रीय कलाओं का आम जनता से कुछ लेना-देना नहीं रहता, और न ही शास्त्रीय कलाएं लोगों के सुख-दुख में उनके दरवाजे जाकर लोककलाओं की तरह नाच-गा सकतीं, और न ही अपना पेट भर सकतीं।

तीजनबाई के गुजरने पर लोककलाओं और शास्त्रीय कलाओं के बीच के इस फर्क पर एक नजर डालने का दिल करता है। किसी राग, या किसी शास्त्रीय नृत्य शैली की बारीकियों, और उनकी शुद्धता, नियमों की जटिलता, और अनुशासन को देखें, तो उनमें जनजीवन से जुडऩे की कोई गुंजाइश नहीं रहती। दरबार में बैठे राजा, या शास्त्रीय कलाओं के रसिक और मर्मज्ञ लोग उनका आनंद उठा सकते हैं, लेकिन आम लोगों पर इनका कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता हो तो पड़ता हो, वरना शास्त्रीय कलाओं में आम लोगों को प्रभावित करने की कोई सीधी बात नहीं रहती। लेकिन भारत में पहले राजाओं, फिर सामंतों, और फिर उन्हीं के असर में चलने वाली निर्वाचित सरकारों का हाल यह रहा कि परंपरागत रूप से संपन्न, कुलीन, शिक्षित, शहरी, सवर्ण तबके शास्त्रीय कलाओं को गर्व की बात मानते रहे, और लोककलाओं को गरीब-देहाती लोगों के लायक मान लिया गया। नतीजा यह निकला कि केन्द्र और राज्य सरकारों के जितने संस्थान शास्त्रीय कलाओं के लिए बने, उनके मुकाबले लोककलाओं के लिए संस्थान नहीं बने, उनकी पढ़ाई नहीं हुई, और उनका उस तरह से संरक्षण भी नहीं हुआ, जिस तरह से शास्त्रीय कलाओं का होता है।

लोककलाओं के साथ एक दूसरी दिक्कत यह भी हो गई, कि उन्हें उग्र क्षेत्रवाद से भी कहीं-कहीं पर जोड़ दिया गया। क्षेत्रवाद की राजनीति ने लोककलाओं को उग्र स्थानीय संस्कृति की लड़ाई का हथियार भी बना लिया, ठीक उसी तरह जिस तरह कि बहुत से प्रदेशों में स्थानीय बोली या भाषा को क्षेत्रवाद के अस्तित्व की लड़ाई में इस्तेमाल किया गया। दूसरी तरफ लोककलाओं को बदलते वक्त की टेक्नॉलॉजी का नुकसान उसी तरह झेलना पड़ा, जिस तरह कि शास्त्रीय कलाओं को भी। लोकशिल्प का बाजार मशीनों से बनी हुई, या थोक में ढाल दी गई चीजों ने खत्म कर दिया। लोक संगीत और लोक नृत्य पर शहरीकरण, और लोगों के गांव छोडक़र शहर जाने का भी असर हुआ, गांवों की आबादी घटती चली गई, वहां पर कैसेट प्लेयर और लाउडस्पीकर हर चाय-पान ठेलों पर आ गए, और धीरे-धीरे टीवी ने पहुंचकर लोगों की स्थानीय मनोरंजन की लोककलाओं की जरूरत को भी खत्म कर दिया। नतीजा यह निकला कि बहुत सी लोककलाएं कलाकारों के लिए स्वांत: सुखाय रह गईं, या फिर शहरों में लोककलाओं का जो एक आभिजात्य-फैशन चला, उसकी वजह से कुछ लोककलाओं की रोजी-रोटी चली। फिर भी शास्त्रीय कलाओं के मुकाबले लोककलाएं अपने दम पर इसलिए कुछ अधिक जिंदा रह गईं कि लोककलाकार पूर्णकालिक कलाकार होने के बजाय अपनी आम जिंदगी जीते हुए कला में गुंजाइश जितना समय उसमें लगाते रहे, और बाकी वक्त अपनी रोजी-रोटी के दूसरे काम भी करते रहे।

अब अगर देश, काल, और परिस्थितियों की बात करें, तो लोककला जमीन, जीवन, और जनता के मुद्दों से जुड़ी रही। लोककलाओं में राजनीतिक चेतना की गुंजाइश रही, क्योंकि ये कलाकार जनता के जीवन से उसी तरह जुड़े हुए थे, जिस तरह शास्त्रीय कलाकार एक वक्त के राजदरबारों, और आज के सरकारी दरबारों से जुड़े हुए हैं। यह फर्क राजा और प्रजा किस्म का फर्क था। लोकगीतों में हर दौर की सामाजिक चुनौतियों की झलक कहीं-कहीं दिख सकती है, शास्त्रीय कलाओं में उसकी कोई जगह नहीं है। जिस वक्त पनघट को प्रदूषण खत्म कर देता है, उस वक्त भी शास्त्रीय गायक को पनघट पर छेडक़र चले जाने वाले नंदलाल को दिया जा रहा उलाहना ही सूझेगा। दरअसल हर कला अपने पारखी, और अपने ग्राहक-तबकों का ख्याल रखती है। लोकगीतों में महंगाई डायन खाए जात है सुनाई पड़ सकता है, किसी शास्त्रीय कला में महंगाई शब्द की जगह नहीं है। वह जिस राज्याश्रय में पलती है, उसे महंगाई सताती भी नहीं है, पहले दरबारी गायक हुआ करते थे, जो राजाओं के निजी मनोरंजन को समर्पित रहते थे, फिर लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकारों ने भी ध्रुपद केन्द्र सरीखे शास्त्रीय कला के आश्रय बना दिए।

इन दोनों किस्म की कलाओं के और भी बहुत से पहलू हैं, आज के यहां के अखबारी दो-कॉलम इस पूरी चर्चा के लिए काफी नहीं हो सकते। तीजनबाई के बहाने यह चर्चा आगे जरूर बढऩी चाहिए। लोककलाएं जिस तरह जनता से जुड़ी हुई, लचीली, आजाद, बेफिक्र, अराजक, और लोकतांत्रिक चेतना से संपन्न हो सकती हैं, वह देखना अद्भुत है। यह बात सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं है, लोककलाएं फोक म्यूजिक, ट्राइबल म्यूजिक, जैसे अनेक नामों से दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों में प्रचलन में हैं, और लोकजीवन से जुड़ी हुई भी हैं। पश्चिम में भी वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक, सिम्फोनी, आर्केस्ट्रा जैसे कई शब्द जनता से कटे हुए रहते हैं, और जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ते चलता है, दुनिया के किसी भी हिस्से में लोकजीवन के हर पहलू मार खाते हैं, जिनमें लोककलाएं सबसे पहले मार खाती हैं, क्योंकि जमीन से जुड़ी, जमीन पर जीती जनता की भूख और संघर्षभरी जिंदगी में लोककलाओं की प्राथमिकता दिन भर का रोजगार पूरा हो जाने के बाद, पेट भर जाने के बाद ही आती है। इस तरह लोककला और शास्त्रीयकला अपने-अपने वर्गों की जरूरत और चरित्र के मुताबिक ढली हुई हैं, इन दोनों के प्रति आज के निर्वाचित राजाओं का रूख अब उनकी निजी पसंद से भी तय नहीं होता, अब यह सब कुछ चुनावी मुद्दाकरण की संभावनाओं से तय होता है। इस चर्चा को कुछ और बढ़ाकर देखिए!

(Daily Chhattisgarh)   

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